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Wednesday, July 16, 2025

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shashiprabha: #आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवारी ------रश्मि खन्ना --...:  #आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवारी                                              रश्मि खन्ना ----- नई पौध तैयार करने में जुटी हैं भरतनाट्यम एक ऐस...

#आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवारी ------रश्मि खन्ना -----नई पौध तैयार करने में जुटी हैं

 #आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवारी 

                                           रश्मि खन्ना -----नई पौध तैयार करने में जुटी हैं

भरतनाट्यम एक ऐसी कला है जो शिल्पकला, काव्य कला और नाट्य के अतिरिक्त अन्य कलाओं को भी अंगीकृत किए हुए है। यह एक पूर्ण कला है, जो हमारे जीवन का अविभाज्य अंग है। जब किसी इंसान में भावनात्मक उद्वेग जागृत होता है तो वह स्वतः ही उसके अंग-प्रत्यंगों से अभिव्यक्त होने लगता है। भाषा और गीत के जन्म से पहले मनुष्य को विभिन्न पशु-पक्षियों की ध्वनियां, उनका उछलना-कूदना, अपनी भावना के अनुरूप अच्छा लगता था। आनंदातिरेक में मनुष्य के कूदने और अव्यवस्थित तालियां बजाने से ही नृत्य और ताल के विधिवत् जन्म की नींव पड़ी। ऐसा महान कलाकार उदयशंकर मानते थे। 

नृत्य सीखना और सिखाना दोनों आनंद की अनुभूति से गुजरना है। ऐसा भरतनाट्यम नृत्यांगना और गुरु रश्मि खन्ना मानती हैं। वह गुरु कल्याणी शेखर की शिष्या हैं, जिनके गुरु के एन दंडयुद्धपाणी पिल्लै रहे। गुरु रश्मि ने भरतनाट्यम के अलावा, लोकनृत्य, कथक और छऊ भी सीखा है। वह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, साहित्य कला परिषद और दूरदर्शन की मान्यता प्राप्त कलाकार हैं। रश्मि ने कर्नाटक संगीत की शिक्षा विजय लक्ष्मी कृष्णन और विद्वान जी इलंगोवन के सानिध्य में ग्रहण की है। नटुवंगम की बारीकियों को हेमंत लक्ष्मण से सीख रही हैं। 

                                                                 

गुरु रश्मि मानती हैं कि कला की दुनिया में सीखना निरंतर चलता रहता है। वह कहती हैं कि मैं अपनी गुरु कल्याणी शेखर से बहुत प्रभावित रही। जब तक वह जीवित रहीं, मैं अपनी सारी व्यस्तताओं के बावजूद हर वृहस्पतिवार उनके सान्निध्य में रह कर व्यतीत करती थी। मुझे उन्होंने बहुत ज्ञान दिया है। उसको संभाल कर पाऊं। वही मेरे लिए बहुत है। इनदिनों मैं गुरु गोविंदराजन पर शोधकार्य कर रही हूं। उन्होंने राजधानी दिल्ली में रहकर भरतनाट्यम नृत्य और कर्नाटक संगीत के क्षेत्र में अपूर्व योगदान दिया है। उन्होंने जी इलंगोवन, मैरी इलंगोवन और जी रघुरामन जैसे बहुत से कलाकारों को तैयार किया। अपने शोध के माध्यम से मैं उनको आज की पीढ़ी के सामने लाना चाहती हैं। 


बहरहाल, राजधानी दिल्ली में उन्होंने अपने नृत्य संस्थान का नामकरण गुरु कल्याणी शेखर के नाम पर कल्याणी कला मंदिर रखा है। यह संस्थान पिछले पच्चीस सालों में लगभग दौ सौ प्रस्तुतियों का आयोजन कर चुका है। कल्याणी कला मंदिर में लगभग दो सौ छात्राएं भरतनाट्यम सीख रही हैं। अब तक गुरु रश्मि खन्न ने बीस छात्राओं को अरंगेत्रम के जरिए मंच प्रवेश की अनुमति प्रदान की है। इन प्रस्तुतियों में गुरु के एन दंडयुद्धपाणी पिल्लै, गुरु कल्याणी शेखर और गुरु रश्मि खन्न की नृत्य रचनाओं को पेश किया गया है। नृत्य समारोह में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, काजी नजरूल, तुलसीदास, संत कबीरदास, महाराजा स्वाति तिरूनाल आदि की रचनाओं पर आधारित प्रस्तुतियां दर्शकों को मोह लेती हैं। 

गुरु रश्मि खन्ना ने एकल साधना के जरिए अपनी शिष्याओं को अरंगेत्रम के लिए तैयार किया है। पिछले दिनों इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित अरंगेत्रम समारोह में उनकी दो युवा शिष्याएं आद्या और श्रेशा ने नृत्य प्रस्तुत किया। उनकी युगल प्रस्तुति में प्रथम पुष्पांजलि थी। यह राग गंभीर नाटई और आदि ताल में निबद्ध थी। इसके अगले अंश में गणेश तांडव थी। मराठी अंभग रचना ‘तांडव नृत्य करि गजानन‘ राग हंसध्वनि और आदि ताल में निबद्ध थी। वरणम में वात्सल्य भाव का विवेचन था। इसमें परिवार के महत्व को पेश किया गया। रचना ‘नंदनंदन आरा रो इंदुड‘ राग आभोगी और आदि ताल में निबद्ध थी। संत दयानंद सरस्वती की रचना ‘भो शंभो स्वयंभो‘ पर आधारित अगली पेशकश थी। यह राग रेवती और आदि ताल में निबद्ध थी। गायक जी इलंगोवन रचित और संगीतबद्ध रचना पर आद्या और श्रेशी ने नृत्य में पिरोया। ‘राम मेरे राम, श्याम मेरे श्याम‘ को इलंगोवन ने राग पीलू का आधार लेकर गाया। अंतिम प्रस्तुति तिल्लाना थी। यह राग हिंदोलम में थी। 

अरंगेत्रम समारोह में प्रस्तुत नृत्य रचनाओं की परिकल्पना गुरु कल्याणी शेखर और गुरु रश्मि खन्ना ने की थी। शिष्याएं आद्या और श्रेशा ने संुदर नृत्य पेश किया। उनका अंग संचालन, पैर संचालन, भाव भंगिमा उम्र और अनुभव के अनुकूल था। समय के साथ धीरे धीरे वह दोनों और परिपक्व होंगी। 


Thursday, June 19, 2025

#आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवारी/चर्चित पुस्तक ‘चंदन किवाड़-संस्कृति के आंगन में खुलती है!

                                               #आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवारी

                          चर्चित पुस्तक ‘चंदन किवाड़-संस्कृति के आंगन में खुलती है!










प्रतिष्ठित गायिका मालिनी अवस्थी जी की पुस्तक ‘चंदन किवाड़ गुइयां दरवजवा मैं ठाढ़ी रहू‘ को वाणी प्रकाशन ने  प्रकाशित किया है। पुस्तक का कलेवर और इन बाॅक्सिंग बहुत सुंदर है। इस पुस्तक के लिए कई महान हस्तियों ने स्वस्तिकामना की है। इनमें लेखिका मालिनी अवस्थी को कहानीकार सूर्यबाला, लेखक यतींद्र मिश्र, बांसुरीवादक पंडित हरिप्रसाद चैरसिया, हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक पंडित साजन मिश्र, लेखक डाॅ विक्रम संपत जैसे महानुभावों का आशीर्वचन मिला है। सभी ने बहुत संुदरता और सरलता से मालिनी जी के व्यक्तित्व, कृतित्व और कला की सराहना की है। 

इस पुस्तक के आरंभ में ‘मेरी बात‘ के जरिए मालिनी अवस्थी जी ने लिखा है कि अपने लोकगीतों की पोटली थामे, मैं गांव गांव घूमी हूं, कस्बे, नगर, महानगर, देस परदेस, सता समन्दर पार! कलाकार का जीवन यायावर सा होता है। आज यहां, तो कल वहां! 
यह एक सहज यथार्थ है। यह बात सच है और इसी तरह पूरी किताब में सहजता की खुशबू और शीतलता की अनुभूति है। इस किताब को पढ़ते हुए, मालिनी जी की जीवन यात्रा, उनके संघर्ष, जिसे वह कभी संघर्ष के तौर पर बयान नहीं करती हैं। सहज कथ्य के तौर पर लिखती हैं। पर आमतौर पर यह स्त्री के लिए एक तरह का संघर्ष ही होता है। क्योंकि, परिवार, रिश्ते, बच्चे, करियर, यात्राएं, सफलता और बहुत कुछ। उनकी इस लेखनी में कहीं भी बड़बोलापन या ग्लैमर नहीं है। उन्होंने बहुत स्पष्ट तरीके से अपनी बातों को रखा है। जैसे वह आज के सोशल मीडिया में कभी कार्यक्रम पेश करते, कभी लोगों से मिलते, कभी यात्रा करतीं नजर आतीं हैं, वैसे ही सरल तरीके से उन्होंने अपनी बातों को शब्दों में पिरोया है।
यह किताब को पढ़ते हुए, कभी कभी यह आत्मकथ्यात्मक लगी तो कभी संस्कृति, संस्कारों और परंपराओं को सहेजती हुई, ग्रंथ सी लगी। यह उनकी वर्षों की कला यात्रा और अनुभव का एक संग्रह भी लगा। उन्होंने सबसे बड़ी बात की पुस्तक लिखने में जल्दीबाजी नहीं की है। उन्होंने उम्र और जीवन के अनुभव की परिपक्वता को जीते हुए, दास्तानों को जोड़ा है। इसलिए, इसमें व्यक्ति के इर्द गिर्द का परिवेश बहुत सघनता से शामिल हुआ है। इसलिए, किताब को एक बार हाथ में लेने के बाद रोमांच इस तरह हावी हो जाता है कि पाठक इसे पूरा पढ़ लेना चाहता है। क्योंकि अध्याय बहुत लंबे नहीं हैं। पर उनमें दर्ज की गई बातें बहुत गहरी हैं। जो पाठक को संवेदनाओं से जोड़ती है। 
लेखिका मालिनी लिखती हैं कि कुछ भी कहिए, ससुराल का आनंद अलग ही होता है। ससुराल की अपनी मर्यादा है, शिष्टाचार है। जीवन सुख से जीने का महामंत्र यही है कि इन वर्जनाओं को बंधन नहीं, संस्कार समझ अंगीकृत करें, मन की सारी उलझी गांठें बहुत सरलता से सुलझ जाएंगीं। 
पुस्तक को पढ़ते हुए, भारतीय कला, लोक, लोक कला, कलाकार, गुरु, गुरु की भूमिका व दायित्व, परंपरा, कला के उद्देश्य, कलाकारों के संघर्ष, लोक परंपरा, पास-पड़ोस, अतिथियों, संबंधों को निभाने का सलीका, हर चीज से पाठक जुड़ता जाता है। वह अपने गुरु के बारे में बताती हैं। अपनी मां और पिता के बारे में चर्चा करती हैं। लोक जीवन में परंपराओं के महत्व की चर्चा करती हैं। उनके घर में काम करने वाले लोगों से भी पाठक जुड़ जाता है। इतना ही नहीं, हर प्रसंग को गीत या ठुमरी या दादरा या भजन से जिस तरह जोड़ा है। वह कला में भीतर तक वह स्वयं किस तरह भींगी हुई हैं, यह दर्शाता है। 
वह लिखती हैं कि हमारा दर्शन ही है ‘सत्यं श्विम् संुदरम्‘ अर्थात् ‘सत्य सुंदर है और कल्याण‘। हमारा दर्शन, हमारी संस्कृति, हमारी कला, हमारा साहित्य, सभी में श्रृंगार बोध है, प्रेम श्रंृगार की अनिवार्यता है, अपने इष्ट प्रभु से प्रेम, पुरुष का स्त्री या स्त्री का पुरुष के प्रति प्रेम, श्रंृंगार वह सोपान है, जिस पर चलकर इन्सान अध्यात्म और भक्ति अंततः मुक्ति के द्वार तक पहंुुच जाता है। 
कला और कलाकार के संदर्भ में वह लिखती हैं कि कला आध्यात्मिक आनंद की साधना का चरमोत्कर्ष है, कला आत्मा-परमात्मा का मिलन है, किंतु मेरी समझ में कला संप्रेषण की वह शक्ति है, जो लोगों को संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठाकर उसे उदात्त ऊंचे स्थान पर पहुंचा दे, जहां मनुष्य केवल मनुष्य रह जाता है। व्यक्ति ‘स्व‘ से निकलकर ‘वसुधैव कुटुंबकम्‘ के भाव से जुड़ सके। 

