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Friday, November 29, 2024

#आज के कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी -----बनारस घराने की कथक नृत्य की एक शाम

                                        #आज के कलाकार@ शशिप्रभा तिवारी

                                          बनारस घराने की कथक नृत्य की एक शाम

नटवरी कथक फाउंडेशन की ओर से रस रंग सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। त्रिवेणी सभागार में आयोजित सांस्कृतिक संध्या में कथक नृत्यांगना अरूणा स्वामी ने बनारस घराने की नृत्य शैली में पेश किया। संतूर वादक डाॅ बिपुल कुमार ने वादन पेश किया। 24 नवंबर को संपन्न समारोह के साक्षी के तौर पर कथक नृत्यांगना नलिनी अस्थाना, लेखिका डाॅ चित्रा शर्मा, सितार वादक सईद जफर, शहनाई वादक लोकेश आनंद और अन्य कलाकार भी सभागार में मौजूद थे। कलाकारों को देखने-सुनने जब कलाकार वर्ग खुद उपस्थित होते हैं, तो सभा का माहौल और उत्साहवर्धक हो जाता है।   

त्रिवेणी सभागार में आयोजित समारोह में कथक नृत्यांगना अरूणा स्वामी ने संतुलित और सुघड़ता से कथक नृत्य पेश किया। उनके नृत्य में स्थिरता और परिपक्वता दिखा। वह गुरु सुनयना हजारीलाल की शिष्या है। उन्होंने निशा झावेरी से भी कथक की बारीकियों को ग्रहण किया है। वह अपने गुरु के साथ मंच प्रस्तुति देने के अलावा, अमेरिका, हांगकांग और ताइवान में नृत्य प्रस्तुत कर चुकी हैं। वह इनदिनों गुरुग्राम में कथक की नटवरी शैली को युवा कलाकारों को अपनी संस्था के माध्यम से सिखा रही हैं। 

पढंत पर उनकी गुरु सुनयना हजारीलाल मौजूद थे। गुरु की उपस्थिति से शिष्या का मनोबल ऊंचा होना स्वाभाविक है। सुनयना हजारीलाल खुद एक गुणी कलाकार हैं। उनके साथ तबले पर बाबर लतीफ, गायन पर सोहैब हसन और सितार पर रईस अहमद मौजूद थे। उन्होंने बीती शाम त्रिवेणी सभागार में गणेश वंदना से नृत्य आरंभ किया। नृŸा और भाव पक्ष को पेश किया। तराना भी उनके नृत्य का आकर्षण रहा। 


रस रंग समारोह में कथक नृत्यांगना अरूणा ने कृष्ण वंदना पेश किया। यह श्रीकृष्णाष्टकम के अंश-‘भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं‘ पर आधारित थी। यह आदिशंकराचार्य की रचना है। इसमें यमुना और कृष्ण जन्म के प्रसंग को बहुत मधुरता के साथ दर्शाया। बारिश के अंदाज को हस्तकों और पद घात से निरूपित किया। नृŸा पक्ष में गुरु जानकी प्रसाद की शैली को अरूणा ने प्रभावी तरीके से पेश किया। उनके नृत्य ठहराव के साथ नैसर्गिकता है, जो कथक नृत्यांगनाओं में कम देखने को मिलता है। उन्होंने इस अंश में ‘ता थेई तत्‘ के बोल पर लयकारी पेश किया। विलंबित लय में त्रिपल्ली, टुकड़े, परमेलू आदि पेश किया। मिश्र जाति की लड़ी में पैर का जानदार काम दिखा। वहीं, द्रुत तीन ताल में चतुश्र जाति की तिहाइयों और रेले की पेशकश खास रही। उन्होंने भाव अभिनय के लिए होरी का चयन किया था। इसके बोल थे-‘मानो मानो श्यम नंदलाल जी‘। अरूणा ने हस्तकों, पैर के काम, गतों, पलटे, चक्कर का प्रयोग बहुत सधे अंदाज में किया। नायिका राधा और नायक कृष्ण के भावों को दर्शाते हुए, उनके मुख के भावों और नेत्रों के भावों में बहुत सरलता और सहजता दिखी। उन्होंने अपने नृत्य का समापन तराने पर आधारित नृत्य से किया। यह राग वृंदावनी सारंग में निबद्ध था। 

