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Thursday, June 27, 2024

#आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी; भारत की समृद्ध संस्कृति प्रभावित रहा हू @विनोद केविन बचन

 #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी

                                               भारत की समृद्ध संस्कृति प्रभावित रहा हूं

                                                        @विनोद केविन बचन 

ओडिसी नृत्य गुरु रंजना गौहर के पास इनदिनों विनोद केविन बचन ओडिशी नृत्य सीख रहे हैं। उनके पिता निजी कंपनी में नौकरी करते हैं और मां बिजनेस लेडी हैं। केविन वेम्पति चिन्ना सत्यम के एक शिष्य से कुचिपुडी नृत्य सीख रहे थे। उन्हीं दिनों उन्हें ओडिसी नृत्यंागना संगीता दाश का नृत्य नवरस देखा था। वह उन्हें बहुत अनूठा और अद्भुत लगा। इसलिए वह नृत्य सीखने भारत आ गए। उन्हें संगीत नाटक अकादमी की ओर से उस्ताद बिस्मिल्ला खां सम्मान से सम्मानित किया गया है।

आप भारत कैसे आए?

केविन वचन-शुरूआत में त्रिनिदाद में ही रहकर सीखना चाहता था। पर वहां जो टीचर थे वह लड़कों को ओडिसी सिखाने में दिलचस्पी नहीं लेेते थे, सो मैं कलाक्षेत्र के कुछ दोस्तों के साथ भारत आ गया। भुवनेश्वर में लगभग साढ़े तीन साल रहा। वहां मैं विŸाीय संकट और भावनात्मक अकेलेपन से जूझता रहा था। जापानी डांसर इको शिनोहारा भी मेरी तरह परेशान थी। संयोगवश, मैं दिल्ली आया और यहां मेरी मुलाकात रंजना जी से हुई। शुरू में ‘उत्सव‘ यानि गुरु जी की डांस एकेडमी में डांस करते हुए, थोड़ी झिझक होती थी। शर्म भी आती थी क्योंकि, तीन साल तक भुवनेश्वर में एक स्कूल से दूसरे स्कूल जाता रहा पर कुछ सीख नहीं पाया था। देर से ही सही मुझे समझ में आया है कि इच्छा और लक्ष्य जब एक हो जाते हैं तो कड़ी मेहनत से उसको प्राप्त किया जा सकता है।




अपनी वर्तमान गुरु रंजना गौहर जी से आपने क्या सीखा?

केविन वचन-मैं वहां सीखकर संतुष्ट नहीं हो पाया था। इसी दौरान वर्ष-2014 में गुरु रंजना गौहर से परिचय हुआ और मैं दिल्ली आ गया। उनसे ओडिशी नृत्य सीखने के लिए। पहले ही सप्ताह में ‘चित्रांगदा‘ के रिहर्सल के दौरान गुरु जी के डांस को करीब से देखने का मौका मिला। हमारी गुरु जी बताती हैं कि शास्त्रीय नृत्य या संगीत सीखने की जब आप शुरूआत करते हैं। तब आप कोई उद्देश्य लेकर नहीं सीखते। यह सोचकर सीखना शुरू नहीं करते कि मैं एक दिन बहुत नामी कलाकार बन जाऊंगी।
एक बार गुरु जी ने खुद बताया कि उनकी मां ने तो बस ऐसे ही डांस क्लास ज्वाइन करवा दिया था। वह कहती हैं कि वह अपने गुरू मयाधर राउत की परछाईं से भी सीखने की कोशिश करती थी। उनके पास जब क्लास के लिए जाती तो लगता उनसे ज्यादा-से-ज्यादा सीखूं। सीखने की भूख उनकी गजब की थी। शायद, उनके गुरु जी को यह बात समझ में आती होगी। यह मेरा अनुमान है। कितना सही होगा! पता नहीं। वह अपने क्लास के बाद, जब दूसरे बैच की क्लास चलती तो उसमें भी अपने गुरु जी की इजाजत लेकर बैठने की कोशिश करती ताकि कुछ और देख सकंे और गुरूजी का सानिध्य मिले। उनदिनों गुरूजी भारतीय कला केंद्र में सिखाते थे। वह दस बजे क्लास के लिए चली जाती थी। एक बजे तक क्लास होती। दोपहर में लंच होता। फिर, शाम को चार बजे दोबारा क्लास शुरू होती। उनका तब घर जो जंगपुरा में था, बार-बार आना-जाना संभव नहीं था। सो वह लंच लेकर जाती थी। गुरूजी से कहती कि आप जाईए मैं यहीं कमरे में प्रैक्टिस करूंगी। वह बाहर से ताला लगा कर चले जाते। वह अंदर से बंद करके और बिना घुंघरू के रियाज करती थी, जो गुरू जी सिखाए होते। उसे बड़े-से कमरे में शीशे के सामने खड़े होकर देख-देखकर रियाज करती। उनके अंदर कला को सीखने की भूख थी। वह उन दिनों करीब दस-बारह घंटे का रियाज करतीं थीं।