एक अध्याय में वह लिखती हैं कि कला में प्रभु का वास है। इसलिए प्रत्येक कलाकार की कलायात्रा असाधारण परीक्षा मांगती है, असाधारण समर्पण मांगती है, इसलिए असाधारण त्याग मांगती है। किसी कलाकार की कलायात्रा सहसा रुक जाए, इससे बड़ी पीड़ा क्या हो.......।

अक्सर देखा जाता है कि जैसे जैसे कलाकारों को प्रसिद्धि मिलती है, वह लोगों से दूर होने लगते हैं। उनके प्रशंसक उनसे मिल नहीं पाते। लेकिन, उनके व्यक्तित्व में लोक से जुड़ने की बहुत आतुरता है। जैसे कोई गीत एक ने शुरू किया, उसे सब मिलकर गाते हैं। वैसे ही मालिनी जी लोक से जुड़कर रहने में विश्वास करती हैं। यह उनके इस पुस्तक से भी झलकता है। 
परंपरा से तात्पर्य एक सांस्कृतिक व्यवहार से है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित किया गया है, आखिर सभी परंपराएं समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए ही तो बनी थी, ये परंपराएं समाज ही निर्मित करता आया है, समय अवसर अनुकूल। परंपराएं बदलनी भी चाहिए, सम्मान पर कन्या का अधिकार है।
 

इस तरह वह नारी के दर्द को भी महसूस करती हैं। साथ ही, स्त्री सशक्तिकरण का पुरजोर समर्थन करती हैं। वह प्रगतिशील सोच से भी लैस हैं। वह परंपरा में आधुनिकता सोच की व्याख्या करती हैं। यह उनकी लेखनी से झलकता है।
स्त्री का जीवन कर्तव्य और भावनाओं की गहरी नदी में काठ की नाव की सवारी है। किनारे तक पहंुचने पर पता चलता है कि जीवन बीत गया! कितनी बार महिला कलाकार को आलोचना, फब्तियां, सार्वजनिक ताने तोड़ देते हैं। 

आज के दशकों पहले ग्रामीण भारतीय समाज एक ऐसी संरचना थी, जिसमें स्त्रियां संकोच भरी मर्यादा में अपना जीवन जीती थीं। उनके भाव विरेचन के लिए सिनेमा, साहित्य, संगीत और प्रदर्शन कलाओं की उपलब्धता न के बराबर थी। कला में अपने जीवन को तलाशना उनके पास विकल्प के तौर पर था ही नहीं, अतः अपने जीवन को ही कलात्मक बनाकर स्वयं स्वांग रचकर, फिर स्वयं ही उसकी प्रेक्षक बनना उनके पास सबसे सहज साधन था। 

लेखिका मालिनी के पहले गुरु मशहूर कलाकार उस्ताद राहत अली थे। उनके सान्निध्य और सीखने के सिलसिले का एक अध्याय में उन्होंने बहुत सुघड़ता से समेटा है। वह गुरुओं और पूर्वजों के आशीर्वाद में विश्वास करतीं हैं। इसे वह बार बार स्वीकार करती हैं। इसी क्रम में वह लिखती हैं कि अपने उस्ताद के साथ, उनके उस्ताद के सामने अपनी तालीम की परीक्षा देने गई थी, झोली में बहुत कुछ लेकर लौटी। जिंदगी में किस्मत, काबिलियत, हुनर सब कुछ तभी चमकते हैं, जब उनमें दुआएं असर करती हैं। वरना कितने आए, कितने गए और कितने आएंगें अभी.......।

पुस्तक के अंतिम अध्याय में उन्होंने भारतीय सांस्कृतिक परंपरा को निभाते हुए, बहुत सुंदर लिखा है कि प्रत्येक पर्व, त्योहार पर जब कथा कही जाएगी तो कथा समापन में स्वस्तिवाचन सभी के सुख की कामना से होगा। भारतीय जीवन दर्शन परंपरा के रूप में कैसे आया, तीज, त्योहार, व्रत की कथाएं उसका अनुपम उदाहरण है। सभी का मंगल हो, सभी सानंद रहें, सभी के क्षेम की उद्दीप्त भावना वाले समाज में अनायास ही नहीं कि हर पर्व, पूजा और लोक कथा का समापन इसी मंगल कामना के साथ होता है कि, जैसे उनके दिन बहुरैं, वैसे सबके दिन बहूरें। यही भारतीय संस्कृति का मूल चिंतन है। 

इस किताब में कुछ 27 अध्याय हैं। हर अध्याय में एक अनोखी कथा है। लेखनी में प्रवाह है, कथ्य और कथन में सहजता है। यह पुस्तक हर उम्र के पाठक के लिए है। यह पुस्तक पढ़ने वाले को बहुत सी परंपरा-रीति रिवाजों का ज्ञान भी देता है। यह इसकी विशेषता है। इस संदर्भ में, लेखिका मालिनी अवस्थी लिखती हैं कि यह जो आपके हाथ में है, एक किताब नहीं, मेरे मन का प्रवाह है, अपने आस पास के परिवेश के देखे, जिए, अनुभूत लोकचित्र हैं, लोक से प्रेरित अभिव्यक्ति है, लोक है, यानी आप सभी का है। 




Wednesday, May 14, 2025

shashiprabha: #आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवारी----गुंजायमान संध्या ...

shashiprabha: #आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवारी----गुंजायमान संध्या ...:                                                                                                                 #आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवार...

#आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवारी----गुंजायमान संध्या कवि जयदेव की अष्टपदी से

                                                           
                                                    #आज के कलाकार@शशिप्रभा तिवारी

                                             गुंजायमान संध्या  कवि जयदेव की अष्टपदी से 


                                                  
पिछले दिनों जयदेव उत्सव का आयोजन संचारी फाउंडेशन की ओर से किया गया। यह दो दिवसीय आयोजन एक और दो मई 2025 को था। इंडिया हैबिटैट सेंटर में आयोजित उत्सव में कवि जयदेव की अष्टपदी को उड़ीसा की परंपरागत शास्त्रीय संगीत और ओडिसी नृत्य के माध्यम से पेश किया गया। इस उत्सव की आयोजिका ओडिसी नृत्यांगना कविता द्विवेदी वर्षों से यह आयोजन राजधानी में करती रही हैं। शुरुआत में यह तीन दिनों का आयोजन हुआ करता था। इसमें जयदेव के साहित्य और संगीत पर विशद चर्चा विद्वानों और कलाकारों द्वारा किया जाता था। लेकिन, कुछ आर्थिक दिक्कतों के कारण वह कई वर्षों से इसका आयोजन नहीं कर पाईं। इस वर्ष एक बार से जयदेव उत्सव का आयोजन कर नई पहल की है। उनके इस पहल का कलाकारों ने खुले मन से स्वागत किया। यह एक शुभ संकेत माना जा सकता है। 



जयदेव उत्सव की पहली संध्या में ओडिसा की गायिका संगीता ने कई अष्टपदियों को विभिन्न रागों में पिरोया। उन्होंने राग गुणकरि या शुद्ध धनाश्री में अष्टपदी ‘सखि हे केसिए मथनमुदारम्‘, राग देसवरणी व रूपक ताल में अष्टपदी ‘तव विरहे वनमाली‘ और राग रामकिरि में अष्टपदी चंदन चर्चित नील कलेवर को पेश किया। उन्होंने खुली और मधुर आवाज में अष्टपदियों को गाकर एक सुंदर शुरूआत की। दूसरी पेशकश ओडिसी नृत्यांगना कविता द्विवेदी की थी। उन्होंने अभिनय से पूर्ण नृत्य पेश किया। कविता और कृष्ण के विरह भावों को बहुत परिपक्वता के साथ किया। इसके लिए अष्टपदी ‘निंदति चंदनम इंदु किरणम निंदति देव अधीरं‘ का चयन किया गया था। यह राग सिंधु काफी और एक ताली में निबद्ध था। मोहिनीअट्टम नृत्यांगना चित्रा सुकुमारन ने राधिका के भावों को विवेचित किया। उन्होंने अष्टपदी ‘सखी हे केसिहे मथनमुदारम् भावों को दर्शाया। यह राग शुद्ध सारंग में निबद्ध थी। 

कथक नृत्यांगना संगीता चटर्जी को अष्टपदी पर नृत्य करते देखना मोहक लगा। कथक नृत्य में इस तरह के प्रयास आजकल युवा कलाकारों में कम ही देखने को मिलता है। इस नजरिए से कथक नृत्यांगना ने बैठकी भाव के जरिए राधा और कृष्ण के भावों को निरूपित किया। अष्टपदी ‘ललित लवंग लता परिशीलन‘ में बसंत ऋतु में राधा और कृष्ण में मधुरिम मिलन के भावों को पूरी कोमलता और मधुरता से संगीता ने दर्शाया। यह अष्टपदी राग बसंत और तीन ताल में निबद्ध थी। वहीं दूसरी अष्टपदी ‘कुरु यदुनंदन चंदन शिशिरे‘ थी। 

जयदेव उत्सव की दूसरी संध्या में गायक प्रशांत बेहरा ने अष्टपदियों को सुरों में पिरोया। उन्होंने गायन की शुरुआत जगन्नाथ अष्टकम से किया। उन्होंने राग भैरवी और जती ताल में अष्टपदी ‘याहि माधव याहि केशव‘ को गाया। दूसरी अष्टपदी राम मिश्र खमाज और एक ताली में निबद्ध थी। ‘श्रीता कमला कुचा मंडला हरि‘ को मधुरता से गाया। गायक प्रशांत बेहरा लगभग बीस वर्षों से राजधानी दिल्ली में ओडिसी नृत्यांगनाओं के साथ संगत करते रहे हैं। अब यह कला जगत में एक पहचाना चेहरा बन गया है। उनकी गायकी मधुर और अदायगीपूर्ण है।  
                                           