युवा संतूर वादक डाॅ बिपुल कुमार राय ने समारोह में शिरकत है। डाॅ बिपुल ने संतूर वादन की शिक्षा सूफियाना घराने के संतूर वादक पद्मश्री पंडित भजन सोपोरी से प्राप्त की है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से मास्टर्स, एमफिल एवं पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है। वह आकाशवाणी के ए-ग्रेड के कलाकार हैं। वह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के प्रतिष्ठित श्रेणी में है। वह साहित्य कला परिषद, दिल्ली सरकार के सांस्कृतिक सलाहकार एवं केंद्रीय विद्यालय गवर्निंग बाॅडी के सदस्य के रूप में अपनी सेवा प्रदान करते रहे हैं। उन्होंने मिश्र, आॅस्ट्रिªया, स्वीटजरलैंड, जर्मनी, कतर, चीन, थाईलैंड, श्रीलंका आदि देशों में संतूर वादन की प्रस्तुतियंा दी हैं। वह तानसेन समारोह, आकाशवाणी संगीत सम्मेलन, कला प्रकाश, संगीत नाटक अकादमी समारोह, सप्तक, संगीत विहान आदि समारोहों में शिरकत कर चुके हैं। पिछले साल संपन्न जी-20 के आयोजन में भी विदेशी मेहमानों के समक्ष उन्हें अन्य कलाकारों के साथ संतूर वादन का सौभाग्य मिला। 

संतूर वादक बिपुल राय ने मारवा थाट का राग मारवा बजाया। राग मारवा माधुर्य से परिपूर्ण राग है। सो वादक बिपुल ने राग की प्रकृति के अनुरूप आलाप में कोमल ऋषभ और तीव्र मध्यम स्वरों पर ठहराव रखते हुुए वादन किया। राग का विस्तार मध्य सप्तक में खिल उठा। उन्होंने मध्य और द्रुत लय की गतों को पेश करते हुए, जोड़-झाले को बजाया। अपने वादन के चरम पर ‘ना-धिंन्ना‘ को मोहक अंदाज में बजाया। उन्होंने अपने वादन का समापन राग पहाड़ी के धुन से किया। इसमें गढ़वाली लोकधुन की झलक मोहक अंदाज में पेश किया। उनके साथ तबले पर युवा तबला वादक बाबर लतिफ ने दिया। दोनों कलाकारों ने अच्छे तालमेल से वादन को सरस बना दिया। 









Sunday, October 20, 2024

shashiprabha: #आज के कलाकार/अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव--...

shashiprabha: #आज के कलाकार/अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव--...:    #आज के कलाकार अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव-- महती आयोजन @ शशिप्रभा तिवारी राजधानी दिल्ली में पिछले सोलह अक्टू...

#आज के कलाकार/अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव--महती आयोजन @ शशिप्रभा तिवारी

  


#आज के कलाकार

अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव--महती आयोजन @ शशिप्रभा तिवारी

राजधानी दिल्ली में पिछले सोलह अक्टूबर से धूम मची हुई है. यह मौका- अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव है . इसमें देश के अलग अलग प्रान्तों से कलाकार आये हुए हैं. एक तरफ चर्चाओं का जोर है दूसरी तरफ कमानी सभागार में हर शाम कलाकर नृत्य पेश कर रहे है. वहीँ लोक कलाकार अपनी लोकसंगीत से समां बांध रहें हैं. संगीत नाटक अकादमी की लगभग सात दशक की यात्रा को फोटो के माध्यम से ललित कला अकादमी के कला दीर्घा में प्रदर्शित किया गया है .

अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव का आयोजन संगीत नाटक अकादमी की ओर से आयोजित किया गया। यह समारोह राजधानी दिल्ली में 16अक्तूबर को शुरू हुआ। एपीजे शिंदे सभागार में समारोह का उद्घाटन केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत के उद्धबोधन से हुआ। उन्होंने कहा कि अतीत में भारत की संस्कृति और सनातन परंपरा को मिटाने के प्रयास किए गए लेकिन हमारी संस्कृति लगातार शाश्वत बनी हुई है। भारत गंगा और गीता तथा समृद्ध संस्कृति और लोक परंपराओं का देश है। शास्त्रीय और लोक नृत्य अविश्वसनीय है और संस्कृति को कई आयाम प्रदान करते हैं।














असम राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने अपने संबोधन में 18अक्तूबर की संध्या को कमानी सभागार में कहा कि हमारी पहचान हमारी सांस्कृतिक इतिहास है। इन्हें संजोकर रखना चाहिए। यह आयोजन ऐतिहासिक महत्व का है। इसके अंतर्गत वैश्विक सांस्कृतिक संवाद अतीत, वर्तमान और भविष्य के संदर्भ में हो रहा है।

अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव के दौरान सांस्कृतिक संध्या का आयोजन कमानी सभागार में किया गया। इसका आरंभ नृत्य नाटिका मीरा से हुआ। यह डॉ सोनल मानसिंह की परिकल्पना थी। भक्ति काल की कवयित्री मीरा के जीवन चरित्र को संक्षिप्त तौर पर पेश किया। नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने मीरा बाई के पदों को गाते हुए, भावों को दर्शाया।

इसे प्रस्तुत करने के लिए मीरा बाई की रचनाओं का चयन किया गया था। इनमें शामिल रचनाएं थीं- म्हारी घूमर नखराली सा,मोरे तो गिरिधर गोपाल ,एरी मैं तो प्रेम दीवानी ,हरि तुम हरो जन की भीर, पग घुंघरू बांध मीरा नाची रे, मणे चाकर राखो जी आदि। इस प्रस्तुति में द्रौपदी, प्रहलाद, गजराज की कथा को दर्शाया गया। कृष्ण मथुरा से द्वारका चले गए थे। मीरा बाई भी वृंदावन से द्वारका चली जाती हैं। कुछ समय बाद चितौड़ के महाराणा के दूत मीरा से क्षमा मांगने जाते हैं। मीरा द्वारकाधीश मंदिर में अनुमति के लिए अंदर चली गईं। फिर नहीं लौटीं। इसे गीत -अतर माही अवता न जाता मारग के जरिए दिखाया गया। द्वारकाधीश ने अपने आप में समा लिया था।पहली संध्या की दूसरी पेशकश कथकली नृत्य प्रस्तुति थी। महोत्सव की द्वितीय प्रस्तुति केरल कलामंडलम की प्रस्तुति गीतोपदेशम थी।









महोत्सव की दूसरी संध्या 17अक्तूबर को ममता शंकर और साथी कलाकारों ने नृत्य रचना प्रकृति पेश किया। आधुनिक समकालीन नृत्य शैली में प्रकृति के विविध पक्षों को चित्रित किया। हिरण्यागर्भा धरती के अनंत क्षमता का प्रदर्शन प्रभावकारी था। दूसरी पेशकश कुचिपुड़ी नृत्य थी। कलाकार थीं -शांता रत्ती। नृत्यांगना शांता ने तरंगम पेश किया। यह महाराजा स्वाति तिरुनाल की रचना -नाच रही गोपी पर आधारित थी। यह राग धनाश्री और आदि ताल में निबद्ध था। नटुवंगम और मृदंगम के विभिन्न ताल आवर्तन पर मोहक अंग संचालन और पद संचालन पेश किया।

तीसरी प्रस्तुति इंडोनेशिया के कलाकारों की थी । तक्शु आर्ट के कलाकारों ने रामायण के आख्यान को पेश किया। यह संस्था 1990से रामायण और इंडोनेशिया के लोकजीवन को पेश करती रही है। तक्शु आर्ट के कलाकारों ने सीता हरण, जटायु वध, राम रावण युद्ध के प्रसंग का निरुपण किया।
महोत्सव की तीसरी संध्या 18 अक्तूबर में किर्गिस्तान के जिल्दी समूह के कलाकारों ने लोकनृत्य पेश किया। उनकी प्रस्तुति में भारतीय कलाकारों के साथ संयुक्त रूप से भाग लिया। अगली प्रस्तुति मोहिनीअट्टम नृत्य थी। इसे सुनंदा नायर ने पेश किया। उन्होंने राम और शबरी के संवाद को नृत्य में पिरोया। यह रचना -चक्रवाक शबरी पात्र राग मालिका और ताल मालिका पर आधारित थी। उन्होंने सुंदर अभिनय पेश किया। महारास को मणिपुर नृत्यांगनाओं ने पेश किया। इसे जेएनएमडीए के कलाकारों ने पेश किया।
                                                     

अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य महोत्सव की चौथी संध्या19अक्तूबर में कत्थक नृत्य पेश किया। इसे अर्चना जोगलेकर और उनकी शिष्य-शिष्याओं ने पेश किया। उनकी शिष्याओं ने अपने नृत्य का आरंभ नटराज स्तुति से किया। यह पूनम व्यास की रचना ‘जयदेव नटराज कीजिए कृपा आज‘ से किया। इसकी संगीत रचना श्रीधर फड़के ने की थी। इसमें गंगावतरण, समुद्र मंथन और त्रिपुरासुर वध के दृश्य को पेश किया गया। कथक की तिहाइयों, टुकड़े और भाव का सुंदर समावेश था। दूसरी प्रस्तुति गत निकास थी। इसमें सात्विक भाव, मुद्रा और गत भाव के जरिए रूपगर्विता व शंखिनी नायिका के भावों को दर्शाया गया। साथ ही शठ नायक के भाव को पेश किया गया। उनकी अगली पेशकश आसुय था। इसमें दो कलाकारों के अलग-अलग भावों को दर्शाया गया। एक कलाकार असंतुष्ट और इष्र्यालु है, वहीं दूसरा संतुष्ट, सरल है, वह अपनी कला को पूजा और जीवन मानता है। उनके आपसी भावों को शिष्य देखता है। यह रचना ‘सुर सजे संगिनी‘ पर आधारित थी। इसका संगीत शंकर महादेवन ने तैयार किया था। इसे सुर में गायक राहुल देशपांडे और मनीष काले ने पिरोया था।

अगली पेशकश लोकछंद कल्चरल यूनिट के कलाकारों की थी। मैत्रेयी पहाड़ी की नृत्य रचना सर्वेशम भारतम् कई भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों का संयोजन था। यह पंडित विनय चंद्र मुद्गल की रचना पर आधारित था। यह राग जयजयवंती में पिरोई गई थी। महोत्सव की चौथी थी संध्या का समापन कलाक्षेत्र के कलाकारों की प्रस्तुति से हुआ। भरतनाट्यम नृत्य शैली में कलाकारों ने सीता स्वयंवर प्रसंग को पेश किया। उनकी प्रस्तुति मोहक और प्रभावकारी थी। समारोह के दौरान देवभूमि लोक कला सोसाइटी, बनवारी लाल और साथी, वेदप्रकाश और साथी, प्रीतम सिंह और साथी कलाकारों ने उतराखंड, राजस्थान और हरियाणा की लोक संगीत को पेश किया.


Sunday, September 22, 2024

shashiprabha: #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी @मेरा नृत्य -वाशिम राजा

shashiprabha: #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी @मेरा नृत्य -वाशिम राजा:                                      #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी                                           @मेरा नृत्य गुरु की कृपा है-वाश...

#आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी @मेरा नृत्य -वाशिम राजा

                                    #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी 

                                         @मेरा नृत्य गुरु की कृपा है-वाशिम राजा

आज के युवाओं प्रतिभा की बहुमुखी है। वह सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव नजर आते हैं। एक ओर कुछ युवा उसका सदुपयोग कर अपना करियर को बना रहे हैं, तो दूसरी ओर लाॅ के क्षेत्र में बहुत से युवा करियर बनाते हुए, नजर आ रहे हैं। इसके इतर एक ऐसा युवक वाशिम राजा हैं, जो इन दिनों शास्त्रीय नृत्य जगत में अपने नृत्य को लेकर बराबर चर्चा में बने हुए हैं। 

