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Thursday, February 13, 2020

सत्रीय नृत्य समारोह



                                                          सत्रीय नृत्य समारोह

                                                          शशिप्रभा तिवारी

शास्त्रीय नृत्य सत्रीय असम का लोकप्रिय नृत्य है। अब तक सत्रीय नृत्य पूर्वोत्तर और असम में ही सीमित रहा है। संगीत नाटक अकादमी और सत्रीय नृत्य के गुरूओं व कलाकारों के प्रयास से इसे देश के विभिन्न प्रदेशों में प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है। राजधानी दिल्ली, मुम्बई, पुणे, कोलकाता में सत्रीय नृत्य को सीखने के प्रति युवाओं में रूचि बढ़ी है। इसकी झलक मेघदूत सभागार में आयोजित सत्रीय प्रवाह में दिखी।

संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित सत्रीय प्रवाह समारोह में सत्रीय नृत्य की अलग-अलग छटा को कलाकारों ने पेश किया। प्रस्तुति का आरंभ परमानंद काकोती बरबायन और साथी कलाकारों के गायन-बायन से हुआ। परमानंद और साथियों ने लयात्मक खोल वादन और सुरीले गायन से मनोहर शुरूआत की। समारोह का समापन धृति गोविंद दत्ता और मनोज कुमार दास की जुगलबंदी से हुआ। उन्होंने तबला व खोल वादन के जरिए तीन ताल व भरमान ताल बजाया। 



सत्रीय नृत्यांगना दिविका बड़ठाकुर और उनकी शिष्याओं ने सत्रीय नृत्य पेश किया। इसका आगाज साली नृत्य से हुआ। सत्रीय नृत्य की तकनीकी पक्ष, शुद्ध नृत व राजाघड़िया नृत्य पक्ष को इस पेशकश में दर्शाया गया। इसमें हस्तकों और मुद्राओं का लास्यात्मक प्रयोग किया गया। यह श्रीमंत माधवदेव की रचना ‘कृष्णम तुभ्यम नमामि‘ पर आधारित थी। इसमें भगवान विष्णु के दशावतार का विवेचन मोहक था।

सत्रीय प्रवाह की अगली प्रस्तुति बड़गीत थी। माधव देव की रचना ‘सखी देखी मदन गोपाल‘ पर आधारित नृत्य में अभिनय की प्रधानता थी। इसमें नृत्यांगनाओं ने कृष्ण के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंगों का वर्णन किया। इस प्रस्तुति में साक्षी, श्रुतिका और बिशमिता ने शिरकत की। कृष्ण वंदना नृत्यांगना दिविका बड़ठाकुर की एकल प्रस्तुति थी। नृत्यांगना दिविका ने कृष्ण के नंदगोपाल, नारायण, गोविंद, देवकीनंदन, पंकजनाभ, वासुदेव रूपों का  विवेचन पेश किया। साथ ही, बाल कृष्ण के मिट्टी खाने, किशोर कृष्ण के गोवर्धन पर्वत, कुब्जा उद्धार, कंस व चाणूर वध प्रसंग को चित्रित किया। इस प्रस्तुति में वात्सल्य व भक्ति रस का संुदर समन्वय था।

सत्रीय नृत्य के रामदानी यानि कोमल तांडव पक्ष को नादुभंगी नृत्य में पेश किया गया। शुद्ध नृत की इस प्रस्तुति में विभिन्न बोलों पर देह की अलग-अलग मुद्राओं को नृत्यांगनाओं ने विशेषतौर पर पेश किया। यह नृत्य सूता ताल में निबद्ध था। श्रुतिका और श्रावणी की युगल प्रस्तुति आकर्षक थी। अगली युगल प्रस्तुति नर्तक मंजीत कलिता और देवजीत दत्ता की थी। यह बाहार नृत्य थी। श्रीमंत माधव देव की रचना को आधार लेकर, कलाकारों ने बाहार नृत्य पेश किया। यह गीत ‘अरे बंृदावने भीतलो हरि, ए गुणेरिोरनिधि‘ पर आधारित थी। नर्तक मंजीत व देवजीत ने नृत्य प्रस्तुति में उत्प्लावन, भ्रमरी और पद संचालन संतुलित अंदाज में पेश किया। साथ ही, उन्होंने भंगिमाओं के प्रयोग के जरिए कृष्ण के माधुर्य रूप का मोहक चित्रण किया। इस प्रस्तुति को देखकर अष्टछाप कवि वल्लभाचार्य की रचना ‘अधरं मधुरं‘ का भान सहज ही हो आया। वाकई, यह युगल नृत्य भावपूर्ण थी।

Wednesday, February 12, 2020

शास्त्रीय नृत्य की एक अनवरत परंपरा है।

शास्त्रीय नृत्य की एक अनवरत परंपरा है। इसके तहत गुरूओं के सानिध्य में शिष्य-शिष्याएं कला की साधना करते हैं। गुरूमुखी विद्या का यह अवगाहन गुरू के सम्मुख बैठकर ही संभव है। भले ही, आज इंटरनेट के जरिए सब कुछ आसान हो गया है। पर मानस और मानवीय भावनाओं का जो आदान-प्रदान सानिध्य के जरिए होता है। उसका कोई विकल्प नहीं है। इसी के मद्देनजर युवा प्रतिभाओं की भावनाओं को उजागर करने के लिए, हम हर शुक्रवार को आपके सामने उन्हीं के भावों को पेश करने की कोशिश करेंगें। हमें आशा है कि आप सुधि पाठकों और रसिकों का सहयोग मिलेगा ताकि हमारा उत्साह बना रहे। तो इस बार की शुरूआत कथक नृत्यांगना गौरी दिवाकर की नृत्य यात्रा के बारे में जानते हैं, उन्हीं की जुबानी-