ओडिसी नृत्य में सीखना क्या आसान है?

केविन वचन-ओडिसी नृत्य बहुत सरल, भावनाओं से भरपूर, स्वाभाविक, इसमें अंगों की गतियां नजाकत से भरी हुई हैं। इससे कलाकार को अपने नृत्य में भावनाओं को अभिव्यक्त करना बहुत सरल और सहज लगता है। मुझे ओडिसी का तकनीकी और अभिनय दोनों ही पक्ष अच्छा लगता है। ओडिसी में पल्लवी में शुद्ध नृत्त पेश किया जाता है। इसमें विलंबित से मध्य और दु्रत लय में नृत्य एक पूरी यात्रा करते हैं। हमारे इस यात्रा में दर्शक भी शामिल होते हैं। अभिनय में साहित्य के साथ शुद्ध नृत्त का प्रयोग इसे एक नया विस्तार देता है।

एक डांसर को शारीरिक पीड़ा भी झेलना होता है। जब नृत्य सीखने की शुरूआत होती है, उस समय मांसपेशियों में दर्द उठना तो स्वाभाविक होता है। हाथ, पैर और पूरे शरीर को एक भंगिमा या गति में रखने से दर्द का अनुभव होता ही है। पर जब सीखनेवाला नृत्य का आनंद चख लेता है, तो वो शारीरिक पीड़ा जाती रहती है। अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग दो-तीन महीने डंास की प्रैक्टिस ही नहीं करतीं। फिर अचानक जब प्रोग्राम आता है तब आठ-दस घंटे का रीहर्सल करती हैं, जो उनके लिए घातक सिद्ध होता है। इसलिए मेरा मानना है कि प्रोफेशनल डंासर को नियम से रोजाना घंटे भर के रियाज के साथ-साथ योगासन और कसरत करना चाहिए। इससे बाॅडी की क्षमता बनी रहती है। क्योंकि एक डांसर का बाॅडी ही उसका इंस्टूमेंट है। वैसे भी डंासर और डांस एक ही सिक्के के पहलू हैं।

आपको भारत में क्या अपनापन मिला?

केविन वचन-मैं परफाॅर्मेंस करना शुरू किया। धीरे-धीरे मुझे लगा कि मुझे एकेडमिक लेवल पर भी कुछ करना चाहिए। मैं अपने देश त्रिनिदाद में बच्चों को भारतीय शास्त्रीय नृत्य सिखाना चाहता था, लेकिन वहां लोगों में बहुत दिलचस्पी नहीं दिखाई दी। मैं भारत की समृद्ध संस्कृति और नृत्य शैली से बहुत प्रभावित रहा हूं। मुझे गुरु और यहां के कलाकारों से बहुत अपनापन और प्यार मिला। मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं भारत का नहीं हूं। मेरे पेरेंट्स ने भी यहां रहने की अनुमति दे दिया। अब तो मुझे लगता है कि भारत ही मेरा अपना घर है।

आप नृत्य के अलावा क्या करना चाहते हैं?

केविन वचन-ंजब मैं दीदी के पास शुरू-शुरू में सीखना शुरू किया तो बहुत संकोच लगता था। मैं अपनी बातें उनसे शेयर नहीं कर पाता था। पर वह मुझे अपने साथ सारे दिन रखतीं थीं। उन्होंने बहुत प्यार से उड़िया गीत, अपने गुरु जी, ओडिसी नृत्य सबके बारे में बताया और समझाया। उन्होंने गुरु मायाधर की ओडिसी नृत्य शैली को अपनाया है। मैं भी उन्हीं की शैली में नृत्य करता हंू। धीरे-धीरे अब महसूस करता हूं कि हमारे ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। अपने गुरु की परंपरा को निभाने और उसे जारी रखने की जिम्मेदारी है। यह आसान नहीं है। यह सच है कि कलाकार अपनी कला के कारण अमर होते हैं। मैं अपने शोध कार्य के माध्यम से दादा गुरु मायाधर राउत जी के संघर्ष और उनके कार्यों को प्रकाश में लाना चाहता हूं। उनके नृत्य शैली की अद्भुत और अनूठे योगदान को हमें नहीं भूलना चाहिए। हालांकि, गुरु जी के अलावा, किरण सहगल और गीता महालिक उनकी परंपरा को निभा रहीं हैं। फिर भी एक युवा कलाकार के तौर पर इसे मैं अपना कर्तव्य समझता हूं। ईश्वर से प्रार्थना है कि मुझे शक्ति दें ताकि मैं इस कार्य को पूरा कर सकूं।