भरतनाट्यम नृत्यांगना रागिनी चंद्रशेखर ने मोहक नृत्य पेश किया। उन्होंने कमाल का नृत्य पेश किया। उनके नृत्य में आंगिक और मुखाभिनय के साथ-साथ आंखों के भावों का सुंदर समायोजन दिखा। उन्होंने कम प्रचलित अष्टपदियों का चयन किया था। पहली अष्टपदी ‘किम करिस्यति किम दृश्यति‘ थी। यह राग हमीर कल्याणी और आदि ताल में निबद्ध थी। दूसरी अष्टपदी ‘किशलय शयनम तले कुरु कमिनी‘ थी। यह राग द्विजावंती और मिश्र चापू में निबद्ध थी। राधा और कृष्ण के एक एक भाव को रागिनी ने बहुत बारीकियों से पेशकर दर्शकों को बांध लिया। 

जयदेव उत्सव का समापन ओडिसी नृत्यांगना ज्योति श्रीवास्तव के नृत्य से हुआ। उन्होंने देवप्रसाद शैली का अनुसरण करते हुए, अभिनय से पगा नृत्य पेश किया। उनकी पहली पेशकश प्रोषितभर्तृका नायिका थी। उनका नृत्य अष्टपदी-‘विहरति वने राधा साधारणप्रणये‘ पर आधारित थी। यह रचना राग मिश्र काफी और जती ताल में निबद्ध थी। दूसरी प्रस्तुति अष्टपदी ‘रती सुख सारे गतम् अभिसारे‘ थी। इसमें वासकसज्जा नायिका के भावों को दर्शाया। 




Friday, May 9, 2025

shashiprabha: #आज के कलाकार @शशिप्रभा तिवारी

shashiprabha: #आज के कलाकार @शशिप्रभा तिवारी: #आज के कलाकार @शशिप्रभा तिवारी ...

#आज के कलाकार @शशिप्रभा तिवारी



#आज के कलाकार @शशिप्रभा तिवारी

मंगलोत्सव में गुरु का स्मरण

                                                


मंगलोत्सव का आयोजन पिछले दिनों इंडिया हैबिटैट सेंटर में किया गया। यह आयोजन बनारस घराने की प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका विदुषी गिरिजा देवी की स्मृति में था। गिरिजा दर्शन ट्रस्ट की ओर से गिरिजा देवी के 96वें जन्म दिवस पर यह समारोह आयोजित था।

आठ मई की शाम कुछ बोझिल सी थी। एक तरफ देश की सीमाओं पर तनाव का माहौल बना हुआ था। और लगातार पत्रकार मित्रों के संदेश आ रहे थे। जिससे हर किसी का थोड़े से तनाव में आ जाना लाजिमी था। इन सब के बावजूद, कलाकारों का संकल्प नमन करने योग्य है, क्योंकि आयोजिका शास्त्रीय गायिका और अप्पा जी की शिष्या सुनंदा शर्मा ने कार्यक्रम में शिरकत भी किया और आयोजन को सफलतापूर्वक संपन्न करवाया। शायद, इसलिए कला के उपासक भारतीय संस्कृति में वाग्देवी के आराधक श्रेष्ठ माने जाते हैं। वैसे भी भारत में तो युद्ध से पहले भी रणभेरी, नगाड़े, शंख आदि बजाने की परंपरा है। वास्तव में, यह नाद अराधन भी राष्ट्र अराधन का ही रूप है। अतः इस आयोजन में भाग लेने वाले कलाकारों के साथ-साथ सभागार में उपस्थित हर श्रोता वंदनीय है।

शास्त्रीय गायिका सुनंदा शर्मा ने अपनी गुरु को याद करते हुए, कहा कि अप्पा जी सिर्फ मेरी गुरु नहीं थीं, वे मेरी संगीत और जीवन यात्रा की प्रेरणा थीं। मंगलोत्सव का यह आयोजन मेरे लिए उनको एक श्रद्धांजलि है। साथ ही यह वादा भी कि मैं उनकी परंपरा को पूरे समर्पण से आगे बढाऊंगी।


पठानकोट में जन्मी और पली बढ़ी गायिका सुनंदा शर्मा ने अपने गुरु के साथ लंबा समय बीताया। वह बनारस में रहकर गुरु शिष्य परंपरा में संगीत की शिक्षा लीं, बल्कि बनारस की संस्कृति-संस्कारों को अपनाया है। इसलिए, उनके संगीत में सिर्फ बनारस घराने के सुर ही नहीं हैं, बल्कि बनारसीपन भी झलकता है। बहरहाल, समारोह में वह जुगलबंदी पेश करने को उपस्थित थीं। उनके साथ बांसुरीवादक रूपक कुलकर्णी थे। दोनों ही कलाकार एकल प्रस्तुति के लिए जाने जाते हैं। लेकिन, सुनंदा शर्मा और रूपक कुलकर्णी ने बहुत ही संतुलित और संयमित संगीत पेश किया। संगीत में मुख्य कलाकार को संगत करना एक बात होती है और जुगलबंदी विशेष हो जाती है। इस प्रस्तुति का आगाज, राग यमन कल्याण के आलाप से हुआ। दोनों ही कलाकारों ने सांध्यकालीन राग के आलाप में तीव्र मध्यम और अन्य शुद्ध स्वरों का प्रयोग मोहक था। इसी क्रम में सुनंदा ने मध्य लय में रचना ‘न जानू कैसी प्रीत‘ को सुरों में पिरोया। इसके बरक्स बांसुरी पर रूपक कुलकर्णी में लयकारी और तानों को पेश किया। तीन ताल में निबद्ध बंदिश की बढ़त में बोल और आकार की तानों का प्रयोग भी सरस था। अगले अंश में गायिका सुनंदा शर्मा ने मिश्र खमाज में ठुमरी ‘इतनी अरज मान मान ले‘ गाया। यह जत ताल में थी। अंत में, अप्पा जी की मशहूर कजरी ‘कहनवा मान ओ राधा रानी‘ को सुरों में पिरोया। तबले पर पंडित मिथिलेश झा और हारमोनियम पर डाॅ सुमित मिश्रा ने रसमय संगत किया। कलाकारों की इस प्रस्तुति ने अच्छा समां बांधा।






अगले कलाकार वरिष्ठ शास्त्रीय गायक पंडित साजन मिश्रा और उनके शिष्य स्वरांश मिश्रा थे। उन्होंने राग बागेश्वरी पेश की। उन्होंने राग बागेश्वरी के आलाप से गायन आरंभ करने के बाद, विलंबित लय की बंदिश को सुरों में पिरोया। बंदिश के बोल थे-‘रे कौन गत भई‘। यह एक ताल में निबद्ध थी। उन्होंने मध्य लय की बंदिश ‘एरी मैं कैसे घर जाऊं‘ को सुरों में ढाला। उन्होंने पंडित राजन मिश्रा रचित बंदिश ‘जमुना जल भरन न देत कन्हाई‘ को पेश किया। उन्होंने तराने को भी गाया। उनके साथ तबले पर पंडित विनोद लेले और हारमोनियम पर डाॅ विनय मिश्रा थे।

कार्यक्रम में गाने से पूर्व पंडित साजन मिश्र ने कहा कि आज का कार्यक्रम गुरु की याद में सुनंदा जी कर रही हैं। अप्पा जी बनारस घराने की वरिष्ठ कलाकार थीं। मेरा बचपन से उनसे तालुक था। यह अद्भुत संयोग है कि उनको समर्पित सुबह बनारस में एक कार्यक्रम में गाया और शाम को भी उन्हीं को समर्पित उत्सव में गा रहा हूं।

Tuesday, May 6, 2025

shashiprabha: #आज का कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी-------- गुरु मौन प्...

shashiprabha: #आज का कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी-------- गुरु मौन प्...:   #आज का कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी                                                          गुरु मौन प्रकाश है-ज्योति श्रीवास्तव पिछले दिनों ज...

#आज का कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी-------- गुरु मौन प्रकाश है-ज्योति श्रीवास्तव

 



#आज का कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी

                                                         गुरु मौन प्रकाश है-ज्योति श्रीवास्तव




पिछले दिनों जयदेव उत्सव का आयोजन संचारी फाउंडेशन की ओर से किया गया। यह दो दिवसीय आयोजन एक और दो मई 2025 कां था। इंडिया हैबिटैट सेंटर में आयोजित उत्सव का समापन ओडिसी नृत्यांगना ज्योति श्रीवास्तव के नृत्य से हुआ। उन्होंने देवप्रसाद शैली का अनुसरण करते हुए, अभिनय से पगा नृत्य पेश किया। उनकी पहली पेशकश प्रोषितभर्तृका नायिका थी। उनका नृत्य अष्टपदी-‘विहरति वने राधा साधारणप्रणये‘ पर आधारित थी। यह रचना राग मिश्र काफी और जती ताल में निबद्ध थी। दूसरी प्रस्तुति अष्टपदी ‘रती सुख सारे गतम् अभिसारे‘ थी। इसमें वासकसज्जा नायिका के भावों को दर्शाया।
ओडिसी नृत्यांगना ज्योति श्रीवास्तव देश की जानीमानी ओडिसी नृत्यांगना हैं। उन्होंने गुरु दुर्गा चरण रणबीर और गुरु श्रीनाथ राउत की नृत्य रचनाओं को परंपरागत अंदाज में पेश किया। उन्होंने अभिनय में नायिका राधा और नायक कृष्ण के भावों को बहुत परिपक्वता और सुघड़ता से निभाया। उन्होंने नेत्रों, मुख और हस्तकों के जरिए एक एक बारीकी को खूबसूरती से उकेरा। अष्टपदी में राधा और कृष्ण के अलौकिक प्रेम का वर्णन है। देवप्रसाद ओडिसी नृत्य शैली में गुरुओं का मानना है कि राधा और कृष्ण दोनों एक हैं। राधा प्रकृति के हर अंश में कृष्ण का दर्शन करती है। नायिका राधा का विशेष प्रकृति प्रेम ही नृत्यांगना ज्योति के अभिनय में रूपायित होता दिखा। उनका अभिनय स्थूल से सूक्ष्म या द्वैत से अद्वैत को परिभाषित करता प्रतीत हुआ। इसमें नृत्य, गुरु और कला के प्रति समर्पण भाव का योगदान है, क्योंकि लंबे समय तक अपने नृृत्य कला को संजोकर रखना कलाकार के लिए एक चुनौती होती है। यह लगातार अभ्यास और कला के प्रति विशेष लगाव से ही संभव है। वास्तव में, अभिनय की सूक्ष्मता में अपने गुरु की शैली की शुद्धता कायम रखना आज के समय कलाकारों के लिए बड़ी जिम्मेदारी है। यही उनकी विशेषता भी है।
गौरतलब है कि पिछले दिनों उनके गुरु दुर्गा चरण रणबीर पùश्री से सम्मानित हुए। गुरु को सम्मान मिलना एक शिष्य के लिए गौरव का विषय होता है। इस बात को ओडिसी नृत्यांगना ज्योति श्रीवास्तव भी मानती हैं। और इसी मद्देनजर उन्होंने गुरु के सम्मान में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में रात्री भोज का आयोजन किया। इस सम्मान मिलन समारोह में राजधानी दिल्ली की कई नृत्यांगनाएं शामिल हुईं। इस अवसर पर गुरु दुर्गा चरण रणबीर, उनकी पत्नी और नृत्यांगना पुत्री भी उपस्थित थे।



