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Thursday, March 26, 2020

मेरा जीवन सारंगी के तारों से झंकृत है-कमाल साबरी



                                      मेरा जीवन सारंगी के तारों से झंकृत है-कमाल साबरी


कुछ वर्ष पहले की बात है। एक समारोह में सारंगी वादक कमाल साबरीजी से मुलाकात हुई। कुछ समय पहले ही उनके वालिद और उस्ताद साबरी खान साहब दुनिया को अलविदा कह चुके थे। सेनिया घराने से ताल्लुक रखने वाले कमाल साबरी बेहतरीन सारंगी वादक तो हैं ही। वह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में नव प्रयोग के लिए मशहूर हैं। इस बार रूबरू में हम उन्हीं के विचार पेश कर रहे हैं-शशिप्रभा तिवारी 

संस्कृति से आप क्या आशय रखते हैं? इस बारे में सारंगीवादक कमाल साबरी कहते हैं कि संस्कृति हमें पूर्ण बनाती है। संस्कृति यानि संस्कार का आशय शिक्षा, अनुशीलन, सजावट, पवित्र बनाना, पूर्वजन्म की मनस्थिति या योग्यता को पुनर्जीवित करने का गुण या शक्ति है। दरअसल, संस्कृति का हमारे देश में व्यक्तिगत माना जाने लगा है। इससे जनमत या राजनीति प्रभावित नहीं होती है। इसलिए, यह उपेक्षाओं का शिकार हो रहा है और कलाकार भी। जबकि, अनूठी कला-संस्कृति  ही भारत देश की पहचान है। इस परिदृश्य में समकालीन सामाजिक प्रवŸिायां और कला एक गंभीर विमर्श का मुद्दा बन गया है। आज इस पर चर्चा करना जरूरी हो गया है। ताकि, अब और देर न करते हुए, हमारा समाज जागृत हो।

सारंगी वादक कमाल साबरी को सारंगी की तालीम अपने पिता से मिला। उन्होंने सारंगी बजाने के साथ खुद को समाज और सामाजिक सरोकारों से जोड़ा है। एक दौर था जब सारंगीनवाजों का एक बड़ा हुजूम होता था। धीरे-धीरे जब हारमोनियम और वायलिन लोकप्रिय होने लगे तब बहुत से घरानेदार सारंगी वादकों ने अपने बच्चों को सारंगी बजाना सिखाना बंद कर दिया। ऐसे में कमाल साबरी के पिता ने उन्हें सारंगी बजाने की तालीम उन्हें दिया।

सारंगी वादक कमाल साबरी बताते हैं कि यह एक नया दौर है, जब सामकालीन सामाजिक प्रवृŸिायां हम कलाकारों को बार-बार झकझोरती हैं। हमारे वालिद कहते हैं कि सारंगी संगत करने का पूरक साज है। संगत करते हुए, आप ऐसा बजाएं कि जो कलाकार गा रहा है उसका गाना निखर जाए। आपको राग, तान, सुर, लय, बंदिश सबसे परिचित हों और आपके बजाने मंे पूरी सफाई हो। इस तरह उसके कला प्रस्तुति के गुलदस्ते को अपनी तानों के फूल से सजा दें। इसके लिए हम उस घराने की गायकी शैली से परिचित हों कि फलां घराने की खासियत क्या है? हालांकि, अब तो घराने के दायरे लगभग मिटने लगे हैं। हम कलाकार जब एक-दूसरे के साथ मिल कर काम करते हैं, प्रोग्राम करते हैं उस समय हम एक-दूसरे के सुख-दुख, मनोभावों को समझते हैं यही तो मानवीय सरोकार हैं, जो हमें आपस में जोड़ते हैं और करीब लाते हैं। मुझे तिहाड़ जेल में कैदियों को सारंगी सिखाने का अवसर मिला। इससे बड़ी जीवन में और क्या उपलब्धि हो सकती है कि मैं समाज से, परिवार से कट चुके कैदियों को संगीत के जरिए खुशी और सुकून दे सका। वह समय शायद मेरे जिंदगी सुनहरे पलों में से एक है। मुझे याद है, जब मैं पहली बार तिहाड़ जेल में गया, तब अंदर-ही-अंदर भयभीत था कि पता नहीं कैसा माहौल हो? लेकिन जेल नंबर-चार में गया। वहां मुझे मेडिटेशन हाॅल में बैठाया गया। उस हाॅल में एक तबला और हारमोनियम कोने में रखा हुआ था। समय के साथ मुझे वहां जाना और कैदियों को संगीत की शक्ति, क्षमता और विशेषता के बारे में बताने लगा। उसी दौरान मन्नू शर्मा ने मुझसे करीब एक साल वायलिन बजाना सीखा। वहीं छब्बीस जनवरी 2012 में मेरा पहला प्रोग्राम हुआ। उस दिन मेरे साथ तबले पर फैसल और वायलिन पर कैदी मन्नू शर्मा ने संगत किया था। बाद में उनकी एलबम ‘होप‘ को टाइम्स म्यूजिक ने रीलिज किया। मुझे एक मुस्तकिम याद आता है-‘वक्त की रफ्तार में हम बह गए, कैद होकर सलाखों में रह गए‘।




कमाल साबरी आगे बताते हैं कि उस दौरान मुझे महसूस हुआ कि वाकई गुस्से से हमें बचना चाहिए। एक क्षण आपे से बाहर हुए, लोग अपराधी बन सजा काटते हैं। यह हमारे समाज का नया चेहरा है, जिसे हम महसूस कर रहे हैं। जिसमें छोटे-से बच्चे से लेकर साठ साल के बुजुर्ग तक गलती करते हैं और सजा काटते हैं। मुझे लगता है कि हमें सहनशीलता और धैर्य का दामन किसी भी पल नहीं छोड़ना चाहिए, यह कला की सबसे बड़ी देन है। कलाकार को हर पल नए संघर्ष के लिए तैयार रहना पड़ता है। उसे पता होता है कि जीवन ही संघर्ष का दूसरा नाम है। यही हमें जिंदगी और समाज से जोड़ता है।


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