कथक नृत्यांगना गौरी दिवाकर अभी हाल ही में प्रतिष्ठित दरबार संगीत समारोह में शिरकत करके लौटी हैं। इस यात्रा के दौरान, उन्होंने विश्व स्तर के कलाकारों के साथ मिलकर, भारत रत्न पंडित रवि शंकर की जीवन कथा को नृत्य के जरिए पिरोया। इस सामूहिक प्रस्तुति में ब्रिटेन के समीक्षकों ने गौरी दिवाकर के कथक नृत्य को खासतौर पर सराहा है। गौरी उस्ताद बिस्मिल्ला खां सम्मान, जयदेव प्रतिभा सम्मान, श्रृंगार मणि सम्मान से सम्मानित हैं। इस महीने की 21तारीख को इंडिया हैबिटाट सेंटर में गौरी दिवाकर नृत्य रचना ‘समरात्री नाइट आॅफ डिवाइन यूनियन‘ पेश करने वाली हैं।






आपका बचपन जमशेदपुर में बीता है। आपका दिल्ली कैसे आना हुआ?

गौरी दिवाकर --मैं बारहवीं की पढ़ाई के बाद दिल्ली आ गई थी। मेरी बड़ी दीदी और जिजाजी अपने साथ ले आए थे। वैसे तो मैंने जमशेदपुर में भी नृत्य सीखा था। नृत्य खासतौर में कथक के बारे में किताबी ज्ञान, जिसको कहते हैं, वह मुझे कुछ ज्यादा ही था। यहां रहते हुए, कथक कंेद्र सेे जुड़ी। कथक केंद्र में मेरा इंटरव्यू महाराजजी ने लिया था। मुझसे भारती दीदी और गुरू मुन्ना शुक्ला ने पूछा कि तीन ताल या झप ताल या धमार ताल में से किस पर नाचना पसंद करेंगी। मैं इतनी नासमझ और गर्वीली थी कि बोली रूद्र ताल पर नृत्य करूंगीं। और अपने अति आत्मविश्वास के साथ उनलोगों के सामने जितना आता था, सब प्रस्तुत कर दिया। अब सोचती हंू तो अपनी बेवकूफी और हिमाकत पर हंसी आती है। कभी-कभी अपनी मूढ़ता पर अफसोस भी होता है।

कथक केंद्र्र में समय कैसे बीता?

गौरी दिवाकर--समय बीतता गया। मैं सुबह आठ बजे कथक केंद्र पहुंच जाती। सारे दिन यहां बीताती और शाम को पांच बजे घर वापस लौट जाती थी। कथक केंद्र में मैं कथक की तकनीकी पक्ष से बखूबी वाकिफ हुई। तीन ताल की एक-एक बारीकी को जैसा गुरूओं ने सिखाया, उसे आत्मसात करने की कोशिश की। फिर, स्काॅलरशिप मिला। मुझे लगा कि अगर नीयत सही होती है तो प्रकृति आपको ऐसे ही सहयोग देती है। और आपके रास्ते खुलते जाते हैं। हां, रास्ते सही होने जरूरी हैं। बतौर, कलाकार अपनी पहचान बनाने के लिए मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा। पर मैं खुद को सौभाग्यशाली मानती हूं, जो मुझे गुरूओं का बहुत आशीर्वाद मिला।


आपको दूसरे कलाकारों की प्रस्तुति देखने का समय मिलता है?

गौरी दिवाकर--मैंने मंडी हाउस के आस-पास काफी समय गुजारा है। क्योंकि थर्ड ईयर में जब आई तो शाम को हर रोज नाटक देखती या किसी का डंास देखती या किसी कलाकार का संगीत सुनती। मुझे कलाकारों की कलाओं को पेश करते हुए देखना बहुत भाता था। एक तरह से कहूं तो यह आदत से मन गई थी। या कहूं तो लत लग गई थी। बड़े-बड़े कलाकारों के डांस देखती तो मन में तय करती थी कि अब मैं भी जमकर रियाज करूंगी। और खूब-खूब मेहनत करूंगीं। हालांकि, आजकल पहले जितने शो तो नहीं देख पाती हूं। पर अगर दिल्ली में होती हूं तब समय निकालकर, शाम को प्रोग्राम देखने जाना पसंद करती हूं।





नृत्य सीखने के लिए क्या जरूरी मानती हैं?