अपने गुरु के बारे में ज्योति कहती हैं कि गुरु जी के लिए ज्ञान सर्वोपरि रहा है। नृत्य के सैद्धांतिक, प्रायोगिक और रचनात्मक पक्ष सभी में उनका ज्ञान अद्वितीय है। वह संपूर्ण कला मर्मज्ञ हैं। मैं बचपन से ही उनसे नृत्य सीखी और आज भी उनके सान्निध्य में हूं। मैं अपनी सीनियर फेलोशिप का शोधकार्य उन्हीं के मार्ग दर्शन में पूरा कर रही हूं। मेरा सौभाग्य है कि गुरु मां का प्रेम मेरे प्रति अगाध है। मेरे पिता के न रहने के बाद पिता का प्यार और स्नेह मुझे गुरु जी से ही मिला।
ओडिसी नृत्यांगना ज्योति आगे कहती हैं कि गुरु के ज्ञान से पूरा जगत प्रकाशित होता है। आज मैं जो कुछ भी हूं, उसका पूरा श्रेय गुरु जी को ही जाता है। गुरु कृपा कई जन्मों के सुकर्म का फल होता है। हम अपनी संतान के जन्म के साथ ही उसके पालन पोषण में अपना सर्वस्व न्योछावर करते हैं। लेकिन कला जगत में गुरु को तो हम जानने के बाद ही उनसे जुड़ते हैं। उनको स्वीकार करते हैं। गुरु का सम्मान हम नहीं करते, तो यह कला के साथ बेईमानी है। गुरु के प्रति प्रेम, गुरु की सीख, गुरु की डांट, उनके द्वारा दी गई सजा, सब कुछ गुरु का प्रसाद है। उसे इसी रूप में हम ग्रहण करते हैं। तभी गुरु शिष्य का संबंध प्रगाढ़ बन पाता है। गुरु से जुड़कर ही हम कला के पथ के पथिक बन पाते हैं क्योंकि हमारी कलाएं अध्यात्मिक हैं। इसे अपनाने से पहले हमें भक्ति और अध्यात्म भाव से खुद को परिपूर्ण करना जरूरी है। गुरु दीपक की तरह है। दीपक कुछ बोलता नहीं है। दीपक मौन रहता है, उसका प्रकाश ही उसका परिचय देता है। सफल व्यक्ति कभी खुद को उजागर नहीं करते, बल्कि उनकी उपलब्धियां उन्हें उजागर करती हैं। गुण या कला या हुनर ही गुरु का प्रकाश है, जो शिष्यों के भी ज्योतिरूप में प्रकाशित होता है।


Wednesday, January 15, 2025

#आज के कलाकार-- नृत्य संरचना-पधारो म्हारे देश जी! की प्रस्तुति @शशिप्रभा तिवारी

                                                            #आज के कलाकार 

                                                   नृत्य संरचना-पधारो म्हारे देश जी! की प्रस्तुति

                                                      @शशिप्रभा तिवारी 

बीते दिनों लोकसभा का 96 वां स्थापना दिवस मनाया गया। इस अवसर पर बालयोगी सभागार में लोकसभा कर्मचारी संघ की ओर से समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह के सह आयोजकों में कथक धरोहर और गांधी मंडेला फाउंडेशन शामिल थे। इस आयोजन में नृत्य परिकल्पना ‘पधारो म्हारे देश‘ पेश किया गया। इसकी नृत्य संरचना कथक नर्तक सदानंद विश्वास ने की थी। आलेख शशिप्रभा तिवारी की थी। 

समारोह के मुख्य अतिथि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला थे। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि अपने अब तक के कार्यकाल में मैंने सचिवालय की कार्य प्रणाली को बहुत करीब से देखा है। लोकसभा कर्मचारियों के समर्थन और सहयोग से देर रात तक बैठकर भी सभा का कार्य सुचारू रूप से संचालित किया गया है। आशा है कि आगे भी सभी अधिकारी और कर्मचारीगण इस संस्था को ईमानदारी, समर्पण और कड़ी मेहनत का जीवंत उदाहरण बनाने के लिए अपने निष्ठावान प्रयास जारी रखेंगें। 

नृत्य परिकल्पना पधारो म्हारे देश की शुरूआत राजस्थान के प्रसिद्ध मांड पधारो म्हारे देश से हुई। इस लोकगीत पर कथक नर्तक सदानंद विश्वास ने स्वागत नृत्य किया। इसके बाद पूर्वोŸार के लोक व शास्त्रीय नृत्य की झलक बिहू और मणिपुरी के माध्यम से पेश किया गया। अगले अंश में बंगाल के लोकगीत आमारे मोने मानुषेर संग पर कलाकारों ने एक ओर नृत्य पेश किया, दूसरी ओर पुरूलिया व मयूरभंज छऊ नर्तकों ने भ्रमरी और अंग संचालन के माध्यम से पूर्व भारत की उपस्थिति दर्ज किया। 

केरल के संदर्भ को कथकलि नृत्य के जरिए प्रेषित किया गया। वहीं, उत्तर भारत की संस्कृति को कथक नृत्त में पिरोया गया। कथक की तिहाइयों, चक्रदार तिहाइयों, लड़ी, तराने और रचना डिमिक डिमिक डमरू बाजे को नृत्य में पेश किया गया। इसके अलावा, कथक नर्तक सदानंद ने गजल ‘कभी बन संवर के जो आ गए‘ में अभिनय को दर्शाया। उन्होंने अपने माध्यम से लखनऊ घराने की नजाकत, सलामी की गत और कई तिहाइयों का प्रयोग किया। हालाकि, वह जयपुर घराने के पंडित राजेंद्र गंगानी के शिष्य हैं। पर कथक के कलाकारों की यह आपसदारी अच्छी है। एक दूसरे की चीजों को अपने नृत्य में शामिल करना एक अच्छी पहल मानी जा सकती है। 

पधारो म्हारे दश नृत्य संरचना के अगले अंश में देश के पश्चिमी अंचल को साकार किया गया। इसके लिए गुजरात के डांडिया रास, पंजाब के भांगड़ा और राजस्थान के सपेरा  लोकनृत्य को पेश किया गया। डंाडिया रास गीत रंग तार मा चंद्रमा पर नृत्यांगनाओं ने मोहक नृत्य पेश किया। असी फौजी पुत कहांवों पंजाबी लोकगीत पर आधारित भांगड़ा लोकनृत्य बेहद मनोरंजक था। सपेरा नृत्य गीत ‘बाजा बाज गयो डंुगर में‘ पर आधारित था। अंत में भरतनाट्यम नृत्य के जरिए दक्षिण भारत के रंग को नृत्य रचना में समाहित किया गया। तिल्लाना शैली में भरतनाट्यम नृत्य की प्रस्तुति बेहद संक्षिप्त थी। अंत में नृत्य की पराकाष्ठा वंदे मातरम् और बजे सरगम गूंजे देश राग के माध्यम से सभी कलाकारों ने एक साथ पेश किया। 

कथक नर्तक सदानंद विश्वास समय समय पर विभिन्न नृत्य रचनाओं को अपनी कोरियोग्राफी में पिरोकर पेश करते रहे हैं। आज कल यह एक प्रचलन बन गया है। बड़ी संख्या में शास्त्रीय और लोक कलाकारों की सामूहिक प्रस्तुति का। वैसे तो यह एक अच्छी पहल है कि इस तरह के आयोजनों से बड़ी संख्या में कलाकारों को मंच मिलता है। बहरहाल, आयोजकों को शास्त्रीय नृत्य शैली की एकल प्रस्तुतियों को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। क्योंकि एकल प्रस्तुतियों में शास्त्रीय नृत्य की शुद्धता को कायम रख पाना कलाकारों के लिए सरल होता है। 


 



 


Wednesday, January 8, 2025

shashiprabha: #आज के कलाकार ----पांचवें सूरदास महोत्सव में नृत्य...

shashiprabha: #आज के कलाकार ----पांचवें सूरदास महोत्सव में नृत्य...:                                                                     #आज के कलाकार पांच...

#आज के कलाकार ----पांचवें सूरदास महोत्सव में नृत्य प्रस्तुतियां @शशिप्रभा तिवारी

                                                                   #आज के कलाकार

पांचवें सूरदास महोत्सव में नृत्य प्रस्तुतियां

@शशिप्रभा तिवारी


बीते तीस दिसंबर 2024 को गीतांजलि इंटरनेशनल फाउंडेशन की ओर से पांचवी संत शिरोमणि सूरदास महोत्सव का आयोजन किया गया। यह महोत्सव दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित था। समारोह में विदुषी रंजना गौहर, विदुषी कमलिनी व नलिनी, गुरु गीतांजलि लाल, विदुषी उमा डोगरा, जयप्रभा मेनन, विदुषी भारती शिवाजी जैसे विद्वतजन उपस्थित थे। इसके अलावा, बड़ी संख्या में कलाकार भी कार्यक्रम के साक्षी बने। इससे इस समारोह की गरिमा और बढ़ गई।

सूरदास समारोह का आरंभ विदुषी उमा डोगरा की शिष्याओं की प्रस्तुति से हुआ। शिष्याएं दीक्षा रावत और कार्तिका उन्नीकृष्णन ने युगल कथक नृत्य पेश किया। उन्होंने पंद्रह मात्रा की पंचम सवारी ताल पर आधारित शुद्ध नृŸा में अपने नृत्य को पिरोया। उपज में लयकारी का अंदाज पैर के काम में आकर्षक अंदाज में पेश किया। इसमें पंद्रहवें और आठवें मात्रा पर उनका सम पर आने का ढंग लासानी था। वहीं खाली मात्राओं को दर्शाना भी सहज था। रूख्सार और घूंघट की गतों के साथ साथ तिहाइयों और परणों का प्रयोग लासानी था। उनका आहार्य और आभूषणों को धारण करने में पारंपरिक छवि दिखी, जो आजकल कथक कलाकारों में कम ही दिखता है। यह श्रेय उनकी गुरु उमा डोगरा को जाता है कि उन्होंने यह सलीका शिष्याओं में कायम रखा है। शास्त्रीय नृत्य में आहार्य का विशेष महत्व और गरिमा है। इसे युवा कलाकारों को ध्यान में रखना जरूरी है।