पिछले दो वर्ष से वह लगातार विभिन्न मंचों पर कभी सामूहिक, कभी युगल तो कभी एकल नृत्य प्रस्तुत कर रहे हैं। कुचिपुडी नर्तक वाशिम राजा ने बचपन में नृत्य सीखना शुरू किया था। तब वह भरतनाट्यम और गौड़िया नृत्य सीखते थे। साथ ही लाॅ की पढ़ाई पूरी करके, बतौर लाॅ प्रोफेशनल प्रैक्टिस कर रहे थे। वर्ष 2018 में वह कुचिपुडी नृत्य गुरु वनश्री राव के संपर्क में आए और कुचिपुडी नृत्य सीखना शुरू किया। इसमें वह ऐसे रम गए कि उन्होंने लाॅ प्रैक्टिस छोड़ दिया और पूरी तरह प्रोफेशनल डांसर बनना तय कर लिया। 

बहरहाल, हाल ही में उन्हें राजगोपाल बेस्ट मेल सोलोइस्ट अवार्ड की घोषणा की गई है। यह सम्मान उन्हें तीस नवंबर को आशीष मोहन खोकर के एटेंडेंट डांस एन्वल अवार्ड 2024 में प्रदान किया जाएगा। इस अवसर पर उनकी गुरु को रूक्मिणी देवी ओवर आॅल कंट्रीबुशन अवार्ड दिया जाएगा। यह समारोह बंग्लौर में आयोजित होना है। इस सम्मान के अलावा, उन्हें युवा नृत्य रत्न प्रभास सम्मान और भी कई अवार्ड मिले। पर सबसे बड़ी बात कि संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष डाॅ संध्या पुरेचा ने उनके ऊर्जापूर्ण नृत्य देखकर इतनी प्रभावित हुईं कि उन्हें ‘महादेव-महेहश्वर‘ के नाम से पुकारती हैं। वाशिम पिछले कुछ महीने से लगातार दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, बड़ौदा, चेन्नै आदि शहरों में नृत्य पेश कर रहे हैं। अभी कुछ दिनों पूर्व वह तिजारा किले के महल-नीमराना में अपनी गुरु वनश्री राव के साथ नृत्य प्रस्तुत किया। इस समारोह में उन्होंने जगदोद्धारण, कालिया नर्तनम, देव देवम ओर तिल्लाना आदि नृत्य रचनाओं को पेश किया। वहां उन्हें देखने के लिए संस्कृति विद् और लेखक डाॅ आशीष खोकर भी पहुंचे। इसे वह अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं।






शास्त्रीय नृत्य कैसे सीखना शुरु किया?

कुचिपुडी नर्तक वाशिम राजा-मेरी मां को शास्त्रीय नृत्य में दिलचस्पी थी। इसलिए उन्होंने मुझे इस ओर प्रेरित किया। मुझे शास्त्रीय नृत्य के प्रति बचपन से ही आकर्षण था। मेरी मां ने मुझे प्रेरित किया। एक शाम मैं वनश्री राव मैडम का कुचिपुडी नृत्य देखा। उस शाम मैंने मन ही मन तय किया कि मैडम से कुचिपुडी नृत्य सीखना है। कार्यक्रम के बाद मैं उनसे मिला और उनसे अपने मन के बात को कहा कि मैं आपसे नृत्य सीखना चाहता हूं। शायद, वह शाम मेरे लिए एक नई शुरुआत थी।

 मैडम ने अपने घर पर आकर मिलने को कहा। उनके नृत्य की क्वालिटी और सिखाने का अंदाज अनूठा है। वह अपने शिष्य-शिष्याओं को ज्यादा से ज्यादा देना चाहती हैं। अब यह हमारी क्षमता और विवेक है कि हम उनसे कितना ले पाते हैं। वह डांस के साथ-साथ जिस रचना पर हम नृत्य करते हैं, उसके एक-एक शब्द की व्याख्या, एक-एक भाव के संदर्भ को वह बताती हैं। वह हमें आर्थिक, मानसिक, भावनात्मक आदि सभी स्तरों पर सहयोग करने को तैयार रहती हैं। 