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shashiprabha: #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी --संगीत की अनवरत यात...:  #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी                                                                                                             ...

#आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी --संगीत की अनवरत यात्रा@पंडित दुर्जय भौमिक

 #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी

                                                       

                                                        संगीत की अनवरत यात्रा
                                                         पंडित दुर्जय भौमिक

पंडित दुर्जय भौमिक के पहले गुरू बनारस घराने के पंडित दुलाल नट्टा थे। उसके बाद, उन्होंने पंडित वी मालवीय से वादन सीखा। दुर्जय भौमिक आकाशवाणी और दूरदर्शन के ए-ग्रेड के कलाकार हैं। वह आईसीसीआर के एम्पैन्ल्ड कलाकार हैं। उन्हें शंकर लाल संगीत समारोह, तानसेन संगीत समारोह, ताज महोत्सव, मैहर उत्सव जैसे समारोह में शिरकत करने का अवसर मिल चुका है। उन्हें वर्ष-2022 में न्यु एज तबला माइस्त्रो अवार्ड प्रदान किया गया। यह इंडो अफी्रकन चैम्बर आॅफ काॅमर्स ने दिया। इसके अलावा, उन्हें संगीत साधक सम्मान, संगीत सहोदर सम्मान, सप्तऋषि लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड आदि सम्मान मिल चुके हैं। इनदिनों वह तालयोगी पंडित सुरेश तलवरकर के सानिध्य में तबले की बारीकियो को सीख रहे हैं। साथ ही, सिखा भी रहे हैं। 

पंडित सुरेश तलवरकर जी के सानिध्य में आप कैसे आए?

दुर्जय भौमिक-दरअसल, गुरु जी के सानिध्य में आने के बाद तबले के संदर्भ में नए ज्ञान की प्राप्ति हुई है। उनके अनुभवी नजर से ताल को देखना एक अलग ही नजरिया विकसित हो रहा है। हम कलाकार धीरे-धीरे सीखते हैं और आगे बढ़ते हैं। हमें अवसर और रास्ते का पहचानने की कोशिश करनी पड़ती है। गुरु जी के पास जब सीखते और समझते हैं, तब लगता है कि अभी तो हमारी यात्रा शुरू ही हुई है। आगे लंबा सफर तय करना शेष है। संगीत में एक मुकाम हासिल करने के बाद भी सफर जारी रहता है। और इसके लिए कलाकार को निरंतर प्रयास जारी रखना पड़ता है।

काॅलेज के दिनों में कोलकाता में अक्सर गुरु जी को सुनता था। उस समय मैं मन में सोचता था कि कभी न कभी गुरु जी से सीखना है। उन्हें दिल्ली में शंकरलाल संगीत समारोह में करीब से मिलने का मौका मिला। मैं बहुत हिम्मत जुटाकर उनसे निवेदन किया कि मैं आपसे सीखना चाहता हूं। तब उन्होंने कहा कि तुम मुम्बई आ जाओ। उन्होंने मार्च 1999 में बुलाया था। पर रेल का टिकट नहीं मिला। सो मैं पश्चिम एक्सप्रेस के चालू डिब्बे में बैठकर, उनके पास पहंुच गया। पहली बार उनके पास एक सप्ताह रहा। उस दौरान पहले उन्होंने मुझसे तबला बजवाया। उसके बाद मुझे समझाया और धीरे-धीरे सीखने का दौर फिर से शुरू हुआ। 

                                                   

तबला बजाना और उसके मर्म को समझकर बजाना क्या है?