इस समारोह की मुख्य आकर्षण भरतनाट्यम नृत्यांगना विदुषी रमा वैद्यनाथन का नृत्य रहा। उनके साथ संगत कलाकारों में सुधा रघुरामन, जी रघुरामन, वरूण राजशेखर और मनोहर बालचंद्रन शामिल थे। उन्होंने वरणम के जरिए मधुर भक्ति को नायिका के भावों में दर्शाया। यह श्यामा शास्त्री की रचना ‘स्वामी रम्यभावे‘ पर आधारित थी। यह राग आनंद भैरवी और चैदह मात्रा की अट ताल में निबद्ध था। कांचिपुरम के मुख्य देवता वरदराजन की शोभा यात्रा के प्रति नायिका के विभिन्न अवस्थाओं के भावों को नृत्यांगना रमा ने चित्रित किया। उन्होंने हस्तमुद्राओं, भंगिमाओं, विशेषकर अंगुलियों का बहुत ही मनोरम प्रयोग किया। संचारी
भाव में गजब की परिपक्वता और निमग्नता दिखी। एक ओर गायिका सुधा रघुरामन का गायन ओजपूर्ण था, दूसरी ओर नृत्यांगना रमा वैद्यनाथन का अभिनय प्रवाहमान बन पड़ा। अपनी पूरी प्रस्तुति के दौरान उन्होंने दर्शकों को बांधे रखा। यह शास्त्रीय नृत्य की पहली शर्त होती है कि कलाकार तादात्म्य स्थापित कर लें। इसमें दोनों ही कलाकारों को महारत हासिल है।



वरिष्ठ कथक नृत्यांगना विदुषी रानी खानम ने मोहक कथक नृत्य पेश किया। उन्होंने सूरदास के पद ‘सुंदर बदन सुखद सदन‘ से नृत्य आरंभ किया। इसमें श्रीकृष्ण की स्तुति थी। अगले अंश में तीन ताल में उन्होंने शुद्ध नृŸा पेश किया। इसमें उपज, छूट की तिहाई, रेला, पंडित बिरजू महाराज की रचना में शिकार के क्रम में तीर चलाने का अंदाज, नाव की गत, सवाल-जवाब का अंदाज शामिल था। उनके साथ प्रांशु चतुरलाल, जयवर्धन दधीच, नासिर खान और निशा केसरी ने संगत किया।

सूरदास महोत्सव में दोनों वरिष्ठ नृत्यांगनाओं ने युगल नृत्य पेश किया। भरतनाट्यम और कथक नृत्य के अभिनय का अंदाज इस प्रस्तुति में दिखा। इसके लिए सूरदास के पद ‘भूलत हौं कत मीठी बातन‘ का चयन किया गया था। दोनों ही कलाकारों ने सरस अभिनय से मोहक छवि उकेरी। यह प्रस्तुति हिंदुस्तानी संगीत पर आधारित थी, यदि कर्नाटक शैली में भी संगीत होता तो बात और बन जाती है। यह एक कमी खल गई। लेकिन, कुल मिलाकर यह शाम वाकई सार्थक रही।


विदुषी उमा शर्मा की शिष्या कथक नृत्यांगना गीतांजलि शर्मा ने इस समारोह का आयोजन किया था। गीतांजलि शर्मा इससे पहले संत शिरोमणि सूरदास महोत्सव का आयोजन मथुरा में करती रही हैं। उनके आयोजन में उनकी गुरु शामिल होती हैं। गुरु के मार्ग दर्शन में वह अपना आयोजन करती हैं। यह सराहनीय है।

Friday, December 6, 2024

shashiprabha: #कोणार्क उत्सव 2024 -शास्त्रीय नृत्य का महाकुंभ को...

shashiprabha: #कोणार्क उत्सव 2024 -शास्त्रीय नृत्य का महाकुंभ को...:                                                                     #कोणार्क उत्सव 2024                                                     ...

#कोणार्क उत्सव 2024 -शास्त्रीय नृत्य का महाकुंभ कोणार्क उत्सव @शशिप्रभा तिवारी

                                                                   #कोणार्क उत्सव 2024

                                                       शास्त्रीय नृत्य का महाकुंभ कोणार्क उत्सव 

                                                           @शशिप्रभा तिवारी

भारतीय संगीत-नृत्य के लंबे और गहरे अंतर-संबंध हैं। उनको ऐतिहासिक या व्यवहारिक नजरिए से देखना एक सदी के इतिहास के अध्ययन करने जैसा है। हर कलाकार अपनी शिल्प के अघ्र्य से कला के समुद्र में अपना योगदान देता है। कुछ सौभाग्यशाली कलाकारों को समय याद रखता है और कुछ कलाकार काल के गर्त में समाकर धूमिल हो जाते है। कलाएं ही हमारा ऐसा स्वअर्जित लोकतंत्र हैं, जहां उनके प्रभाव में रहने पर दर्शक को अभय की सीख मिलती है। ऐसा ही अहसास हुआ, कोणार्क उत्सव 2024 की संध्याआंे में भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुतियों को देखते हुए।

कोणार्क उत्सव का समापन दिवस यानी पांच दिसंबर को दीक्षा मंजरी और नाट्य वृक्ष के कलाकारों ने शिरकत किया। नाट्य वृक्ष ने भरतनाट्यम शैली में नृत्य संरचना प्रवाहति पेश किया। इसकी परिकल्पना गुरु गीता चंद्रन ने किया था। इस प्रस्तुति में मल्लारी, सखी स्वरम और रास के माध्यम से देवी पार्वती के भावों को विवेचित किया। समय स्थिर नहीं रहता है। यह परिवर्तनशील है। समय और स्थान के परिप्रेक्ष्य में भावों को विवेचित किया गया। 

समारोह की अंतिम संध्या में ओडिसी नृत्य शैली में दीक्षा मंजरी के कलाकारों ने नृत्य पेश किया। इनका निर्देशन वरिष्ठ ओडिसी नृत्यांगना डोना गांगुली ने किया। प्रस्तुत नृत्य की परिकल्पना गुरु केलुचरण महापात्र और गुरु रतीकांत महापात्र की थी। संगीत रचना पंडित भुवनेश्वर मिश्र और देबाशीष सरकार की थी। दीक्षा मंजरी के कलाकारों ने सूर्य वंदना, मंगलाचरण-विष्णु वंदना, सावेरी पल्लवी और दुर्गा प्रस्तुत किया।  

कोणार्क उत्सव की चैथी संध्या में कुचिपुडी नृत्यांगना दीपिका रेड्डी और शिष्याओं ने मोहक नृत्य पेश किया। दीपांजलि कलाकारों की पहली प्रस्तुति कुचिपुडी वंदना थी। इस प्रस्तुति में गणपति के साथ कुचिपुडी गांव के मुख्य देवता भगवान शिव का आह्वान किया गया। गणेश की वंदना ‘जय गणपति वंदे‘ में गणपति, कार्यसिद्धिप्रदायक, शुभम, जगतपिता, करूणाकर रूपों को दर्शाया गया। साथ ही, देवी के त्रिपुरसंुदरी, महालक्ष्मी, परमेश्वरी, जगजननी रूपों को विवेचित किया गया। उनकी दूसरी प्रस्तुति वाग्यकार भक्त रामदासु की रचना ‘थक्कुवेमि मनकु‘ पर आधारित थी। इसमें विष्णु के राम अवतार को प्राथमिकता से चित्रित किया गया। दशावतार को दर्शाते हुए, अंत में राम दरबार का निरूपण मर्मस्पर्शी था। वहीं अगली प्रस्तुति ‘मधुरम मधुरम कस्तूरी तिलकम‘ में कृष्ण की लीलाओं का चित्रण मोहक था। नंद यशोदा के द्वारा पूतना वध, नवनीत चोर, ब्रह्मण्ड दर्शन, कालिया मर्दन, विभिन्न दैत्यों के संहार आदि प्रसंगों को पेश किया गया। भाव भंगिमाओं, आंगिक अभिनय और संचारी भाव के साथ तरंगम की प्रस्तुति में पद संचालन की सामूहिक प्रस्तुति में संतुलन और आपसी तालमेल प्रभावकारी थी। अंतिम प्रस्तुति नृत्य निरंजम राग मालिका और ताल मालिका में निबद्ध थी। इसमें मधुर भक्ति को पेश किया गया। 

चौथी संध्या की अंतिम प्रस्तुति रूद्राक्ष फाउंडेशन के कलाकारों की थी। उन्होंने गुरु बिचित्रनंद स्वाईं की नृत्य रचनाओं को पेश किया। इस प्रस्तुति की संगीत रचना गुरु रामहरि दास व गुरु सृजन चटर्जी ने की थी। ताल पक्ष की परिकल्पना गुरु धनेश्वर स्वाईं ने की थी। उनकी पहली पेशकश हंसकल्याणी पल्लवी थी। यह राग हंसकल्याणी और मŸा ताल में निबद्ध थी। उनकी दूसरी प्रस्तुति गौतम बुद्ध के जीवन चरित्र पर आधारित साक्य मुनि बुद्ध नृत्य रचना थी। इसमें बुद्ध के जन्म, जातक कथाएं, उनके उपदेश-आष्टांगिक मार्ग और धर्म चक्र प्रवर्तन प्रसंगों की व्याख्या की गई थी। कुलमिला कर यह प्रस्तुति अच्छी थी। लेकिन, इसे और बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने की गंुजाईश काफी थी। 

तीसरी संध्या में ओडिसी नृत्य का आगाज महाकवि जयदेव के गीतगोविंद पर आधारित नृत्य से हुआ। यह अष्टपदी श्रित कमल कुच मंडल थी। मधुर पदावली के मधुर संगीत पर श्री विष्णु के रूपों का विवेचन पेश किया गया। नर्तक अर्णव व साथी कलाकारों ने हरि के गरूड़वाहन, राम अवतार प्रसंग के सीता स्वयंवर, रावण वध, दशावतार का विवेचन किया। दूसरी प्रस्तुति हंसध्वनि पल्लवी थी। यह दोनों नृत्य और संगीत का संयोजन गुरु केलुचरण महापात्रा और संगीत पंडित भुवनेश्वर ने किया। 

नृत्य संरचना कृष्ण कथा उनकी अगली प्रस्तुति थी। इसकी परिकल्पना अर्णम बदोपाध्याय और संगीत संरचना हिमांशु शेखर स्वाईं व सौम्या रंजन नायक थी। इसे रचना ‘कृष्ण तुभ्यं नमः‘, श्रीमद्भागवतगीता के श्लोक और श्रीकृष्णाष्टकम् के अंशों को पिरोया गया। कृष्ण के विश्वरूप, चर्तुभुज, गोवर्धनधारी, कालियामर्दन, राम से जुड़े अहिल्या प्रसंगों को नृत्य में चित्रित किया। 