गौरी दिवाकर--मुझे याद है कि मुझे स्काॅलरशिप साढ़े छह सौ रुपए मिलते थे। मैं अपना गुजारा उसी से करती थी। केंद्र में महाराज जी, चीकू भईया, गीतांजलि दीदी, प्रेरणा दीदी, मालती दीदी सबसे कुछ-कुछ सीखने की कोशिश में रहती थी। मेरे पास ईमानदारी से काम करने का जज्बा था। मुझे सीखने की भूख थी। कुछ हासिल करने या जल्दी से कुछ बन जाने का इरादा नहीं था। बहुत पैसा कमाना है, यह तो कभी सोचा ही नहीं। मैं अपने अनुभव से समझती गई हूं कि केवल वर्कशाॅप करके या यहां-वहां कुछ-कुछ सीखकर डांसर नहीं बना जा सकता है। यह तो साधना है। यह अनवरत मेहनत और लगन की अनंत यात्रा है। जो अनंत की ओर आपको अग्रसर करता है।

आपको कई गुरूओं से सीखने का अवसर मिला है। इस बारे में कुछ बताईए?

गौरी दिवाकर--मुझे पंडित बिरजू महाराज, गुरू जयकिशन महाराज और अदिति दीदी से नृत्य सीखने का अवसर मिला। गुरू जयकिशन महाराज जी जिन्हें हम सभी चीकू भईया कहते हैं। वह एक  समर्पित गुरू हैं। वह बहुत ही निस्वार्थ भाव से सिखाते हैं। वह क्लास में प्रैक्टिस के दौरान अक्सर पंखा बंद करवा देते थे। उनका कहना था कि विद्यार्थी को कष्ट सहना जरूरी है। तभी वह अपनी विद्या का महत्व समझ पाते हैं। उन्होंने हमें कथक केंद्र की रिपर्टरी के साथ जोड़ा। उन्हें नृत्य के साथ संगीत की समझ बहुत अच्छी है। महाराज जी तो अथाह सागर हैं। अदिति दीदी के बारे में मैं क्या कह सकती हूं। उन्होंने तो हमें गढ़ा है।

कोई यादगार घटना!

गौरी दिवाकर--कथक केंद्र की एक घटना याद आती है। दीपावली का उत्सव कथक केंद्र में मनाया जा रहा था। सभी से कुछ-कुछ पेश करने को कहा गया। मेरी बारी आई, महाराज जी ने कहा-बिहारी इधर आ। कुछ सुनाओ। तब मैंे गीता के पंद्रहवें अध्याय का पढंत किया। वह इतने प्रभावित हुए कि उस दिन के बाद से मुझे बिहारी के बजाय पंडिताइन बुलाने लगे। उनके सिखाने का तरीका, एक-एक लाइन को मेंटेंन करना बहुत अलग है। उनदिनों कथक केंद्र में बहुत रोक-टोक नहीं था। हम कभी महाराज जी का क्लास करते। उसके बाद, चीकू भइया के क्लास में चले जाते। वहीं रियाज चलता रहा। उनदिनों कथक केंद्र के हर कोने-कोने से घुंघुरूओं और पढंत की आवाज आती रहती थी।

Thursday, February 6, 2020





                                                                संगीत के सुरों का संगत और पंडित राजेंद्र प्रसन्ना

                                                                शशिप्रभा तिवारी




पंडित राजेन्द्र प्रसन्ना बनारस घराने के बंासुरी और शहनाई वादक हैं। उन्हें अपने पूर्वजों से बंासुरी वादन की कला विरासत में मिली है। पर अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर उन्होंने पारिवारिक विरासत को संजोया है। पंडित राजेन्द्र प्रसन्ना ने अपने पिता पंडित रघुनाथ प्रसन्ना और चाचा पंडित भोलानाथ व पंडित विष्णु प्रसन्ना से बंासुरी की बारीकियों को सीखा। बंासुरी में गायकी अंग को समाहित करने के लिए उन्होंने रामपुर सहसवान घराने के उस्ताद हाफिज अहमद और उस्ताद सरफराज हुसैन खंा साहब से तालीम ली।

वह अपने घर की परम्परा के बारे बताते हुए, कहते हैं कि हमारे पूर्वज कूचबिहार के दरबार के कलाकार थे। वहंा वो लोग नौबत खाने में शहनाई बजाते थे। पर मेरे पिताजी को ऐसा लगा कि शहनाई में वो इज्जत नहीं मिलेगी, जिसकी उन्हें उम्मीद थी, सो उन्होंने बासुरी बजाना और सिखाना शुरू किया। उन्होंने अपने छोटे भाई भोलेनाथ और पंडित रोनू मजूमदार के पिता भानु मजूमदार को सिखाया। बाद में, उन्होंने शिष्यों को तालीम देना अपना मुख्य ध्येय बना लिया। एक समय था, जब बंासुरी वादन के क्षेत्र में मेरे पिताजी और पंडित पन्ना लाल घोष का नाम था।

पंडित राजेन्द्र प्रसन्ना आगे कहते हैं कि मुझे शहनाई बजाना मेरे दादाजी ने सिखाया। पर 70 के दशक में मैंने बंासुरी बजाना शुरू किया। पिताजी से सीखने का मौका कम मिलता था क्योंकि वो मुम्बई में रहते थे और मैं बनारस में। वह चार सौ रूपए भेज देते थे, उससे घर का खर्च मुश्किल से चलता था। मुझे याद है कि मैंने सात साल की उम्र से ही शादी-व्याह के मौके पर शहनाई बजाता था। इससे माताजी को घर चलाने के लिए कुछ मदद मिल जाती थी। आठ साल की उम्र में कलकŸो में बालकलाकारों के संगीत उत्सव में पहली बार बजाया था। उस समय मुझे चाॅकलेट मिला था। उस वक्त मैंने पहली बार चॅाकलेट देखी थी। उस समारोह में मुझे मेरे चाचाजी लेकर गए थे।

