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Wednesday, July 26, 2023

रंग और नृत्य के जरिए राम का चित्रण -शशिप्रभा तिवारी

                                                           रंग और नृत्य के जरिए राम का चित्रण  

                                                            -शशिप्रभा तिवारी

ऊषा आरके का नाम कला जगत में काफी लोकप्रिय है। इनदिनों ऊषा जी माॅस्को में भारतीय दूतावास के जवाहरलाल नेहरू संस्कृति केंद्र में बतौर निदेशक कार्यरत हैं। वह संस्कृति मंत्रालय में भी दायित्व निभा चुकी हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान यूनेस्को से योग, कुंभ मेला, वाराणसी व चेन्नैई को सृजनात्मक नगर आदि परियोजना को मान्यता दिलाने में सफल रहीं। उन्हें शास्त्रीय संगीत और नृत्य जगत के अनेक कलाकारों के साथ कार्य करने के अवसर मिले हैं। इनदिनों वह देहरादून में रहकर सांस्कृतिक और कला परिदृश्य को नए आयाम से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। 


वैसे तो देखा जाए तो भरतनाट्यम और सुलेख या कैलिग्राफी में कोई रिश्ता नहीं है। लेकिन, भारतीय परिदृश्य में मान्यता है कि सोलह कलाएं आपस में किसी न किसी रूप में जुड़ी हुई हैं। इस जुड़ाव का अहसास पिछले दिनों कार्यक्रम रामचित्र कथा में देखने को मिला। इसका आयोजन संस्कार भारती, संस्कृतिकर्मी ऊषा आर के और ओलंपस स्कूल ने किया। इस समारोह का आयोजन प्रांगण में दो सभाओं में किया गया। पहली सभा में सुलेख कलाकार परमेश्वर राजू ने कैलीग्राफी के जरिए मर्यादा पुरूषोत्तम राम की कथा का चित्रण पेश किया। वहीं सायंकालीन सभा में सत्यनारायण राजू ने भरतनाट्यम राम कथा नृत्य पेश किया। 


भरतनाट्यम नर्तक सत्यनारायण राजू ने नृत्य की शिक्षा कई गुरुओं से प्राप्त की है। इनमें गुरू नर्मदा, गुरु सुभद्रा प्रभु, डाॅ माया राव और चित्रा वेणूगोपाल हैं। उनके नृत्य में गजब की परिपक्वता और ठहराव है, जो उनकी नृत्य साधना को इंगित करती है। इस समारोह में उन्होंने अपने आंगिक भाव-भंगिमा और अभिनय के जरिए राम के चरित्र को प्रभावकारी और आकर्षक अंदाज में पेश किया। उनकी प्रस्तुति में भक्ति, करूण, वात्सल्य, रौद्र रस का सुंदर समागम था। उन्होंने अपने नृत्य में प्रत्येक प्रसंग के पात्रों को बहुत ही संजीदगी, चपलता और परिपक्वता से निरूपित किया। शुरूआत में राम स्तुति ‘मेलि को रामा सीता‘ में राम के राजराजेश्वर रूप का निरूपण था। वहीं, तुलसीदास रचित भजन ‘ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैजनिया‘ के जरिए सत्यनारायण राजू ने कौशल्य के वात्सल्य भावों को दर्शाया। जबकि, अगले अंश में नर्तक सत्यनारायण राजू ने अहिल्या उद्धार, सीता स्वयंबर, राम वनगमन, कैकेई दशरथ संवाद आदि प्रसंगों को चित्रित किया। उन्होंने रचना ‘पट्टाभिषेक वेललो सीताराम‘ के जरिए अलग-अलग पात्रों का त्वरित निरूपण बहुत प्रभावपूर्ण तरीके से किया। एक ओर मंथरा के भावों को अभिनीत किया वहीं, दूसरी ओर दशरथ के मनोभावों को आंखों के जरिए दर्शाना लासानी था। 