उत्सव की तीसरी संध्या की दूसरी पेशकश मोहिनीअट्टम नृत्य थी। मोहिनीअट्टम नृत्य डाॅ सुनंदा नायर ने गणपति तालम से आरंभ किया। गणपति तालम रचना ‘गजपति ओम गणपति गजेंद्र‘ पर आधारित था। इसमें गणेश के गजपति, गणपति, गणाधिपति, विनायक, सिद्धिविनायक, एकदंत, वक्रतुंड रूपों को दर्शाया गया। उनकी दूसरी प्रस्तुति कात्यायिनी देवी थी। जय जय महिषासुरमर्दिनी व ए गिरिनंदिनी रचनाओं के जरिए देवी दुर्गा के रूपों को चित्रित किया गया। मधुराष्टकम अंतिम प्रस्तुति थी। वल्लभाचार्य की रचना पर कृष्ण के मधुर रूपों को विवेचन प्रस्तुत किया। इन नृत्य संरचनाओं की परिकल्पना डाॅ सुनंदा नायर ने की थी। 

उत्सव की दूसरी संध्या में दो दिसंबर 2024 को मणिपुरी नृत्य शैली की नृत्यांगना प्रीति पटेल और साथी कलाकारों ने नृत्य रचना नाचोम ली पेश किया। इस नृत्य रचना में मणिपुर की संस्कृति में फूलों के महत्व को दर्शाया गया। सुकुमार पुष्प तत्व-भाव, पवित्रता, सौंदर्य, सुगंध, रंग के संवाहक हैं। फूल देवताओं को प्रिय होते हैं। फूल प्रकृति की नैसर्गिक सुष्मा को वहन करते हैं। मणिुपरी संस्कृति में कमल के फूल भक्ति के प्रतीक हैं। इसे संकीर्तन उत्सव में राधा-कृष्ण को अर्पित किया जाता है। बैंगनी आॅर्किड के फूल प्रेम, सौंदर्य और शक्ति के प्रतीक है। इसे भगवान शिव के शौर्य और उत्सर्ग के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए चढ़ाया जाता है। सुनहरा आॅर्किड शुद्धता, धैर्य और दृढ़ता का प्रतीक है। इसे राजा और योद्धाओं को भेंट किया जाता है। श्वेत आॅर्किड आध्यात्मिक पूर्णता, शांति और सहिष्णुता का प्रतीक माना जाता है। इन्हीं भावों को इस नृत्य रचना में मणिपुरी नृत्यांगना प्रीति पटेल और साथी कलाकारों ने समाहित किया था। इसमें उन्हें एस करूणा देवी और इमोचा सिंह का विशेष सहयोग प्राप्त था। 

नृत्य रचना नाचोम ली के आरंभ और अंत में बाल कलाकार गुनदेबी के गायन ने दर्शकों को विशेष रूप से आकर्षित किया। गुनदेबी ने प्रस्तुति के अंत में ‘मालबाइसु अइदिसु केंदानि‘ गीत को भावपूर्ण अंदाज में गाकर, विश्व को शांति और सद्भाव को संदेश दिया। इस प्रस्तुति के दौरान रचना ‘गजगामिनी चंद्रबदनी प्रेमतरंगिणी हंसिनी‘ व ‘अनंतशायी कोमला श्रीहरि‘ के माध्यम से श्रीकृष्ण और राधा के रास नृत्य का संक्षिप्त चित्रण भी प्रसंगानुकूल था। इसमें मणिपुरी नृत्य शैली के विभिन्न आयाम-पुंगचोलम, चाली, जागोई, अभिनय और हुयन लांगलाॅन को मोहक अंदाज में पेश किया। गोप रास और उद्धत अकान्बा के क्रम में उत्प्लावन व भ्रमरी का प्रयोग प्रभावकारी था। 


वहीं दूसरी प्रस्तुति ओडिसी नृत्य में रंगों के महत्व और प्रभाव का बखान था। शिंजन नृत्यालय के कलाकारों ने वंदे मातरम् प्रस्तुत किया। यह कवि बंकिम चंद्र चटर्जी की अमर रचना वंदे मातरम् पर आधारित थी। इसमें तिरंगे के तीनों रंगों के माध्यम से देश की वीरता, अखंडता, विविधता, एकता और संपन्नता को प्रदर्शित किया गया। वहीं अंतिम प्रस्तुति सूर्य लावण्यम में सूर्य मंदिर की पृष्ठभूमि में सूर्य के विविध रंगों और उसके प्रभाव को निरूपित किया गया। यह संस्कृत विद्वान नित्यानंद मिश्रा की रचना पर आधारित था। उदयमान सूर्य का गुलाबी रंग और अस्ताचल का सूर्य जीवन का संदेश देता है। वहीं बारिश के दौरान सूर्य की किरणें इंद्रधनुष के सात रंगों में बिखर जाती हैं। इन सात रंगों का प्रकृति और मानवीय जीवन पर क्या और कैसा प्रभाव पड़ता यह नृत्य में पेश किया गया। नृत्य रचना सम्मोहक थी। शिंजन नृत्यालय के कलाकारों ने त्रिभंग और चैक का सुंदर प्रयोग नृत्य में किया। वहीं, तारा पल्लवी जो राग तारा और ताल मालिका में निबद्ध थी। इसमें विविध चाली भेद और गतियों से मोहक छवियां उकेरी गईं। यह प्रस्तुति जानदार रही। इन प्रस्तुतियों की संगीत हिमांशु स्वाईं, संगीता पंडा, गुरु धनेश्वर स्वाईं और लक्ष्मीकांत पालित ने तैयार किया था। नृत्य परिकल्पना आलोका कानूनगो की थी। 

समारोह की पहली संध्या का उद्घाटन नव निर्वाचित मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी और उपमुख्यमंत्री पार्वती परीडा ने किया। कोणार्क उत्सव का आरंभ उत्कल संगीत महाविद्यालय के कलाकारों की प्रस्तुति से हुआ। इस संगीत महाविद्यालय की स्थापना वर्ष 1964 में हुई थी। यहां ओडिसी नृत्य और संगीत की शिक्षा दी जाती है। यहां के विद्यार्थियों ने अपने मोहक नृत्य प्रस्तुति से उत्सव का शुभ आरंभ किया। उन्होंने उड़ीसा की पावन भूमि के मुख्य देवता भगवान जगन्नाथ जी हैं। उन्हीं की वंदना में पहली प्रस्तंुति श्री जगन्नाथ अष्टकम थी। यह आदि शंकराचार्य रचित श्री जगन्नाथ अष्टकम ‘कदाचित्कालिंदीतटविपिनसंगीतकरवो‘ पर आधारित थी। इसमें पुरी की प्रसिद्ध रथ यात्रा प्रसंग का चित्रण परंपरागत धुन में प्रस्तुति लासानी बन पड़ी। भगवान जगन्नाथ को दयासिंधु, जगतधारी, प्रमथपति, परब्रह्म के रूप में निरूपित करना मोहक था। 


उत्कल संगीत महाविद्यालय के कलाकारों की दूसरी प्रस्तुति भावरंग थी। यह परंपरागत घन वाद्यों की धुनों के साथ श्रीकृष्णाष्टकम के अंश-‘भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं‘ पर आधारित थी। श्रीकृष्णाष्टकम भी आदिशंकराचार्य की रचना है। इस प्रस्तुति में ओडिसी संगीत और छंदों का मोहक प्रयोग नजर आया। छंद ‘नाचे गिरिधर नागर‘ के माध्यम से कृष्ण और सखाओं की लीलाओं को दर्शाया गया। इसमें कंदुक क्रीडा और कलिया मर्दन प्रसंग का चित्रण प्रभावकारी थी। 

उनकी अगली प्रस्तुति शक्ति थी। इसमें देवी दुर्गा के रौद्र रूपों को विशेषतौर पर निरूपित किया गया। इसमंे जगतपालिनी, घोरा, गौरी, दुर्गा, नीलसंुदरी आदि रूपों को दर्शाया गया। यह रचना ‘नमस्ते चंड मुंड विनाशिनी‘ व ‘नारायणी विष्णु पूज्या‘ पर आधारित थी। इन सभी प्रस्तुतियों का संगीत श्रीनिवास सत्पथी और गुरु बिजय कुमार जेना व बिजय कुमार बारिक ने निर्देशित किया। इस दल में धनेश्वर स्वाईं भी शामिल थे। नृत्य रचना गुरु लिंगराज प्रधान और गुरु पंकज कुमार प्रधान ने किया था। 

पैतींसवे कोणार्क उत्सव की पहली संध्या की दूसरी कलाकार थीं-कथक नृत्य गुरु मालती श्याम और उनकी शिष्याएं। उन्होंने नृत्य रचना-नर्तन मंजरी पेश किया। इसकी शुरूआत में कृष्ण वंदना थी। यह रचना ‘दर्शन दीजै त्रिभुवन पाली‘ पर आधारित थी। दूसरी प्रस्तुति शुद्ध नृŸा थी। यह नौ मात्रा की ताल बसंत थी। इसमें कथक के तकनीकी पक्ष को पेश किया गया। साथ में पंडित बिरजू महाराज की कविŸा-‘जब कृष्ण ताल देत जमुना हिलोर लेत‘ को कथक में पिरोया गया। अगले अंश में नायिका के भावों को पेश किया गया। यह तीन ताल और तिश्र जाति में निबद्ध था। इसमें रचना ‘मनमोहना तोरी मुरलिया‘, ‘चंचल चतुर नार‘ और तराने के जरिए नायिका के भावों को उकेरा गया। कथक की तिहाइयां, चलन, गत और चक्कर का प्रयोग किया गया। अंत में जुगलबंदी की प्रस्तुति थी। इस प्रस्तुति के संगतकारों में शामिल थे, तबले पर योगेश गंगानी, पखावज पर महावीर गंगानी और गायन पर समीउल्लाह खां। 

कोणार्क सूर्य मंदिर, चंद्रभाग समुद्र तट, रामचंडी मंदिर और हरे भरे सुष्मा के इस गोद में स्थित कोणार्क उत्सव स्थल। मुक्ताकाशी मंच के चारों ओर हरियाली, टिमटिमाते बिजली की लड़ियां और साथ में अल्पना से सजी भूमि एक कलात्मक परिदृश्य रचते हैं। इस वातावरण में रंग बिरंगे तोरण, मरदल और तबले जैसे वाद्ययंत्रों के सेल्फी प्वाइंट आमलोगों को आकर्षित करते हैं। फिर ऐसे माहौल में हर शाम विशिष्ट अतिथियों, देशी-विदेशी पर्यटकों और आम लोगों की उपस्थिति हजारों की संख्या में। ऐसे ही माहौल में सुरमई संध्या के समय शास्त्रीय नृत्य के कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से रसमय संसार का सृजन करते हैं। इस माहौल में लोक कलाकारों द्वारा लोक वाद्यों की मंगल ध्वनि तीसरे प्रहर से ही गंुजायमान होने लगती है। ऐसा लगता है कि वह दर्शकों को समारोह स्थल पर आने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।

यह उत्सव एक दिसंबर से पांच दिसंबर तक कोणार्क के सूर्य मंदिर के पृष्ठभूमि में आयोजित था। समारोह का आयोजन ओडिसा पर्यटन विकास निगम और ओडिसा संगीत नाटक अकादमी के सहयोग से किया गया था। यह समारोह मुक्ताकाशी मंच पर संपन्न हुआ। समारोह के आयोजन में संगीत नाटक अकादमी की सचिव शकुंतला मलिक की आयोजनकर्ता के रूप में थी। वहीं, अकादमी के भावोग्राही साहू, भवानचरण पंडा, देव प्रसाद महापात्र आदि ने अपना योगदान दिया। उत्सव मंे उद्घोषणा के कार्य को डाॅ मृत्यंुजय महापात्र, शोभना मिश्रा और मानसी मिश्रा ने संपादित किया। पूरे उत्सव को संयोजन करने का दायित्व डाॅ संगीता गोस्वामी ने निभाया। 








Friday, November 29, 2024

shashiprabha: #आज के कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी -----बनारस घराने की...

shashiprabha: #आज के कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी -----बनारस घराने की...:                                          #आज के कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी                                           बनारस घराने की कथक नृत्य क...