वह अपना आदर्श पंडित रविशंकर और उस्ताद अमजद अली को मानते हैं। वह एक वाकया को याद करते हुए, कहते हैं सन् 2002 में पंडित रवि शंकर के साथ लंदन में काम करने का मौका मिला। वह समारोह राॅयल अलबर्ट हॅाल में आयोजित था। प्रोग्राम से पहले सात दिनों का रिहर्सल चला। सुबह ग्यारह बजे से रिहर्सल शुरू होती थी, पर पंडित रविशंकर हम कलाकारों से पहले ही वहां पहँुच जाते थे। उनका वह अनुशासन काफी प्रेरणादायी लगा। बाद म,ें उस वीडियो को प्रतिष्ठित ग्रैमी अवार्ड मिला।

गुरू-शिष्य परम्परा के बारे बताते हुए पंडित राजेन्द्र प्रसन्ना कहते हैं कि आजकल के बच्चे सीखना तो चाहते हैं, पर उन्हें नाम कमाने के लिए जल्दीबाजी रहती है। गुरू और बुजुर्गों की दुआ से बेसुरा भी सुर में हो जाता है। दुआओं से ही कला फलीभूत होती है। गुरूओं की फटकार से कलाकार अपनी कला को माँजता है। माँ-बाप और गुरू की बददुआ से कला खत्म हो जाती है।



    पंडित राजेन्द्र प्रसन्ना के तीन बेटे हैं।उन्होंनेे भी उनसे तालीम ली है। वह कहते हैं कि मेरे बच्चों ने काॅलेज की पढाई की है। वे लोग मेहनत करें तो अच्छा कर सकते हैं। संगीत में रियाज सबसे जरूरी है। खानदानी संगीत भी बिना रियाज के टिक नहीं सकता। अगर कलाकार रियाज नहीं करेंगें तो मनचाहा स्वर नहीं निकाल पाएँगें। शहनाई वादकों की देश को बेहद जरूरी है, क्योंकि शहनाई सम्राट बिस्मिल्ला खंा के जाने के बाद इस क्षेत्र में शून्यता आ गई है। अपनी बहुमूल्य विरासत को संजोए रखने का दायित्व युवाओं पर है।

बांसुरी सीखने के बारे में वह कहते हैं कि छोटे बच्चों की तालीम की शुरूआत सरगम के साथ शुरू होती है। उसके बाद, तीव्र ‘मध्यम‘ वाले राग को प्राथमिकता दी जाती है। पहला राग ‘यमन‘ मैं सिखाता हँू। इसके बाद दूसरा राग भैरवी ली जा सकती है। लेकिन कायदे से राग को सीखने में एक शिष्य को एक या दो साल लग जाते हैं। यदि एक शिष्य अच्छे से एक राग को सीख ले तो उसे दूसरे राग को सीखने में देर नहीं लगती।


Friday, January 31, 2020




                                                            बासंती बयार के साथ बासंती रंग
                                                                     
                                                                               और 

                                                            पंडित जसराज, वरिष्ठ शास्त्रीय गायक


कुछ समय पंडित जसराज राजधानी दिल्ली आए थे। उस दौरान उनसे बसंत के मौसम और जीवन के बसंत के बारे में कुछ बातचीत हुई। उसी के कुछ अंश पेश हैं। प्रस्तुति शशिप्रभा तिवारी



पंडित जसराज कहते हैं ---बसंत की चंचल बयार के साथ ही ठंढ के मौसम से राहत मिलने लगती है। इसी बसंत के मौसम का पहला आह्वान विद्या की देवी सरस्वती की पूजा से होता है। उसी दिन हम कलाकार, रसिक, साहित्यकार जैसे सरस्वती पुत्र-पुत्रियां एक-दूसरे को बसंत की बधाई देते हैं और अपने वाद्यों का पूजन करते हैं। इसी दिन से राग बसंत, बहार, होली, फाग को गाने की शुरूआत भी करते हैं। तब मैं भी बसंत की वह सुंदर बंदिश को गाने से खुद को रोक नहीं पाता-‘और राग बने बाराती, दुल्हा राग बसंत‘। दरअसल, सुंदरता है तो अलग-अलग तरह से सजती है, प्रकृति तो अपना श्रृंगार खुद ही कर लेती है। इस मौसम में सरसों के पीले फूल, पलास के बसंती फूल और भी तरह-तरह के पौधें पुष्पित-पल्लवित हो उठते हैं। बसंत का यह पीतांबरी सौंदर्य भगवान की ही कृपा है।