अपने यादगार परफाॅर्मेंस के बारे में बताईए।

वाशिम राजा-पिछले वर्ष मैं गुरु जी के साथ कलाक्षेत्र गया था। वहां मुझे गुरु जी के साथ जगदोद्धारण करने का मौका मिला। गुरु वनश्री राव यशोदा और मैं कृष्ण की भूमिका में नृत्य किया। उस रोज भी मैं नृत्य करते हुए, बहुत भावुक हो गया था। यह सोचकर और भी दंग था कि ईश्वर की कैसी लीला है कि मुझे गुरु जी के साथ नृत्य करने का अवसर मिला। 

इस वर्ष मार्च में, गणेश नाट्यालय में पुरुष नर्तकों का एक उत्सव हुआ था। इस उत्सव में मुझे एकल नृत्य करने का अवसर मिला। इस उत्सव में अनेक समीक्षकों ने मेरे नृत्य को बहुत सराहा। इसके बाद, मैंने तय किया कि अब सिर्फ नृत्य की साधना करूंगा। और मैंने लाॅ की नौकरी छोड़ने का फैसला किया। फिलहाल, पूरी तरह डांस में हूं। गुरु जी कहती हैं, एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए। इसलिए मैं अब आपलोगों के सामने उपस्थित हूं। बाकी सब ईश्वर की मर्जी और किस्मत जिधर ले जाए। हमें उसी ओर ही चल देना है। 





Saturday, September 21, 2024

shashiprabha: #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी. मेरे घराने में संगी...

shashiprabha: #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी. मेरे घराने में संगी...:   #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी                                                     मेरे घराने में संगीत की धारा                            ...

#आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी. मेरे घराने में संगीत की धारा@उस्ताद गुलाम सिराज, रामपुर सहसवान घराने के शास्त्रीय गायक

 #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी

                                                    मेरे घराने में संगीत की धारा                   

                           @उस्ताद गुलाम सिराज, रामपुर सहसवान घराने के शास्त्रीय गायक 

रामपुर सहसवान घराने के कई कलाकारों ने अपने संगीत से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को समृद्ध किया है। उस्ताद मुश्ताक हुसैन साहब ऐसे ही कलाकार थे। उनके गायकी के लिए उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। उनकी स्मृति को गायक उस्ताद गुलाम सिराज ने संजोने का प्रयास किया है। उनकी यादों को बनाए रखने के उद्देश्य से पद्मभूषण उस्ताद मुश्ताक हुसैन खां एसोसिएशन यानी पीयूएमएचकेए की स्थापना गायक गुलाम सिराज ने की है। हर साल हांगकांग और अन्य देशों में शास्त्रीय संगीत समारोह का आयोजन पिछले दस साल से कर रहे हैं। उनके आयोजनों में पंडित राजन साजन मिश्र, पंडित शिव कुमार शर्मा, उस्ताद गुलाम मुस्तफा खां, उस्ताद जाकिर हुसैन खां जैसे दिग्गज कलाकारों ने शिरकत किया है। 

इस वर्ष भी जून में उन्होंने हांगकांग में समारोह का आयोजन किया। इसमें तबला वाद उस्ताद जाकिर हुसैन खां और सारंगी वादक साबिर खां ने समारोह में भाग लिया। साथ ही, उस्ताद गुलाम सिराज ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन पेश किया। उन्होंने इस कार्यक्रम में राग विहाग गाया था। इस अंक में उन्हीं से बातचीत के अंश-


अपनी संगीत यात्रा के संदर्भ मंे आप क्या कहना चाहेंगें?

उस्ताद गुलाम सिराज-हमारा परिवार खुशनसीब है। हमारे घर में पिछले कई पीढ़ियों से मां सरस्वती की कृपा बनी हुई है। लगभग तीन सौ साल से संगीत की परंपरा चली आ रही है। मेरे पिताजी उस्ताद गुलाम हुसैन खां और दादा जी उस्ताद मुश्ताक हुसैन खां दोनों अच्छे गायक थे। दादा जी घराने के पहले गायक थे, जिन्हें पहला पद्मभूषण और संगीत नाटक अकादमी सम्मान दोनों मिला था। हम अपने बुजुर्गों के शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने हमें संगीत की विरासत में दी है। हम भी एक दफा खाना खाए बगैर रह सकते हैं, पर रियाज में नागा नहीं कर सकते। 

संगीत को विदेश में रह कर कैसे अपनाया?