#आज के कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी -----बनारस घराने की कथक नृत्य की एक शाम

                                        #आज के कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी

                                          बनारस घराने की कथक नृत्य की एक शाम

नटवरी कथक फाउंडेशन की ओर से रस रंग सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। त्रिवेणी सभागार में आयोजित सांस्कृतिक संध्या में कथक नृत्यांगना अरूणा स्वामी ने बनारस घराने की नृत्य शैली में पेश किया। संतूर वादक डाॅ बिपुल कुमार ने वादन पेश किया। 24 नवंबर को संपन्न समारोह के साक्षी के तौर पर कथक नृत्यांगना नलिनी अस्थाना, लेखिका डाॅ चित्रा शर्मा, सितार वादक सईद जफर, शहनाई वादक लोकेश आनंद और अन्य कलाकार भी सभागार में मौजूद थे। कलाकारों को देखने-सुनने जब कलाकार वर्ग खुद उपस्थित होते हैं, तो सभा का माहौल और उत्साहवर्धक हो जाता है।   

त्रिवेणी सभागार में आयोजित समारोह में कथक नृत्यांगना अरूणा स्वामी ने संतुलित और सुघड़ता से कथक नृत्य पेश किया। उनके नृत्य में स्थिरता और परिपक्वता दिखा। वह गुरु सुनयना हजारीलाल की शिष्या है। उन्होंने निशा झावेरी से भी कथक की बारीकियों को ग्रहण किया है। वह अपने गुरु के साथ मंच प्रस्तुति देने के अलावा, अमेरिका, हांगकांग और ताइवान में नृत्य प्रस्तुत कर चुकी हैं। वह इनदिनों गुरुग्राम में कथक की नटवरी शैली को युवा कलाकारों को अपनी संस्था के माध्यम से सिखा रही हैं। 

पढंत पर उनकी गुरु सुनयना हजारीलाल मौजूद थे। गुरु की उपस्थिति से शिष्या का मनोबल ऊंचा होना स्वाभाविक है। सुनयना हजारीलाल खुद एक गुणी कलाकार हैं। उनके साथ तबले पर बाबर लतीफ, गायन पर सोहैब हसन और सितार पर रईस अहमद मौजूद थे। उन्होंने बीती शाम त्रिवेणी सभागार में गणेश वंदना से नृत्य आरंभ किया। नृŸा और भाव पक्ष को पेश किया। तराना भी उनके नृत्य का आकर्षण रहा। 


रस रंग समारोह में कथक नृत्यांगना अरूणा ने कृष्ण वंदना पेश किया। यह श्रीकृष्णाष्टकम के अंश-‘भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं‘ पर आधारित थी। यह आदिशंकराचार्य की रचना है। इसमें यमुना और कृष्ण जन्म के प्रसंग को बहुत मधुरता के साथ दर्शाया। बारिश के अंदाज को हस्तकों और पद घात से निरूपित किया। नृŸा पक्ष में गुरु जानकी प्रसाद की शैली को अरूणा ने प्रभावी तरीके से पेश किया। उनके नृत्य ठहराव के साथ नैसर्गिकता है, जो कथक नृत्यांगनाओं में कम देखने को मिलता है। उन्होंने इस अंश में ‘ता थेई तत्‘ के बोल पर लयकारी पेश किया। विलंबित लय में त्रिपल्ली, टुकड़े, परमेलू आदि पेश किया। मिश्र जाति की लड़ी में पैर का जानदार काम दिखा। वहीं, द्रुत तीन ताल में चतुश्र जाति की तिहाइयों और रेले की पेशकश खास रही। उन्होंने भाव अभिनय के लिए होरी का चयन किया था। इसके बोल थे-‘मानो मानो श्यम नंदलाल जी‘। अरूणा ने हस्तकों, पैर के काम, गतों, पलटे, चक्कर का प्रयोग बहुत सधे अंदाज में किया। नायिका राधा और नायक कृष्ण के भावों को दर्शाते हुए, उनके मुख के भावों और नेत्रों के भावों में बहुत सरलता और सहजता दिखी। उन्होंने अपने नृत्य का समापन तराने पर आधारित नृत्य से किया। यह राग वृंदावनी सारंग में निबद्ध था। 

युवा संतूर वादक डाॅ बिपुल कुमार राय ने समारोह में शिरकत है। डाॅ बिपुल ने संतूर वादन की शिक्षा सूफियाना घराने के संतूर वादक पद्मश्री पंडित भजन सोपोरी से प्राप्त की है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से मास्टर्स, एमफिल एवं पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। वह आकाशवाणी के ए-ग्रेड के कलाकार हैं। वह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के प्रतिष्ठित श्रेणी में है। वह साहित्य कला परिषद, दिल्ली सरकार के सांस्कृतिक सलाहकार एवं केंद्रीय विद्यालय गवर्निंग बाॅडी के सदस्य के रूप में अपनी सेवा प्रदान करते रहे हैं। उन्होंने मिश्र, आॅस्ट्रिªया, स्वीटजरलैंड, जर्मनी, कतर, चीन, थाईलैंड, श्रीलंका आदि देशों में संतूर वादन की प्रस्तुतियंा दी हैं। वह तानसेन समारोह, आकाशवाणी संगीत सम्मेलन, कला प्रकाश, संगीत नाटक अकादमी समारोह, सप्तक, संगीत विहान आदि समारोहों में शिरकत कर चुके हैं। पिछले साल संपन्न जी-20 के आयोजन में भी विदेशी मेहमानों के समक्ष उन्हें अन्य कलाकारों के साथ संतूर वादन का सौभाग्य मिला। 

संतूर वादक बिपुल राय ने मारवा थाट का राग मारवा बजाया। राग मारवा माधुर्य से परिपूर्ण राग है। सो वादक बिपुल ने राग की प्रकृति के अनुरूप आलाप में कोमल ऋषभ और तीव्र मध्यम स्वरों पर ठहराव रखते हुुए वादन किया। राग का विस्तार मध्य सप्तक में खिल उठा। उन्होंने मध्य और द्रुत लय की गतों को पेश करते हुए, जोड़-झाले को बजाया। अपने वादन के चरम पर ‘ना-धिंन्ना‘ को मोहक अंदाज में बजाया। उन्होंने अपने वादन का समापन राग पहाड़ी के धुन से किया। इसमें गढ़वाली लोकधुन की झलक मोहक अंदाज में पेश किया। उनके साथ तबले पर युवा तबला वादक बाबर लतिफ ने दिया। दोनों कलाकारों ने अच्छे तालमेल से वादन को सरस बना दिया। 









Sunday, October 20, 2024

shashiprabha: #आज के कलाकार/अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव--...

shashiprabha: #आज के कलाकार/अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव--...:    #आज के कलाकार अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव-- महती आयोजन @ शशिप्रभा तिवारी राजधानी दिल्ली में पिछले सोलह अक्टू...

#आज के कलाकार/अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव--महती आयोजन @ शशिप्रभा तिवारी

  


#आज के कलाकार

अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव--महती आयोजन @ शशिप्रभा तिवारी

राजधानी दिल्ली में पिछले सोलह अक्टूबर से धूम मची हुई है. यह मौका- अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव है . इसमें देश के अलग अलग प्रान्तों से कलाकार आये हुए हैं. एक तरफ चर्चाओं का जोर है दूसरी तरफ कमानी सभागार में हर शाम कलाकर नृत्य पेश कर रहे है. वहीँ लोक कलाकार अपनी लोकसंगीत से समां बांध रहें हैं. संगीत नाटक अकादमी की लगभग सात दशक की यात्रा को फोटो के माध्यम से ललित कला अकादमी के कला दीर्घा में प्रदर्शित किया गया है .

अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव का आयोजन संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित किया गया। यह समारोह राजधानी दिल्ली में 16अक्तूबर को शुरू हुआ। एपीजे शिंदे सभागार में समारोह का उद्घाटन केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत के उद्धबोधन से हुआ। उन्होंने कहा कि अतीत में भारत की संस्कृति और सनातन परंपरा को मिटाने के प्रयास किए गए लेकिन हमारी संस्कृति लगातार शाश्वत बनी हुई है। भारत गंगा और गीता तथा समृद्ध संस्कृति और लोक परंपराओं का देश है। शास्त्रीय और लोक नृत्य अविश्वसनीय है और संस्कृति को कई आयाम प्रदान करते हैं।














असम राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने अपने संबोधन में 18अक्तूबर की संध्या को कमानी सभागार में कहा कि हमारी पहचान हमारी सांस्कृतिक इतिहास है। इन्हें संजोकर रखना चाहिए। यह आयोजन ऐतिहासिक महत्व का है। इसके अंतर्गत वैश्विक सांस्कृतिक संवाद अतीत, वर्तमान और भविष्य के संदर्भ में हो रहा है।

अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव के दौरान सांस्कृतिक संध्या का आयोजन कमानी सभागार में किया गया। इसका आरंभ नृत्य नाटिका मीरा से हुआ। यह डॉ सोनल मानसिंह की परिकल्पना थी। भक्ति काल की कवयित्री मीरा के जीवन चरित्र को संक्षिप्त तौर पर पेश किया। नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने मीरा बाई के पदों को गाते हुए, भावों को दर्शाया।

इसे प्रस्तुत करने के लिए मीरा बाई की रचनाओं का चयन किया गया था। इनमें शामिल रचनाएं थीं- म्हारी घूमर नखराली सा,मोरे तो गिरिधर गोपाल ,एरी मैं तो प्रेम दीवानी ,हरि तुम हरो जन की भीर, पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे, मणे चाकर राखो जी आदि। इस प्रस्तुति में द्रौपदी, प्रहलाद, गजराज की कथा को दर्शाया गया। कृष्ण मथुरा से द्वारका चले गए थे। मीरा बाई भी वृंदावन से द्वारका चली जाती हैं। कुछ समय बाद चितौड़ के महाराणा के दूत मीरा से क्षमा मांगने जाते हैं। मीरा द्वारकाधीश मंदिर में अनुमति के लिए अंदर चली गईं। फिर नहीं लौटीं। इसे गीत -अतर माही अवता न जाता मारग के जरिए दिखाया गया। द्वारकाधीश ने अपने आप में समा लिया था।पहली संध्या की दूसरी पेशकश कथकली नृत्य प्रस्तुति थी। महोत्सव की द्वितीय प्रस्तुति केरल कलामंडलम की प्रस्तुति गीतोपदेशम थी।