उन्होंने केवट प्रसंग के चित्रण को पेश किया। इसके लिए रचना ‘भजुमन रामचरण सुखदाई‘ का चयन किया गया। अगले अंश में सीता हरण और जटायु प्रसंग को पेश किया गया। रचना ‘महावीरा संपाती सोधरा दशरथ मित्राः‘ के जरिए इस प्रसंग को दर्शाया। इस प्रस्तुति में संगीत बहुत प्रभावकारी था। राम भक्त शबरी के भावों का प्रदर्शन बहुत प्रभावकारी था। रचना ‘शबरी दांतुल वरकांतुल जगमंत्र‘ के जरिए शबरी और राम के भावों को प्रदर्शित किया। इस प्रस्तुति में प्रकाश प्रभाव का प्रयोग बहुत संुदर था और नर्तक सत्यनारायण का अभिनय भी बहुत मार्मिक था। उन्होंने रचना ‘हनुमंत देव नमो‘ में हनुमान के भावों को प्रदर्शित किया। इसके बाद लंका विजय के दृश्यों को दर्शाया। सत्यनारायण राजू ने अपनी प्रस्तुति का समापन तिल्लाना से किया। 

इस आयोजन के दौरान  उत्तराख्ंड  के शहरी विकास मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल, विधायक सविता कपूर, चित्रकार कोइली, बलदेव पराशर, कुलदीप कुमार, सुबोध कुमार, ललित अकादमी के पूर्व सचिव सुधाकर शर्मा, सामाजिक  कार्यकर्ता अनुराग चैहान, संस्कार भारती के महानगर अध्यक्ष तनवीर सिंह और कोषाध्यक्ष् प्रेरणा गोयलकी उपस्थिति महत्वपूर्ण थी। 




  


Monday, July 24, 2023

shashiprabha: आंध्रप्रदेश की कलमकारी का कमाल दिखातीं -शशिप्रभा ...

shashiprabha: आंध्रप्रदेश की कलमकारी का कमाल दिखातीं -शशिप्रभा ...:                                         आंध्रप्रदेश की  कलमकारी का कमाल दिखातीं                                               -शशिप्रभा तिव...

आंध्रप्रदेश की कलमकारी का कमाल दिखातीं -शशिप्रभा तिवारी

                                        आंध्रप्रदेश की  कलमकारी का कमाल दिखातीं 

                                             -शशिप्रभा तिवारी

कुचिपुडी नृत्यांगना और गुरु वनश्री राव ने आंध्रप्रदेश की नृत्य शैली कुचिपुडी को तो अपनाया ही है। उन्होंने वहां की चित्रकला शैली कलमकारी को नया रूपाकार देकर, एक नई पहल की है। उन्होंने अपने प्रयासों न सिर्फ सैकड़ों कलमकारी के चित्रकारों को बल्कि सैकड़ों दर्जियों को भी इस काम से जोड़ा। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के स्वरोजगार और महिला सशक्तिकरण के संदेश को दिल से अपनाया है। उन्होंने कलमकारी के कलाकारों की कूची और चित्रकारी को परंपरागत साड़ी के अलावा उसे आधुनिक डिजाइन्स, पैटर्न और परिधानों से जोड़कर एक नई शुरूआत की है। उन्होंने कलमकारी के नए अवतार को आंगिकम नाम दिया है। उनके ब्रांड का नाम आंगिकम है। 


अक्सर, कलाकार अपनी कला को विस्तार देकर, उसे नया आयाम देते हैं। युवा कलाकारों को अपने साथ शामिल कर कुछ नया करने की प्रेरणा देते हैं। वहीं दूसरी ओर वह विभिन्न शैलियों की दूरियों को खत्मकर उन्हें जुड़ने का भी अवसर प्रदान करते हैं। कुचिपुडी नृत्य की वरिष्ठ नृत्यांगना व गुरु वनश्री राव ने अपने साथ भरतनाट्यम, कुचिपुडी और छऊ के कलाकारों को जोड़कर रसा यूनाइटेड की स्थापना की है। इसके जरिए उन्होंने कई नृत्य रचनाओें को पेश कर शास्त्रीय नृत्य जगत में एक नई पहल की है।  


आंध्रप्रदेश के मछलीपत्तनम और कलहस्ती जैसे शहर कलमकारी के मुख्य केंद्र हैं। इसके बारे में वनश्री राव बताती हैं कि कलमकारी पहले चित्र और मंदिर की दीवारों पर की जाती थी। लेकिन, अब इसके डिजाइन कपड़ों पर भी नजर आने लगी है। मैंने अपने डिजाइनर्स साड़ी और वीयर्स के लिए कलमकारी को ही चुना।