उस्ताद गुलाम सिराज-पिछले पच्चीस वर्षों से मैं मध्य एशिया के देशों में शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार से जुड़ा हुआ हूं। अपनी दादा जीं के नाम से संस्था पीयूएमएचकेए के माध्यम से रामपुरा सहसवान घराने की गायकी विदेशों में सीखा रहा हूं। मेरा मन है कि बहुत से युवा इस संगीत को सीखें, अपनाएं। लेकिन, मेरी एक सीमा है। वैसे मैं चाहता हूं कि भारत में भी जो सच में संगीत सीखना चाहते हैं, उन्हें संगीत से जोड़ूं। 

क्या शास्त्रीय संगीत सीखना आसान है?

उस्ताद गुलाम सिराज-वास्तव में, संगीत को किसी को सीखाया नहीं जा सकता। यह कुछ तो घर के माहौल, परिवार के लोगों के व्यवहार और पूर्व जन्म की कृपा से संभव होता है। हमारी तो आंख खुलती ही थी, पिता जी के षड़ज साधना के स्वर और तानपुरे की धुन सुनकर। वह सुबह-सुबह जब गाते थे-धन धन सूरत कृष्ण मुरारी, इसे सुनकर हमारा दिन बन जाता था। मुझे लगता है कि उन्हीं सुरों के बीज हमारे कान में समा गए थे, सो हमें पता ही नहीें चला कि कब हम संगीत के इतने करीब आ गए। 

आपने किस उम्र में गायन सीखना शुरू किया?

उस्ताद गुलाम सिराज-मेरी औपचारिक तालीम नौ साल की उम्र में शुरू हुई थी। मुझे याद आता है कि उस्ताद जफर हुसैन खां का प्रोग्राम था। मैं उनके साथ तानपुरे पर संगत कर रहा था। उन्होंने अपने साथ सुर लगाने को कहा, उसका पता नहीं मेरे मानस पर क्या असर हुआ कि मैंने तय कर लिया कि अब संगीत ही सीखना है और परफाॅर्मर बनना है। मैं खुद मंच प्रस्तुति देता हूं और युवा कलाकारों को भी प्रोत्साहित करता हूं। 

खुदा का शुक्र है कि हमारे घर में अगली पीढ़ी भी संगीत को अपना रही है। मेरा बेटा और बेटी दोनों गाते हैं और म्यूजिक कंपोज भी करते हैं। दरअसल, घर के माहौल के कारण बच्चों की आधी तालीम तो सुनकर हो जाती है। 

विदेश में भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति लोगों का रूख कैसा है?

उस्ताद गुलाम सिराज-जब मैं बीस-पच्चीस साल पहले आया था, तब हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में बहुत कम लोग सुनने आते थे। धीरे-धीेरे लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। अब तो हजार दो हजार लोग सुनने आते हैं। अब बीस बच्चे मुझसे संगीत सीखने आते हैं। वो भजन और गजल भी गाना चाहते हैं। कुछ बच्चे हारमोनियम, तबला, सितार भी सीखने के इच्छुक हैं। उन्हें संगीत की बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है। पर उनको समझाने की कोशिश करता हूं। उनके उच्चारण को ठीक करने की कोशिश करता हूं।

संगीत का प्रभाव कैसा महसूस करते हैं?

उस्ताद गुलाम सिराज-आज कल फिल्मों में भी मशीनों या कहूं कि आॅक्टोपैड जैसे वाद्यों से अलग-अलग वाद्यों की धुनें प्रयोग की जा रहीं हैं। सितार, वायलिन, सारंगी, पखावज जैसे वाद्यों का प्रयोग नहीं किया जाता है। इससे रूहानियत नहीं आती है। मशीनों की वह वजह से वह रस या भाव जगता ही नहीं कि इस संगीत से रूह ताजा हो जाए। नए गानें बहुत जल्दी हमलोग भूल जाते हैं, पर सत्तर या अस्सी की दशक के फिल्मों के गाने आज भी हमें याद है।