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Friday, June 23, 2023

गुरु से बढ़कर कोई नहीं! -शशिप्रभा तिवारी

                                                             गुरु से बढ़कर कोई नहीं!

                                                              -शशिप्रभा तिवारी

भारतीय संस्कृति में गुरुओं का बड़ा महत्व रहा है। गुरु मानव रूप में नारायण ही हैं। गुरु अपने शिष्यों के जीवन से अंधकार मिटाकर उनके मार्ग को प्रकाशित करतें हैं। इस क्रम में शिष्य नर से नारायण के मार्ग पर अग्रसर होता है। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वामित्र दोनों को श्रीराम के गुरु के रूप में जाना जाता है। संदीपनी ऋषि के पास दीक्षा प्राप्त कर ही श्रीकृष्ण भगवान बने। आज भी शास्त्रीय नृत्य-संगीत के क्षेत्र में गुरु का मार्ग-दर्शन और शिक्षण का महत्व है। क्योंकि यह गुरुमुखी विद्या है। इसे गुरु के सानिध्य में  ही रहकर बेहतर तरीके से सीखा जा सकता है। इसकी झलक सुमधुर हंसध्वनि ट्रस्ट के आयोजन स्वर लहर में नजर आया। 





दरअसल, यह अवसर गुरु और शिष्य दोनों के लिए खास अवसर था। शास्त्रीय गायिका और गुरु विदुषी सुमित्रा गुहा को संगीत नाटक अकादमी सम्मान 2020 से सम्मानित किया गया था। इसे ही उत्सव का रूप उनकी शिष्य-शिष्याओं ने दिया था। स्वर लहर समारोह का आयोजन सूरजकुंड में किया गया था। इसमें उनके शिष्य-शिष्याओं ने अपने गुरु को सुरों के जरिए आदरांजलि दिया। उनकी सामूहिक प्रस्तुति की शुरुआत गुरु वंदना से हुई। इसके बोल थे-‘गुरू चरणन में नमन करो‘। 

समारोह की मुख्य आकर्षण युवा शिष्या वसुधारा राॅय मुंशी थी। उन्होंने राग वृंदावनी सारंग में द्रुत एक ताल में बंदिश ‘आए मन रसिया मंदिरा बाजो‘ गाया। इसके बाद, उन्होंने राग यमन का आधार लेकर मीरा भजन प्रस्तुत किया। उनके साथ हारमोनियम पर अंकित कौल और तबले पर सोम चटर्जी ने संगत किया। गुरु सुमित्रा गुहा के एक अन्य शिष्य हेतार्थ चटर्जी ने अपनी कला को लोगों के सामने पेश किया। उन्होंने आरंभ में भजन ‘सुनी मैं हरि आवन की‘ गाया। इसके बाद, राग चारूकेशी में विलंबित लय की बंदिश ‘बाजे झनक मोरी पायलिया‘ पेश किया। फिर, द्रुत लय और एक ताल में निबद्ध रचना को पेश किया। इस राग में उन्होंने रचना ‘मंदरवा बाजो, संुदर गोपाल आयो‘ को सुरों में पिरोया।




समारोह में वरिष्ठ शिष्या अरूंधती ने राग बैरागी भैरवी में बंदिशों को पेश किया। उनकी प्रस्तुत रचनाओं के बोल थे-‘सांची सुरन सो गावो‘, ‘सुर से सुर साध ले‘ और साधो मान त्यागो‘। समारोह में पंडित अजय झा की शिष्या मल्लिका ने मोहनवीणा वादन पेश किया। मल्लिका ने राग शुद्ध सारंग को मोहनवीणा पर बजाया। इस कार्यक्रम का संचालन रूबी चटर्जी ने किया। समारोह में तबलावदक पंडित अनूप घोष और गौतम विश्वास की उपस्थित आकर्षक थी। उन्होंने अपने संगत के अंदाज से श्रोताओं का ध्यान आकृष्ट किया। 


वास्तव में, विदुषी सुमित्रा गुहा की विद्वता और अपने शिष्यों के प्रति प्रेम भाव देखकर यही अहसास होता है कि भारतीय संस्कृति में स्थाई सामाजिक व सांस्कृतिक स्थिति का एक लंबा युग रहा है। यहां लोग स्वाभाविक रूप से सांसारिक सुख से परे जाकर अंदरूनी आनंद की ओर देखते रहे हैं। यही आध्यात्मिक चेतना और आत्मिक शक्ति हमारी विशिष्ट उर्जा का केंद्र है। हमारे चार पुरूषार्थ-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष हमारी संस्कृति के महत्वपूर्ण पक्ष रहे हैं। भारतीय संस्कृति में ऋषियों, गुरुओं, संतांे की प्रधानता रही है। ऋषि परंपरा का ही परिणाम है कि यहां गुरुओं का महत्व और सम्मान है। 


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