बसंत की बहार की पराकाष्ठा का त्योहार है-होली। जसराजजी आगे कहते हैं--- रंगों का त्योहार होली भी हर त्योहार के जैसे वर्ष भर के इंतजार के बाद आता है। इन त्योहारों के माध्यम से हम अपनी आस्था को और मजबूत होता पाते हैं। जब हम बच्चे होते हैं, उस समय माता-पिता तीज-त्योहारों या रीति-रिवाजों से जोड़ते हैं। हमें उन्हें मानना चाहिए। धीरे-धीरे हम अपने उम्र के पड़ावों से जैसे-जैसे गुजरते हैं, वैसे-वैसे उन अदृश्य शक्तियों से परिचित होते हैं। जिंदगी के अनुभव हमें समृद्ध करते हैं और हमारे विश्वास को सबल बनाते हैं। हम कभी भी किसी की आस्था-विश्वास को ठेस नहीं पहुंचा सकते। हमारे रीति-रिवाज, त्योहार, धार्मिक उत्सव, जो भी हैं-वह सही हैं। आप या हम इस पर अंगुलियां नहीं उठा सकते। हम जितनी अपने धर्म या रीति-रिवाज के प्रति श्रद्धा रखते हैं, उतनी सबके प्रति रखनी चाहिए।


वह मानते हैं कि मेरा यह सौभाग्य है कि मुझे बरसाने, मथुरा, गोकुल, वंृदावन यानि कृष्ण, राधा और गोपियों की नगरी में रमने का अवसर मिला। मैं होली को राधा-कृष्ण के प्रेम की अभिव्यक्ति का पर्व मानता हूं। जिस तरह कृष्ण-गोपियों के साथ शारदीय पूर्णिमा को रास नृत्य करते हैं, उस तरह ही वह होली के रंगों में सराबोर कर देते हैं। वहां कृष्ण राधामय हो जाते हैं और राधा कृष्णमय हो जाती हैं। कोई अंतर नहीं रह जाता है। और तो और गोपियों गोपाल से कहती हैं कि हमारे आंखों में लाल गुलाल मत डालो, अन्यथा हम आपके सुंदर रूप को नहीं देख पाएंगें। तभी तो हम गाते हैं कि

‘लाल गुपाल,
गुलाल हमरी आंखिन में जिन डारो जू,
बदन चंद्रमा
इन अंतर गुण बन बारो जू‘


पंडित जसराज कहते हैं  कि अक्सर, मैं जब किसी मंदिर में जाता हूं, तब भगवान के चरणों में स्वर सुमन अर्पित करता हूं। ऐसे ही एक बार बरसाने में मैं राधाजी के मंदिर में गर्भ गृह में बैठकर यूं ही गा रहा था। वहां राधा जी के मंदिर में तीन युवतियां बैठी थीं, पुजारी शोर मचा रहे थे और मैं बैठकर गा रहा था। तभी उनमें से एक ने पुजारी जी को डांटते हुए, चुप रहने को कहा। कुछ देर गाने के बाद, जब मैं उठकर जाने लगा। तब वही कन्या बोली कि यहां समय लेकर आईए और समयानुसार गाईए। मैंने कहा कि मैं आपके पैर छूना चाहता हूं। अभी मेरे जेब में सिर्फ ये पचास का नोट है, यह देना चाहता हूं। उसके बगल में खड़ा संावला-सा युवक अचानक कहां से प्रकट हा गया, उसने कहा कि ये पैर छूना चाहते हैं, तो छूने दो। और पंडितजी जो दे रहे हैं, ले लो। दोनों का आदेश कमाल का। इतना जबरदस्त अहसास! मैं अनुभूति करता हूं कि साक्षात राधा जी और कृष्ण जी थे। यह मेरी आत्मा बोलती है। फिर, मैं तीन दिन वहीं बरसाने में रहा। वहां बैठा राधा रानी को निहारता और गीतों को गाता रहता। मगर, वो घटना मेरे मन पर अमिट छाप छोड़ गई।


जसराजजी आगे कहते हैं----हालंाकि, उसके बाद कई बार बरसाने जाना हुआ। वंृदावन में बांके बिहारीजी के मंदिर में गीत गाया हूं। उस जगह पर बैठ कर गाने का सौभाग्य जहां स्वामी हरिदासजी बैठ कर अपने गोपाल के लिए गाया करते थे। कुछ ऐसी कृपा रही है। वह अद्भुत है कृपानिधान है, जो मुझ पर कृपा करता रहता है। मैं उसी के श्याम रंग में रंगा खुद को पाता हूं। होली हो तब भी और न हो तब भी। वैसे होली के रंग खुशियों के रंग होते हैं, जो हमें खुश रहने और खुशी बांटने की प्रेरणा देते हैं।

पंडित जसराज कहते हैं कि मुझे होली में रंगों से खेलना, गुलाल लोगों के गालों पर मलना और गुलाल हवा में उड़ाना बहुत पसंद था। था! इसलिए कि अब वैसे नहीं खेलता जैसे पहले खेलता था। हां! होली ऐसा त्योहार है, जो हर साल अपनी खूबसूरत याद साल भर के लिए दे जाती है। उसकी रंग में खुद को रंगा हुआ महसूस करता रहता हूं। मुझे लगता है कि हर होली मुझ पर अपना अलग रंग महसूस करवाकर चली जाती है। इस बार भी मैं होली के समय मथुरा में ही रहूंगा। देखूं इस बार गोपाल की नगरी की होली का रंग मुझपर कैसी छाप छोड़ती है। मैं बहुत अधीर से उन पलों का इंतजार कर रहा हूं।