दुर्जय भौमिक-मुझे याद आता है कि पहली बैठक में उन्होंने कायदा सीखाते हुए, कहा कि एक कायदा ठीक से बजा लोगे तो समझ लेना कि आगे कुछ और सीख पाओगे। सुबह नौ बजे से रात को आठ बजे तक सिर्फ तबला और संगीत की बातें, चर्चा और सीखने का सिलसिला चलता रहता था। एक-एक ताल को महीनों तक सीखना और रियाज करना। यह हमारा ध्येय होता था। 

मुझे लगता है कि गुरु जी का सानिध्य मेरे जीवन की परम प्राप्ति है। उनसे अद्भुत ज्ञान दर्शन मिला है। तबला सिखाते हुए, बातचीत में संगीत का अनमोल दर्शन मिला है। दरअसल, इंसान को अंदर यानी मन से साफ होना चाहिए। तभी आपके बजाने में एक-एक शब्द शुद्धता से उतर पाता है। क्योंकि आपका संगीत में दिल-दिमाग का संयोग होता है। ऐसा संगीत ही आध्यात्मिक संगीत और रसमय संगीत कहा जाता है। तैयारी और रियाज से बजा लेना अलग बात है और ताल को समझकर, उसके भावों को अनुभूति कर बजाना अलग बात है। यह संगीत के मर्म को छूने जैसा ही है। बहुत नाजुक और बहुत कोमल! इसलिए नीचे की लय में बजाना मुश्किल होता है, वह बजाना तो उम्र की परिपक्वता और अनुभव से ही आता है। यह जन्मों की तपस्या से ही संभव है।  

आपके प्रोफेशनल करियर की शुरूआत कैसे हुई?

दुर्जय भौमिक-मेरे करियर का सबसे पहला बड़ा मंच संकटमोचन संगीत समारोह था। इस समारोह में वर्ष 2002 में मुझे पंडित विश्वजीत राय जी के साथ बजाने का अवसर मिला। इसके बाद, पंजाब के पटियाला और कपूरथला के हैरिटेज फेस्टीवल में पंडित राजन एवं साजन मिश्र के साथ बजाया। फिर, बुद्धादित्य जी के साथ वर्ष 2005 में संगत करने का मौका मिला। यह तीन-चार बड़े आयोजनों में बजाकर मेरे अंदर आत्म विश्वास पैदा हुआ कि मैं बड़े-बड़े कलाकारों के साथ संगत कर सकता हूं। 

वास्तव में, प्रतिष्ठित कलाकारों के साथ बजाते हुए, मुझे रोज कुछ नया सीखने का अवसर मिलता था और आज भी मिलता है। मुझे कमानी आॅडिटोरियम की वह शाम कभी नहीं भूलता, फेस्टीवल म्यूजिक फाॅर हारमनी आयोजित था। इस समारोह में मुझे पंडित राजन व साजन मिश्र के साथ संगत करने का अवसर मिला था। मैं इतने बड़े कार्यक्रम और कमानी के नाम से अंदर से थोड़ा घबराया हुआ था। लेकिन, पंडित जी ने बहुत प्यार से मुझसे बजवाया। यह उनकी महानता थी। साथ ही, मुझे पंडित भजन सोपोरी के साथ यूरोप की यात्रा करने का अवसर मिला। मैं वर्ष 2007 से लगातार तीन वर्षों तक उनके साथ जाता है। उस दौरान आॅस्ट्रिया में मेरी कुछ शिष्य भी बन गए थे। वो लोग तबले की ताल और आवाज से बहुत प्रभावित हुए। अपने ड्रम्स को छोड़कर वह तबला वादन मुझसे सीखने लगे। वह सिलसिला आज भी जारी है। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि भारत की संस्कृति बहुत शक्तिशाली और प्रभावशाली है। सांस्कृतिक आदान-प्रदान से संस्कृति का विस्तार होता है।

आपने भविष्य को लेकर क्या सपना संजोया है? 