महोत्सव की दूसरी संध्या 17अक्तूबर को ममता शंकर और साथी कलाकारों ने नृत्य रचना प्रकृति पेश किया। आधुनिक समकालीन नृत्य शैली में प्रकृति के विविध पक्षों को चित्रित किया। हिरण्यागर्भा धरती के अनंत क्षमता का प्रदर्शन प्रभावकारी था। दूसरी पेशकश कुचिपुड़ी नृत्य थी। कलाकार थीं -शांता रत्ती। नृत्यांगना शांता ने तरंगम पेश किया। यह महाराजा स्वाति तिरुनाल की रचना -नाच रही गोपी पर आधारित थी। यह राग धनाश्री और आदि ताल में निबद्ध था। नटुवंगम और मृदंगम के विभिन्न ताल आवर्तन पर मोहक अंग संचालन और पद संचालन पेश किया।

तीसरी प्रस्तुति इंडोनेशिया के कलाकारों की थी । तक्शु आर्ट के कलाकारों ने रामायण के आख्यान को पेश किया। यह संस्था 1990से रामायण और इंडोनेशिया के लोकजीवन को पेश करती रही है। तक्शु आर्ट के कलाकारों ने सीता हरण, जटायु वध, राम रावण युद्ध के प्रसंग का निरुपण किया।
महोत्सव की तीसरी संध्या 18 अक्तूबर में किर्गिस्तान के जिल्दी समूह के कलाकारों ने लोकनृत्य पेश किया। उनकी प्रस्तुति में भारतीय कलाकारों के साथ संयुक्त रूप से भाग लिया। अगली प्रस्तुति मोहिनीअट्टम नृत्य थी। इसे सुनंदा नायर ने पेश किया। उन्होंने राम और शबरी के संवाद को नृत्य में पिरोया। यह रचना -चक्रवाक शबरी पात्र राग मालिका और ताल मालिका पर आधारित थी। उन्होंने सुंदर अभिनय पेश किया। महारास को मणिपुर नृत्यांगनाओं ने पेश किया। इसे जेएनएमडीए के कलाकारों ने पेश किया।
                                                     

अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव की चौथी संध्या19अक्तूबर में कत्थक नृत्य पेश किया। इसे अर्चना जोगलेकर और उनकी शिष्य-शिष्याओं ने पेश किया। उनकी शिष्याओं ने अपने नृत्य का आरंभ नटराज स्तुति से किया। यह पूनम व्यास की रचना ‘जयदेव नटराज कीजिए कृपा आज‘ से किया। इसकी संगीत रचना श्रीधर फड़के ने की थी। इसमें गंगावतरण, समुद्र मंथन और त्रिपुरासुर वध के दृश्य को पेश किया गया। कथक की तिहाइयों, टुकड़े और भाव का सुंदर समावेश था। दूसरी प्रस्तुति गत निकास थी। इसमें सात्विक भाव, मुद्रा और गत भाव के जरिए रूपगर्विता व शंखिनी नायिका के भावों को दर्शाया गया। साथ ही शठ नायक के भाव को पेश किया गया। उनकी अगली पेशकश आसुय था। इसमें दो कलाकारों के अलग-अलग भावों को दर्शाया गया। एक कलाकार असंतुष्ट और इष्र्यालु है, वहीं दूसरा संतुष्ट, सरल है, वह अपनी कला को पूजा और जीवन मानता है। उनके आपसी भावों को शिष्य देखता है। यह रचना ‘सुर सजे संगिनी‘ पर आधारित थी। इसका संगीत शंकर महादेवन ने तैयार किया था। इसे सुर में गायक राहुल देशपांडे और मनीष काले ने पिरोया था।

अगली पेशकश लोकछंद कल्चरल यूनिट के कलाकारों की थी। मैत्रेयी पहाड़ी की नृत्य रचना सर्वेशम भारतम् कई भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों का संयोजन था। यह पंडित विनय चंद्र मुद्गल की रचना पर आधारित था। यह राग जयजयवंती में पिरोई गई थी। महोत्सव की चौथी थी संध्या का समापन कलाक्षेत्र के कलाकारों की प्रस्तुति से हुआ। भरतनाट्यम नृत्य शैली में कलाकारों ने सीता स्वयंवर प्रसंग को पेश किया। उनकी प्रस्तुति मोहक और प्रभावकारी थी। समारोह के दौरान देवभूमि लोक कला सोसाइटी, बनवारी लाल और साथी, वेदप्रकाश और साथी, प्रीतम सिंह और साथी कलाकारों ने उतराखंड, राजस्थान और हरियाणा की लोक संगीत को पेश किया.


Sunday, September 22, 2024

shashiprabha: #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी @मेरा नृत्य -वाशिम राजा

shashiprabha: #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी @मेरा नृत्य -वाशिम राजा:                                      #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी                                           @मेरा नृत्य गुरु की कृपा है-वाश...

#आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी @मेरा नृत्य -वाशिम राजा

                                    #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी 

                                         @मेरा नृत्य गुरु की कृपा है-वाशिम राजा

आज के युवाओं प्रतिभा की बहुमुखी है। वह सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव नजर आते हैं। एक ओर कुछ युवा उसका सदुपयोग कर अपना करियर को बना रहे हैं, तो दूसरी ओर लाॅ के क्षेत्र में बहुत से युवा करियर बनाते हुए, नजर आ रहे हैं। इसके इतर एक ऐसा युवक वाशिम राजा हैं, जो इन दिनों शास्त्रीय नृत्य जगत में अपने नृत्य को लेकर बराबर चर्चा में बने हुए हैं। 

पिछले दो वर्ष से वह लगातार विभिन्न मंचों पर कभी सामूहिक, कभी युगल तो कभी एकल नृत्य प्रस्तुत कर रहे हैं। कुचिपुडी नर्तक वाशिम राजा ने बचपन में नृत्य सीखना शुरू किया था। तब वह भरतनाट्यम और गौड़िया नृत्य सीखते थे। साथ ही लाॅ की पढ़ाई पूरी करके, बतौर लाॅ प्रोफेशनल प्रैक्टिस कर रहे थे। वर्ष 2018 में वह कुचिपुडी नृत्य गुरु वनश्री राव के संपर्क में आए और कुचिपुडी नृत्य सीखना शुरू किया। इसमें वह ऐसे रम गए कि उन्होंने लाॅ प्रैक्टिस छोड़ दिया और पूरी तरह प्रोफेशनल डांसर बनना तय कर लिया। 

बहरहाल, हाल ही में उन्हें राजगोपाल बेस्ट मेल सोलोइस्ट अवार्ड की घोषणा की गई है। यह सम्मान उन्हें तीस नवंबर को आशीष मोहन खोकर के एटेंडेंट डांस एन्वल अवार्ड 2024 में प्रदान किया जाएगा। इस अवसर पर उनकी गुरु को रूक्मिणी देवी ओवर आॅल कंट्रीबुशन अवार्ड दिया जाएगा। यह समारोह बंग्लौर में आयोजित होना है। इस सम्मान के अलावा, उन्हें युवा नृत्य रत्न प्रभास सम्मान और भी कई अवार्ड मिले। पर सबसे बड़ी बात कि संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष डाॅ संध्या पुरेचा ने उनके ऊर्जापूर्ण नृत्य देखकर इतनी प्रभावित हुईं कि उन्हें ‘महादेव-महेहश्वर‘ के नाम से पुकारती हैं। वाशिम पिछले कुछ महीने से लगातार दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, बड़ौदा, चेन्नै आदि शहरों में नृत्य पेश कर रहे हैं। अभी कुछ दिनों पूर्व वह तिजारा किले के महल-नीमराना में अपनी गुरु वनश्री राव के साथ नृत्य प्रस्तुत किया। इस समारोह में उन्होंने जगदोद्धारण, कालिया नर्तनम, देव देवम ओर तिल्लाना आदि नृत्य रचनाओं को पेश किया। वहां उन्हें देखने के लिए संस्कृति विद् और लेखक डाॅ आशीष खोकर भी पहुंचे। इसे वह अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं।






शास्त्रीय नृत्य कैसे सीखना शुरु किया?

कुचिपुडी नर्तक वाशिम राजा-मेरी मां को शास्त्रीय नृत्य में दिलचस्पी थी। इसलिए उन्होंने मुझे इस ओर प्रेरित किया। मुझे शास्त्रीय नृत्य के प्रति बचपन से ही आकर्षण था। मेरी मां ने मुझे प्रेरित किया। एक शाम मैं वनश्री राव मैडम का कुचिपुडी नृत्य देखा। उस शाम मैंने मन ही मन तय किया कि मैडम से कुचिपुडी नृत्य सीखना है। कार्यक्रम के बाद मैं उनसे मिला और उनसे अपने मन के बात को कहा कि मैं आपसे नृत्य सीखना चाहता हूं। शायद, वह शाम मेरे लिए एक नई शुरुआत थी।

 मैडम ने अपने घर पर आकर मिलने को कहा। उनके नृत्य की क्वालिटी और सिखाने का अंदाज अनूठा है। वह अपने शिष्य-शिष्याओं को ज्यादा से ज्यादा देना चाहती हैं। अब यह हमारी क्षमता और विवेक है कि हम उनसे कितना ले पाते हैं। वह डांस के साथ-साथ जिस रचना पर हम नृत्य करते हैं, उसके एक-एक शब्द की व्याख्या, एक-एक भाव के संदर्भ को वह बताती हैं। वह हमें आर्थिक, मानसिक, भावनात्मक आदि सभी स्तरों पर सहयोग करने को तैयार रहती हैं। 

अपने यादगार परफाॅर्मेंस के बारे में बताईए।

वाशिम राजा-पिछले वर्ष मैं गुरु जी के साथ कलाक्षेत्र गया था। वहां मुझे गुरु जी के साथ जगदोद्धारण करने का मौका मिला। गुरु वनश्री राव यशोदा और मैं कृष्ण की भूमिका में नृत्य किया। उस रोज भी मैं नृत्य करते हुए, बहुत भावुक हो गया था। यह सोचकर और भी दंग था कि ईश्वर की कैसी लीला है कि मुझे गुरु जी के साथ नृत्य करने का अवसर मिला। 

इस वर्ष मार्च में, गणेश नाट्यालय में पुरुष नर्तकों का एक उत्सव हुआ था। इस उत्सव में मुझे एकल नृत्य करने का अवसर मिला। इस उत्सव में अनेक समीक्षकों ने मेरे नृत्य को बहुत सराहा। इसके बाद, मैंने तय किया कि अब सिर्फ नृत्य की साधना करूंगा। और मैंने लाॅ की नौकरी छोड़ने का फैसला किया। फिलहाल, पूरी तरह डांस में हूं। गुरु जी कहती हैं, एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए। इसलिए मैं अब आपलोगों के सामने उपस्थित हूं। बाकी सब ईश्वर की मर्जी और किस्मत जिधर ले जाए। हमें उसी ओर ही चल देना है।