उनका संदेश है---होली तो हम खुशियों से भर देती थी। हैदराबाद में होली का कार्यक्रम सारे दिन चलता रहता था। नवाब साहब की ओर से ‘चंदू लाल की बारादरी‘ में होली का समारोह आयोजित किया जाता था। वह बहुत बड़ी बावड़ी थी। जिसमें रंगीन पानी भरा जाता था। एक तरफ हर अतिथि को उस पानी में डुबोया जाता और हर कोई एक-दूसरे को रंग-बिरंगा देखकर हंसता-मुस्कुराता। दूसरी तरफ वहां महिला और पुरूष कलाकार संगीत का महफिल जमाए रखते। ऐसा खुशमिजाज माहौल होता था, किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं होती थी, कि मुझे भिंगोया क्यों? रंग क्यों लगाया? पिचकारी के फव्वारे क्यों चलाया? वहां सभी गाना-बजाना सुनते, झूमते, खाते-पीते और जिंदगी के रंग में रंगकर आनंद में डूब जाते थे। यह सच है कि आज का माहौल काफी बदल चुका है। मुझे लगता है कि हमें समय के अनुसार ढल जाना चाहिए। उस समय का माहौल कुछ वैसा ही था, आज समय बदल गया है। लोग दूर से ही फेसबुक, वाट्स-अप, ट्विटर पर मैसेज के जरिए ही होली मना रहे हैं, तो यह बदलते समय का तकाजा है। हो सकता है कि लोगों को जिंदगी में रंगों की कमी महसूस होगी तो वह खुद ही रंग-बिरंगे रंग में रंगने को घर से निकलकर आएंगें।





Wednesday, January 29, 2020




बनारस घराने की प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका सविता देवी जी का तानसेन सम्मान मिला था। तब ग्वालियर में उनका साथ मिला। अक्सर, उनसे बात होती थी। उनदिन उनकी तबीत ठीक नहीं थी। कहा कि आजकल ता अस्पताल से घर और घर से अस्पताल का सिलसिला चल रहा है। हाल में उन्होंने इस दुनियारी का अलविदा कहा, उन्हीं की याद में




                                               वैशाली की नगरवधू को बार-बार पढ़ती हूं

                                              -शशिप्रभा तिवारी


मेरे जीवन में बचपन से ही संगीत के सुर गूंजने लगे थे। मैं सोते-जागते संगीत के सात सुरों की गूंज को अपने आस-पास प्रतिध्वनित होते महसूस करती थी। लेकिन, मां ने अपनी कुछ व्यस्तताओं के कारण और मेरी पढ़ाई का नुकसान न हो, इसलिए हाॅस्टल में डाल दिया। स्कूल की पढ़ते हुए, मैंने हिंदी साहित्य के महान साहित्यकारों जयशंकर प्रसाद, मुशी प्रेमचंद, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, मैथिलीशरण गुप्त की लिखी रचनाओं को खूब पढ़ा।
मुझे ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की रचनाएं ज्यादा आकर्षित करती हैं। मैंने काॅलेज की पढाई के दौरान जहां एक ओर सितार बजाना सीखा, वहीं दूसरी ओर बहुत सारी किताबें पढ़ीं। जिनमें जयशंकर प्रसाद का लिखा-कामायनी, ध्रुवस्वामिनी, आंसू, ममता, अजातशत्रु ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उन्होंने जिस नजर से स्त्री के भावों को समझा और उसकी पीड़ा को अभिव्यक्त किया है, वह मुझे भीतर तक छूता है। कभी-कभी सोचती हूं कि लेखक वाकई, तभी इतना सशक्त लिख पाते होंगें, जब वो उस दर्द को अपने भीतर महसूस करते होंगें।




                                                      




उसी दौरान मेरे हाथ आचार्य चतुरसेन शास्त्री की अमरकृति ‘वैशाली की नगरवधू‘ लगी। यह हिंदी में लिखा एक गंभीर और प्रभावकारी बौद्धकालीन ऐतिहासिक उपन्यास है। इस उपन्यास के आमुख में लिखते हैं कि यह रहस्योद्घाटन करता है। यह सत्य है, काले पर्दे के प्रति कि आर्यों के धर्म, साहित्य, राजसŸाा और संस्कृति की पराजय और मिश्रित जातियों की प्रगतिशील संस्कृति की विजय सहस्राब्दियों से छिपी हुई है। जिसे संभवतः किसी इतिहासकार ने आंख उघाड़कर देखा नहीं है।

‘वैशाली की नगरवधू‘ की कथा वस्तु में शिशुनाग वंश के राजा बिंबसार के समय के मगध राज्य का वर्णन है। इसमें ग्यारह वर्ष की अल्हड़ उम्र की बालिका आम्रपाली को नगर वधू घोषित कर दिया जाता है। क्योंकि, वैशाली में उस समय यह कानून था कि गणतंत्र की जो सबसे सुंदर बालिका होगी, उस पर पूरे गणतंत्र का समान अधिकार होगा। वह किसी एक व्यक्ति की होकर नहीं रह सकती है। आम्रपाली के सौंदर्य से मगध के सम्राट बिंबसार परिचित थे। वह उसके प्रति आसक्त भी थे, सो उन्होंने उसे पाने की लालसा से वैशाली पर आक्रमण भी किया।