दुर्जय भौमिक-मेरा सपना है कि मैं एक डिजिटल आॅडियो-विजुअल लाइब्रेरी बनाऊं। बड़े कलाकारों का डिजिटल कलेक्शन हो। इसमें कलाकार, उनके द्वारा गाया या बजाया गया राग, बंदिश, ताल, सबका विस्तार से वर्णन हो। शहर और महानगर में युवाओं के लिए सीखने की सुविधा है। लेकिन, गांव और कस्बों में प्रतिभावान बच्चों को अच्छे गुरु से सीखने का अवसर कम मिलता है या नहीं मिल पाता है। मेरी कोशिश होगी कि आने वाले समय में मैं उन बच्चों को बड़े कलाकारों से सीखने का अवसर मुहैया करवा सकूं। यह मेरा सपना है। बहुत से बच्चे कलाकार नहीं बन पाते क्योंकि करियर की अनिश्चितता रहती है। उनके माता-पिता को समझाने का प्रयास करूंगा और उन्हें वित्तीय सहायता छात्रवृत्तियां प्रदान करूं ताकि उन्हें प्रोत्साहन मिल सके।








 





Thursday, June 20, 2024

#आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी;कथक नृत्य पूर्णतः साधना है @डाॅ पारूल पुरोहित वत्स,

 #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी

कथक नृत्य पूर्णतः साधना है

-डाॅ पारूल पुरोहित वत्स, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित, डीन-स्कूल आॅफ परफाॅर्मिंग आर्ट्स

कथक से आप कैसे जुड़ी?

डाॅ पारूल-मैं मूलतः जोधपुर से हूं। बचपन से नृत्य सीखना शुरू कर दिया। मेरे पिता जी को मेरी शिक्षिका ने बताया कि आपकी बिटिया अभी बच्ची है। अभी छोटी है तो फिल्मी गानों पर नृत्य कर रही है। आपको अच्छा लग रहा है। थोड़ी बड़ी हो जाएगी और इन्हीं गानों पर नृत्य करेगी, तब आपको खुद में अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए पारूल को अब शास्त्रीय नृत्य सिखाना ठीक रहेगा। इस तरह से हमारे शहर में गुरु खेमचंद प्रकाश जी से मेरी सीखने की शुरुआत हुई। वह पंडित संुदर प्रसाद जी के शिष्य थे। उनके मार्गदर्शन में मेरी तालीम शुरु हुई। 

ईश्वर और गुरु की कृपा और माता-पिता के सहयोग से मैं धीरे-धीरे अपना सफर तया करती रही। मुझे सीसीआरटी और संगीत नाटक अकादमी स्काॅलरशिप मिला। राजस्थान में आयोजित होने वाले समारोह में निरंतर नृत्य करने का अवसर मिलता रहा। मेरी इन यात्राओं के दौरान पापा साथ होते थे। 

कथक को बतौर करियर कैसे चुना?

डाॅ पारूल-आमतौर पर दसवीं तक तो सब कुछ सामान्य चलता रहा। लेकिन, बारहवीं में आने के बाद मैंने तय किया कि अब कला क्षेत्र में ही करियर बनाना है। इसी क्रम में मेरा चयन नृत्य ग्राम में हो गया और मैं एक नए सफर पर निकल पड़। दरअसल, उम्र के उस नाजुक दौर में मुझे खुद से उम्मीदें थीं और सीखने की लालसा थी। शायद, तभी मैं आगे बढ़ पाई। गुरु प्रतिमा बेदी और गुरु कुमुदिनी लाखिया के सानिध्य में मैं वाकई जान पाई कि कला क्या है? नृत्य क्या है? जीवन क्या है? भारतीय संस्कृति और दर्शन क्या है?

नृत्य ग्राम में जाकर मैं समझ पाई कि नृत्य साधना का मार्ग है। मैंने उसे उसी गंभीरता से साधने का प्रयास किया। यह सिर्फ तोड़े-टुकड़े सीखना भर नहीं है। खासतौर पर कथक आपके पूरे व्यक्तित्व को अनुशासन से भर देता है। वहीं मैं जान पाई कि नृत्य सीखने के साथ-साथ, नृत्य के बारे में बोलना और लिखना भी जरूरी है। श्रुति के आधार पर कलाओं की शिक्षा चलती रही है। लेकिन, आधुनिक समय में कथक के बारे में चर्चा, सोच-विचार और उसके सिद्धांत पर चिंतन-मनन के साथ लिखा जाने लगा। 

                                                              

अपने गुरुओं से क्या सीखा?

