Popular Posts

Friday, September 27, 2013

कैसी अनुभूतिओं के वो क्षण थे
एक दूसरे को जानने को
बिना कुछ कहे सब कह दिया था
अंतस में कहीं एक सूखी धमनी को
तुम्हारे स्पर्श ने
जीवंत कर दिया था
उस पल को आज भी जीती हूँ
तुमसे दूर जाते हुए
उसी स्पर्श की गर्माहट को
मैं महसूस करती रही
पता नहीं
आती-जाती रेल की पटरी
जिन्दगी की कहानी-सी कहती लगती है
वहीँ पर कहानी कभी शुरू होती है
वहीँ बहुत अनकहा रह जाता है
तब हमारा सफ़र भी पूरा नहीं होता
मैं फिर-से निहारती हूँ
गुजरती रेल-पटरी को
वह कहती-सी लगती हैं
तुम्हारी तरह
यह अहसास हर पल नया है
सिर्फ, तुम ऑंखें बंद कर
मुझे देखो तो पलकों में .....

Thursday, September 5, 2013

  बचपन के बगीचे में
  सखियाँ के संग
  आम  की डालियों का झुला
  निम्बू ,आम ,इमली  की
  कच्ची-पक्की मिठास
 
  घर से छिप-छिपा कर
  कुछ करने का संबल
  उन्होंने ही दिया
  जिनके न अब पतें हैं
  न कभी ख़त आतें हैं

  सिर्फ यादों की
  महीन डोर में
  अब वो रिश्ते जिन्दा हैं
  याद आता है, जब बुआ आती थी
   दादी से फलां-फलां का हाल पूछती थी
   मन नहीं मानता तो
   सहेलियों के घर उनकी अम्मा-बाबा से मिलती थीं

   हमारे तो कालोनी छुटी
   सबका साथ ही छुट गया
   जो जहाँ के थे लौट गए
    फिर, भी मन बात देखता है
    बचपन की सहेलियों का

    अब न गुट्टे हैं
    न पड़ोस का आँगन
    न दालान में झूलें
    नन्हीं चिड़िया के पाँव में
    एक ख़त बांध दी हूँ
    शायद वह पहुंचा दे.....
  
 
 

Friday, August 30, 2013

पवस की शाम
रिमझिम फुहार
मैं खिलती हूँ
हरसिंगार बन
बाट देखती हूँ,तुम्हारी
मेरी खुशबू
 तुम्हारी देहरी तक जाती है
मैं रात भर
मिलन की आस में
महकती हूँ
फिर, उदास हो
झर जाती हूँ
तुम जानते हो
मैं फिर,
शाम ढलने का
 इंतजार करती हूँ
और, डालियों पर
कली बन मुस्कुराती हूँ
अपनी क्षणिकता पर
कितने वैभव में जीती हूँ
तुम्हारी आस में
की हर पल नया है
कल नहीं आये तो क्या ?
आज फिर
नई शाम है
मैं नई हूँ
और जीवन नया है
तुम आ कर
स्पर्श कर देखो
मैं झर जाउंगी
तुम पर भी

Thursday, August 29, 2013

एक हल्की-सी
 नरम चादर यादों की
 मैं तुम्हारे सिरहाने तान आई हूँ
 मेरी बंद मुठियों में
 तुम्हारे आँखों की
 नरमाई समाई है
जब मन अनमना-सा होता है
 मुट्ठी खोल
 तुम्हारी पुतलियों में
अपनी अक्स को निहारती हूँ
 कुछ-कुछ बादल की
 रुई-जैसी अनुभूति मन
 तुम्हारे आस-पास
छा जाने को आतुर
पता नहीं
 कब गुलाबी हो
 तुम्हारी सांसों की खुशबू से
 महक उठता है
 देखना जब आँखे खोलो
 उसी खुशबू से
 तुम्हारी सांसें महकें
तब मुझे याद कर
हल्के-से मुस्कुराना
 ताकि सुबह-सुबह बन जाए सुनहरी 

Friday, August 16, 2013

बरसे सावन  की फुहार
झुला पड़ी अमुआ की डाली

झूले राधा रानी
झुलावे कृष्ण कन्हाई

भीजे डाली-डाली
भीगे सारी फुलवारी

झूले राधा रानी
झुलावे कृष्ण कन्हाई

तुम भी आओ
देखा छटा न्यारी

झूले राधा रानी
झुलावे कृष्ण कन्हाई

मन की दुहाई
कैसी ये छवि है बनाई

झूले राधा रानी
झुलावे कृष्ण कन्हाई

खुशबु मधुबन की
हम तक कैसे आई

झूले राधा रानी
झुलावे कृष्ण कन्हाई

Thursday, August 8, 2013

देखो आज कैसी
हवाएँ ठंडी बह रही हैं

मन के कदम्ब की डाली
हिलती है

न जाने क्यों ?
कान्हा, अब तुम कदम्ब तले नहीं आते

मैं तो बावली बन
यमुना के तट और मधुबन में फिरती हूँ

आओ जरा चुपके से
जी-भर के निहार लूँ , तुम भी चुप रहना

मैं खामोश रहूंगी
तुम बांसुरी की टेर देना मन भर जाएगा

क्योंकि तब मयूर नाचने लगेंगे
और मधुबन सुरों से सुवासित हो जाएगा

Tuesday, August 6, 2013

आज तुमने भेज ही दिया
मेरे आसमान में काले-काले मेघ
बरसती रहीं
झीनी-झीनी फुहारें मेरे आंगन
तुम्हारे मन का स्पर्श था
बरसते पानी में
नेह के आलिंगन में बंध
किन-किन पलों को
गिनता रहा मन
पीपल की वह छाओं
बहती नदी और तुम्हारे मन का गाँव
घुमती रही
तभी रेल की छुक-छुक सुन
वह विदा होने का पल याद आया
हर बार तुम
अपनी हथेलियों से थप-थपा
 मीठी-सी चुभन दे अलविदा कह देते
और मैं ओझल होते
तुमको निहारती रह जाती