आम्रपाली की पीड़ा को मैं अपने भीतर गहराई से महसूस करती हूं। जब पहली बार इस उपन्यास को पढ़ा, तब तो मेरे रोंगटे सिहर गए थे। हर पन्ना पढ़कर, मैं सोचने पर मजबूर हो जाती थी। वह बच्ची जो अपने बाबा से सुंदर कंचुकी खरीदने की जिद करती है। वह बालिका, जो अभी सखियों के साथ खेलना चाहती है, घूमना-फिरना चाहती है, उसे महल की कैद में विलासी जीवन जीने को मजबूर होना पड़ता है। उसे हर तरह का वैभव मिलता है। लेकिन, उसके अंदर की पीड़ा को तो सिर्फ भगवान  बुद्ध ने ही समझा। वाकई, हमें जीवन में सब कुछ मिल जाता है, फिर भी संघर्ष की वह पीड़ा कभी भूलता नहीं। आम्रपाली के जीवन को जब देखती हूं तब लगता है कि कहीं न कहीं आज भी बहुत-सी आम्रपाली हमारे इर्द-गिर्द मौजूद हैं। भले हम उनके दर्द को महसूस नहीं करते या उनकी ओर देखना नहीं चाहते या उस तरफ से अपनी नजरों को हटा लेते हैं। पर, इससे समाज का सच नहीं बदलता।

दरअसल, भौतिक जीवन में सब कुछ मिल जाने के बावजूद भी स्त्री को सम्मान की चाहत हमेशा रहती है। चाहे मां के रूप में, चाहे कलाकार के रूप में या जिस रूप में भी हो उसे समाज से इज्जत की चाह हमेशा से रहती है। मैंने नारी की अस्मिता को गौरवान्वित करने के लिए ही अपनी मां के ऊपर किताब ‘मां सिद्धेश्वरी‘ लिखा। क्योंकि, मैंने मां के संघर्ष को अपने भीतर महसूस किया। वह दिन भर तो व्यस्त रहती थीं। कलाकार और विद्वान लोगों से घिरी रहती थीं। मैं भी उनदिनों दौलतराम काॅलेज में पढ़ाती थी, तो व्यस्त रहती थी। लेकिन, रात को जब हम निश्ंिचत होते तब मां से ढेर सारी बातें करते। हालांकि, मैं मां के साथ जब कार्यक्रमों में जाती थी, उनके साथ मंच पर बैठकर तानपुरा बजाती थी। उस समय बहुत कुछ देखती-सुनती थी। पर जब मां अपनी जुबान से अपनी बातें बतातीं थीं, तब खुशी भी होती और दुख भी होता। उनकी बातों को मैं डायरी में रोज लिखती थी। उसे ही मैं उस किताब का रूप देने का कोशिश की।

सच कहूं, तो आज भी मेरे पलंग के सिरहाने पर आपको ‘वैशाली की नगर वधू‘ रखा हुआ, मिल जाएगा। क्योंकि, जीवन का सच और संघर्ष उससे बेहतर मुझे नहीं लगता। इसलिए, आज भी उसे बार-बार पढ़कर, पुरानी यादों को ताजा करती हूं और जीवन में संघर्ष करने के लिए प्रेरित होती हूं। वैसे भी जीवन आशा-निराशा, सुख-दुख, हंसी-गम की कहानी ही तो है। कभी-कभी सोचती हूं कि हम तो काशीवासी हैं। काशी यानी ‘आनंदवन‘, जहां हर समय ‘बरसत रंग आनंदवन‘ है, पर फिर भी, अब कामना रहती है कि काशी की मिट्टी वहीं काशी की माटी में ही मिल जाए।

Friday, January 17, 2020

अनबाउंड बीट्स आॅफ इंडिया समारोह





                                    अनबाउंड बीट्स आॅफ इंडिया समारोह
                                 
                                    शशिप्रभा तिवारी


उत्सव की ओर से आयोजित किया जाने वाला यह सलाना जलसे का कलाकार वर्ष भर इंतजार करते हैं। वरिष्ठ कलाकारों की ओर से युवा कलाकारों को यह अवसर देना, वास्तव में, उन्हें मान्यता प्रदान करने जैसा है। यह प्रयास सराहनीय है।





पिछले दिनों राजधानी में अनबाउंड बीट्स आॅफ इंडिया समारोह का आयोजन किया गया। इसमें विभिन्न नृत्य शैली के युवा कलाकारों ने नृत्य पेश किया। समारोह में ओडिशी, भरतनाट्यम, कुचिपुडी, कथक, मोहिनीअट्टम नृत्य शैली में अंकिता बख्शी, विनोद केविन बचन, मोहित श्रीधर, दीक्षा रावत, आयना मुखर्जी, चित्रा दलवी वारटक और वाणी भल्ला पाहवा ने नृत्य पेश किया। इस समारोह का आयोजन उत्सव की ओर से किया गया।