डाॅ पारूल-गौरी मां के साथ गुरु कुल में सुबह से शाम तक कला की ही बातें होती थीं। योग, अपने कमरे की सफाई, कथक का रियाज, रसोई की साफ-सफाई, सुबह-शाम आरती में भाग लेना। विदेश से आए कलाकारों को देखना और उनकी चीजों देखना-समझना लगातार चलता रहता था। डांस के साथ-साथ जीवन में हम और क्या-क्या कर सकते हैं। अपनी सोच को विकसित करने और अपने ही व्यक्तित्व के नए आयाम को तलाशने की दृष्टि उनके पास रहकर ही आया। 

गौरी मां का मानना था कि जब आप मंच पर नृत्य करते हो तो आप अपने नृत्य को अपने ईष्ट देवता को समर्पित करते हुए पेश करो, न कि आॅडिटोरियम में बैठी आॅडियंस के लिए। जब आप ईश्वर को रिझाने के लिए नृत्य करते हैं, तो उसमें रस का समावेश स्वतः हो जाता है। ऐसे में रस का संचार पूरे वातावरण में हो जाता है। इससे दर्शक अछूता नहीं रहता।

नृत्य ग्राम में लगभग एक वर्ष रहने के बाद मैं अहमदाबाद आ गई। यहा कदंब में कुमु बेन के सानिध्य में बहुत तकनीकी बारीकियों को सीखा। उनसे साउंड, लाइट, काॅस्ट्यूम की एक-एक सूक्ष्मताओं को जानने-समझने का अवसर मिला। यह दृष्टि आई कि जीवन का लक्ष्य खुशी, शांति और मोक्ष है। कथक को साधना की तरह देखती रही हूं।

आप कथक नृत्य को क्यों खूबसूरत मानती हैं?

डाॅ पारूल-कथक का क्षेत्र वैसे भी व्यापक है। कथक साहित्य से जुड़ा हुआ है। लखनऊ, बनारस, जयपुर व रायगढ़ हर घराने की अपनी खूबसूरती है। हमारा नृत्य हमारे जीवन और वातावरण से जुड़ा हुआ है। कलाकार को कला के साथ अपनी संस्कृति, संस्कार, पर्यावरण, पारिस्थितिकी, राजनीति की समझ भी चाहिए। क्योंकि हम मयूर की गत या पनघट की गत में कहीं न कहीं अपनी प्रकृति की बात ही तो करते हैं। कथक या कोई भी नृत्य अंतः प्रेरणा से ही सीखा जा सकता है। कलाकार जबरदस्ती नहीं बनाया जा सकता है। 


Thursday, June 13, 2024

मेरा हमसफर कथक नृत्य!-@श्रुति सिन्हा, कथक नृत्यांगना

                          मेरा हमसफर कथक नृत्य!-@श्रुति सिन्हा, कथक नृत्यांगना


कथक नृत्यांगना श्रुति सिन्हा ने कथक नृत्य की शिक्षा गुरु रमा दास और गुरु पंडित मुन्ना शुक्ला से प्राप्त की। उन्होंने कथक नृत्य के साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सीखा। वह दूरदर्शन की मान्यता प्राप्त कलाकार हैं। वह राजधानी दिल्ली में सिपा-श्रुति इंस्टीट्यूट आॅफ परफाॅर्मिंग आट्र्स के माध्यम से कथक नृत्य सीखा रही हैं। साथ ही, देश के विभिन्न शहरों के आयोजनों में नृत्य प्रस्तुत करती रही हैं। पिछले वर्ष श्रुति सिन्हा को डाॅ सरोजिनी नायडू नाइटिंगल सम्मान से सम्मानित किया गया।

आप कथक नृत्य से कैसे जुड़ी?

श्रुति सिन्हा-मेरा भी जीवन और कथक की यात्रा भी इससे अछूता नहीं रहा। मैं एक स्वतंत्रता सेनानी की पारिवारिक पृष्ठभूमि से हूं। मेरे दादा जी स्वर्गीय श्री कृष्ण नंद वर्मा, जो बिहार में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र ‘नवराष्ट्र‘ के संपादक थे। वे स्वतंत्रता की आहुति में समिधा बनकर जलने को खड़े हो गए। मेरे पिता स्वर्गीय सुबोध कुमार सिन्हा अभियंता थे। वे जयप्रकाश नारायण से और जेपी आंदोलन से जुड़े रहे। वे जेपी के अंत समय तक जेपी की डायालिसित करते रहे। वह होमियोपैथी चिकित्सा में उनका हाथ ऐसा सिद्ध था कि कई असाध्य बीमारियों को ठीक करने पर उन्हें लोग भगवान सरीखा मानने लगे। अपने जीवन के अंतिम क्षण तक वे मानवीयता के लिए जीते रहे। वे मुझे पटना के प्रसिद्ध दुर्गा पूजा पंडालों तथा रामलीलाओं में मुझे अपने साथ ले जाया करते थे। संभवतः उसकी छवि मेरे बालमन पर अमिट छाप छोड़ रही थी।
मेरी मां आज भी मेरी मानसिक आधारशिला रही हैं। अपने मां-पिता की मैं लाडली स्वाधीनता, आचार-विचार, संस्कार, मूल्यों और वैचारिक उत्तुंगता को अपने चारों ओर देखते-सुनते, गुनते बड़ी हो रही थी। मेरा बालमन स्वाधीनता भारत के भावों से ओत-प्रोत हो रहा था। यही वक्त था, जब रामलीला की नाट्य कला अपनी भाव-भंगिमा से मेरे बैठक की वातायन की सलाखों के पीछे से मेरी पांच वर्षीया निगाहों से छुपन-छुपाई खेल रही थी। मेरे गंभीर और निश्चेष्ट भाव से आबद्ध मेरे तन और मन को मेरे पिता ने पढ़ा। वह मेरी पहली गुरु रमा दास के पास मुझे नृत्य सीखाने ले गए।


