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Tuesday, August 6, 2013

आज तुमने भेज ही दिया
मेरे आसमान में काले-काले मेघ
बरसती रहीं
झीनी-झीनी फुहारें मेरे आंगन
तुम्हारे मन का स्पर्श था
बरसते पानी में
नेह के आलिंगन में बंध
किन-किन पलों को
गिनता रहा मन
पीपल की वह छाओं
बहती नदी और तुम्हारे मन का गाँव
घुमती रही
तभी रेल की छुक-छुक सुन
वह विदा होने का पल याद आया
हर बार तुम
अपनी हथेलियों से थप-थपा
 मीठी-सी चुभन दे अलविदा कह देते
और मैं ओझल होते
तुमको निहारती रह जाती






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