कुचिपुडी गुरू जयराम राव और वनश्री राव की शिष्या आयना मुखर्जी ने समारोह में शिरकत किया। आयना ने दशावतार पेश किया। यह राग मोहनम और मिश्र चापू ताल में निबद्ध था। इसकी परिकल्पना डाॅ वेम्पति चिन्नासत्यम ने की थी। आयना ने गुरू वनश्री राव की नृत्य रचना चित्रसभा पेश किया। इसमें कैलाश पर्वत पर भृंगी व भूत गणों के साथ नृत्य करते भगवान शिव को उन्होंने नृत्य में दर्शाया। भगवान शिव को भस्म विभूषित, त्रिनेत्रवाले और रूद्राक्ष धारण किए हुए हैं। यह राग गौरी और आदि ताल में निबद्ध थी। 
इसी प्रसंग को भरतनाट्यम नृत्यांगना चित्रा दलवी वारटक ने पेश किया। स्वाति तिरूनाल की यह रचना राग हंसध्वनि और आदि ताल में निबद्धि था। यह डाॅ संध्या पुरेचा की नृत्य रचना थी। रचना ‘शंकर श्री गिरिनाथ प्रभु‘ पर यह आधारित थी। 




इंडिया हैबिटाट सेंटर में आयोजित इस नृत्य समारोह का आरंभ अंकिता बख्शी के ओडिशी नृत्य से हुआ। गुरू रंजना गौहर की शिष्या अंकिता और विनोद केविन बचन ने नृत्य किया। दोनों शिष्या-शिष्य ने नृत्यांगना रंजना गौहर की नृत्य रचनाओं को पेश किया। समारोह की शुरूआत में अंकिता ने मंगलाचरण पेश किया। यह रचना ‘जय जय जननी‘ पर आधारित थी। यह राग प्रथम मंजरी और एक ताली में निबद्ध था। नर्तक विनोद केविन बचन ने अर्धनारीश्वर में शिव-पार्वती के रूप को पेश किया। यह आदि शंकराचार्य की रचना पर आधारित था। राग मालिका और ताल मालिका में इसे पिरोया गया था। उनकी दूसरी प्रस्तुति विश्व रूप दर्शन थी। यह श्रीमद्भगवत गीता के श्लोक पर आधारित थी। यह राग मालकौंस व अहीर भैरवी और एक ताली में निबद्ध थी। इसमें व्यथित अर्जुन के भाव को विनोद केविन ने दर्शाया। यहीं कृष्ण ने उन्हें कर्म का संदेश और विश्व रूप का दर्शन दिया। इन नृत्य रचना की संगीत रचना आचार्य बंकिम सेठी की थी।

मोहिनीअट्टम नृत्य शैली में वाणी भल्ला ने नृत्य पेश किया। गुरू भारती शिवाजी की वरिष्ठ शिष्या वाणी ने शुद्ध नृत्त का अंदाज मुखचालम में पेश किया। विभिन्न ताल अवर्तनों पर अंग, पद और हस्त संचालन उन्होंने पेश किया। यह सोपानम संगीत के राग मालिका-बेगड़, सावेरी व देसखी में पिरोई गई थी। वाणी ने जयदेव की अष्टपदी ‘ललित लवंग लता‘ को नृत्य में पिरोया। यह राग पुरूनीर, बसंत और मध्यमावती में निबद्ध थी। राधा कृष्ण के भावों का यह विवेचन मार्मिक था।

इस समारोह में कथक नृत्य को नृत्यांगना दीक्षा रावत और नर्तक मोहित श्रीधर ने पेश किया। गुरू उमा डोगरा की शिष्या दीक्षा रावत ने धमार ताल में शुद्ध नृत्त पेश किया। इसके अलावा, ठुमरी ‘बाट चलत‘ पर भाव दर्शाया। दीक्षा ने तीन ताल में निबद्ध तराने को भी नृत्य में पिरोया। जबकि, पंडित राजेंद्र गंगानी के शिष्य मोहित श्रीधर ने जयपुर घराने की तकनीकी बारीकियों को नृत्य में पिरोया। उन्होंने तीन ताल में पैरों के काम के जरिए तैयारी और विभिन्न लयकारी को दर्शाया। गोस्वामी तुलसीदास की रचना रूद्राष्टकम में शिव के रूप को उन्होंने चित्रित किया। यह राग रागेश्वरी और बागेश्वरी में निबद्ध था। उन्होंने धमार ताल में पखावज के बोलों पर वीर रस का अंदाज दर्शाया।

Wednesday, January 1, 2020

आज नया सूरज

आज नया सा सूरज लगा
मैंने हथेली की ओट कर
देखा था
समय काफी बीत चूका था
नीले आसमान में
उड़ते कबूतर के जोड़े  थे 
मेरी  स्मृति  में
वही बात आई
तुम्हारी यादों की पोटली
सिराहने रखती हूँ
उसे ही ओढ़ती हूँ
और बिछाती  हूँ
उन्ही को बांटती हूँ
बातचीत के जरिये
और उन्ही के बीज बोती हूँ
क्यारिओं में मेथी दाने की तरह
कुछ मीठे, कुछ कड़वी यादों को
संभाले रखना चाहती हूँ
कहीं कोई खोल न दे
कहीं कोई बिखेर न दे
कभी-कभी सोच कर डरती हूँ
सच, कहा कान्हा !
यादों के सहारे जिंदगी बीत जाती है
बरस और बरस ....
तुम्हारी मुरली की धुन
सुन-सुन गुनती हूँ
कुछ सुख और दुःख की बातें
यही यादें सौंप कर
उड़ जाता है
कबूतर का वह जोड़ा
अनंत आसमान में