आप कथक केंद्र से कैसे जुड़ीं?

श्रुति सिन्हा-मेरे चाचा जी उनदिनों दिल्ली में कार्यरत थे। उन्होंने ही मुझे बताया कि कथक केंद्र में एडमिशन के लिए फाॅर्म निकला है। मैंने इस तरह यहां दाखिला ले सकी। कथक की साधना के लिए मैं अपने गृह नगर पटना के घर की चारदिवारी से बाहर लांघ गई। जहां नृत्य की परंपरा को बिहार जैसे तथाकथित पिछड़ा प्रदेश पचा नहीं पा रहा था। किंतु, मन में लगन हो, जोश हो, निष्ठा हो और तपने व सहने की क्षमता हो तो दुनिया मुट्ठी में की जा सकती है। एक हाथ में कथक के प्रति साधना और दूसरे हाथ में सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक चुनौतियां। ये चुनौतियां सिर्फ मेरी ही नहीं, बल्कि हर उस कलाकार की हैं, जो किसी भी कला के प्रति समर्पित होता है। ये चुनौती प्रत्येक कला विशेष की है। आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। चुनौतियां संघर्ष करना सिखाती हैं, मांजती हैं। मैं कथक की अपने प्रारंभिक शिक्षा के साथ कथक केेंद्र में जब आई तो मानों लगा कि कथक का ककहरा अभी मुझसे कोसों दूर है। मैं रूप-रंग में सामान्य कद-काठी की थी। किंतु सांवले रूप और इस विश्वास के साथ कक्षाएं कर रही थी कि मैं एक दिन इस कथक मंदिर में रेखांकित की जाने वाली शिष्या बनूंगी।

कथक नृत्य के संदर्भ में आप क्या सोचती हैं?

श्रुति सिन्हा-उŸार भारत में इस प्रमुख लोकनृत्य की विकास यात्रा क्रमशः आगे बढ़ने लगी। सौ-सौ से अधिक घंुघरूओं को पैरों में बंाधकर तालबद्ध, पदचाप, विहंगम चक्कर लेते हुए, यह परसियन और मुस्लिम प्रभाव से मंदिर की रीति से दरबारी मनोरंजन तक पहंुच गई। उŸार भारत में मुगल शासकों को शाही दरबार में पहुंच कर इसे संरक्षण तो प्राप्त हुआ। किंतु अब इसका स्वरूप शनैः-शनैः परिवर्तित होने लगा। इस नृत्य में धर्म की अपेक्षा सौंदर्य बोध पर अधिक बल दिया जाने लगा। यह वह वक्त था जब कथक मंदिरों से निकलकर दरबार के मनोरंजन और रसास्वादन का पर्याय बन गई, तब कथक को अपने मौलिक रूप को बचाने के लिए चुनौती का सामने आने लगी।
इस राष्ट्रीय धरोहर की अस्मिता और देवदासी परंपरा की पुर्नप्रतिष्ठा हेतु प्रथम महिला उत्थान हेतु सामाजिक कार्यकर्ता और विधायक डाॅ मुथुलक्ष्मी रेड्डी ने ‘एंटी नाच कैम्पेन‘ चलाया, जिससे कथक और देवदासी धीरे-धीरे अपनी प्रतिष्ठा और अस्तित्व की ओर लौटने लगी। चुनौती आज भी है। आजादी के पच्चहŸारवें साल में कथक अपनी विकास यात्रा में कथक केंद्र, अनेक संस्थाओं, विद्यालयों, गुरूओं, साधकों, कलाकारों, रसिकों और सुधिजनों को समेटे हुए है। किंतु, कच्ची मिट्टी का संघर्ष से तपकर निकलना और परिपक्व घड़ा बनकर, कथक परंपरा की आधार शिला को और मजबूत बनाने की प्रक्रिया आज के युग में कठिन से कठिन होती जा रही है।

एक कलाकार के तौर पर आप किस तरह की चुनौती को महसूस करती हैं?

