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Friday, September 27, 2013

कैसी अनुभूतिओं के वो क्षण थे
एक दूसरे को जानने को
बिना कुछ कहे सब कह दिया था
अंतस में कहीं एक सूखी धमनी को
तुम्हारे स्पर्श ने
जीवंत कर दिया था
उस पल को आज भी जीती हूँ
तुमसे दूर जाते हुए
उसी स्पर्श की गर्माहट को
मैं महसूस करती रही
पता नहीं
आती-जाती रेल की पटरी
जिन्दगी की कहानी-सी कहती लगती है
वहीँ पर कहानी कभी शुरू होती है
वहीँ बहुत अनकहा रह जाता है
तब हमारा सफ़र भी पूरा नहीं होता
मैं फिर-से निहारती हूँ
गुजरती रेल-पटरी को
वह कहती-सी लगती हैं
तुम्हारी तरह
यह अहसास हर पल नया है
सिर्फ, तुम ऑंखें बंद कर
मुझे देखो तो पलकों में .....

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