श्रुति सिन्हा-गुरू शिष्य परंपरा का आत्म बोधन मेरे भीतर प्रारंभ से ही था। मैं एकनिष्ठ भाव से अनवरत कथक सीखने की ओर बढ़ रही थी। चुनौतियां अभी और भी थीं, खुद को स्थापित करने की। पहले कलाकार को कला सीखने की चुनौती, फिर कला को हस्तांतरिक करने या उसके विकास में स्व योगदान की चुनौती। मेरी दृष्टि से कला किसी जाति, वर्ग, धर्म, संप्रदाय या उम्र का मोहताज नहीं। किंतु, यह भी सत्य है कि कला के विकास में द्रव्य विशेष का विशेष महत्व है। संसाधनों के बिना साधना कैसी और साधना के बिना साध्य कैसा? द्रव्य के बिना कला अपने अलौकिक रूप में अवश्य जीवित रह सकती है। उसके लौकिक रूप में विकास के लिए धन की आवश्यकता होती है। और उतनी ही आवश्यकता कलाकार को भी होती है। मेरी कथक सीखने और सीखाने की प्रक्रिया समानांतर चल रही थी।
मेरा मत है कि कलाकार बचेगा तो ही कला बचेगी। इस संरक्षण या बचाव के लिए सभी का सामाजिक दायित्व है कि भरतीय संस्कृति की इस लोकप्रिय नृत्य कला कथक को अधिक से अधिक महत्व और मान दें। हमारा दायित्व है कि हम कथक अथव किसी भी कला का उत्साहवर्द्धन या प्रेरणा हेतु भौतिक रूप से भी कलाकारों का स्तर ऊंचा उठाएं, जो कला के साथ विकास करे। इसके लिए भारतीय शिक्षा नीति के तहत जिस प्रकार भाषा साहित्य को एक-दूसरे प्रदेशों में द्वितीय भाषा के रूप में अध्ययन की छूट होती है, उसी प्रकार प्रारंभिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की शिक्षा में नृत्य या संगीत कला के विनिमय ज्ञानवर्द्धन की नीति लागू करनी चाहिए। इससे संपूर्ण भारतीय नृत्य संस्कृति और समृद्ध होती जाएगी। नई पीढ़ी इस नृत्य कला से अवगत होगी। उनकी रूचि बढ़ेगी, साधना और फिर उस दिशा में नृत्य कला व्यवसाय के रूप में एक नई सोच विकसित होगी।

आप युवाओं को शास्त्रीय कला के प्रति कैसे जोड़ना चाहेंगी?

श्रुति सिन्हा-यह सच है कि आज व्यस्त जीवन में माता-पिता बच्चों को फटाफट प्रसिद्धि की ओर धकेलना चाहते हैं। चमक-दमक और मृग मरिचिका डांस शो में बच्चों को अधकचरे ज्ञान के साथ भेजते हैं। ऐसे बच्चे तात्कालिक लोकप्रियता से मोटी कमाई तो अवश्य कर लेते हैं। लेकिन, बच्चे के भविष्य और कला के साथ खिलवाड़ करते हैं। यह बात महत्वपूर्ण है कि यंत्रवत जीवन की आपाधापी मंे कथक जैसा शास्त्रीय नृत्य शारीरिक एवं मानसिक चुनौतियों को शांत करती है। नृत्य उपचार पद्धति में योग के संयोग के साथ कथक सहायक होती है। अभिभावकों को यह समझना आवश्यक है कि अंग्रेजी के डांस का पर्याय शास्त्रीय नृत्य कदापि नहीं बन सकती। रायगढ़ के महाराज चक्रधर सिंह ने कहा है-‘भावहीन होकर नृत्य एक मशीनी हरकत की तरह न रह जाए। नृत्य सिर्फ अंग संचालन है तो अपना अस्तित्व खो बैठेगा‘।