डिजाइनर वनश्री राव बताती हैं कि कलमकारी के कलाकार विश्वनाथ रेड्डी का मुझे खास सहयोग मिला है। वह हुनरमंद चित्रकार हैं। वह कलम के जरिए चित्रों को बनाते हैं और नेचुरल कलर के इंक का इस्तेमाल डिजाइन बनाने में करते हैं। कलमकारी के लिए वह 

बांस के टुकड़े या खजूर के पत्ते से कलम तैयारी करते हैं। डिजाइन की पैटर्न की आउटलाइन के लिए इमली की डाल को जला कर काली स्याही बनाई जाती है, उससे की जाती हैं। साथ ही, जिस कपड़े पर चित्रकारी की जाती है, उसे कई दिनों तक भैंस के दूध में भिंगोकर रखा जाता है, इससे चित्रकारी करना आसान हो जाता है। पर इसे सूखने में काफी समय लगता है। एक साड़ी को डिजाइन करने में तकरीबन छह महीने का समय लगता है।


वैसे तो कलमकारी के लिए चित्रकार अपनी कला मेें महाभारत, रामायण के साथ-साथ शिव पुराण और अन्य आध्यात्मिक और पौराणिक कथा को आधार बनाया जाता है। इस संबंध में फशन डिजाइनर वनश्री राव बताती हैं कि मैंने अपनी परिकल्पना से शिव विवाह, लोटस लेक व्यू जैसे नए कंसेप्ट को अपने साड़ी की डिजाइन के तौर पर इस्तेमाल किया है। इसे लोगों ने बहुत पसंद किया। 

आप संगीत नाटक अकादमी सम्मान से सम्मानित कुचिपुडी नृत्यांगना हैं। फिर, आप फैशन जगत में कैसे आईं? इस सवाल के जवाब में हंसते हुए, वनश्री राव बताती हैं कि शुरू-शुरू में मैं अपने लिए ब्लाउज और जैकेट्स वगैर डिजाइन करवा कर अपने टेलर से सिलवाती थी। उन्हें पहनकर मैं जब कभी किसी समारोह में जाती, तब लोग मुझसे पूछते कि आपने किस डिजाइनर से खरीदा है। उस समय मैं हंस कर टाल जाती थी। उसी दौरान, मेरे पति गुरु जयराम राव जी ने मुझसे कहा कि तुम अपना काम शुरू करो और इस उपक्रम के लिए उन्होंने मुझे करीब पच्चीस हजार रूपए भी दिए। यह बात वर्ष 2009 की है। इसके बाद, यह सिलसिला चल पड़ा। 

इस संदर्भ में वह आगे कहती हैं कि मैंने उन पैसों से दस डिजाइनर्स ब्लाउज तैयार किए। संयोग है कि उसी समय हमलोगों का सैन फैंसिस्को जाना हुआ। वहां मैं हर रोज साड़ी पहनती और तरह-तरह के अपनी डिजाइन की हुई तरह-तरह के ब्लाउज पहनती। हमारी आयोजिका जो खुद डांसर थी, मेरे ब्लाउज की डिजाइन से बहुत प्रभावित हुई। उसने मुझसे पूरे ब्लाउज ही खरीद लिया, इससे मेरा मनोबल और ऊंचा हो गया और आत्मविश्वास भी बढ़ गया। साड़ी और ब्लाउज के अलावा, जैकेट्स, कुर्ता, शाॅल, स्टाॅल, स्कर्ट आदि भी कलमकारी में लेकर आई। यह चुनौतीपूर्ण था। लेकिन, लोगों ने इस नए प्रयोग को पसंद किया। 

अमेरिका से लौटने के बाद, मैंने फिर से सात मंगलगिरि साड़ी खरीदकर, उसमें अपने स्केच को चित्रकार विश्वनाथ रेड्डी से बनवाया। सौभाग्यवश, उन डिजाइनर्स साड़ी पर कस्तूरी मेनन जी की नजर पड़ गई। वह उन दिनों कमला क्राफ्ट कौंसिल की अध्यक्ष थीं। उन्हें मेरी साड़ियां पसंद आ गईं, उन साड़ियों को उन्होंने कोलकाता के एक प्रदर्शनी में भेजा। उसके उद्घाटन के लिए मशहूर गायिका ऊषा उत्थुप आईं थीं। वह मुझसे मिलकर और मेरी डिजाइंस से बहुत खुश हुईं। इस तरह कोलाकाता में मेरे डिजाइन की बहुत मांग थी। इसी क्रम में जयपुर डाॅट काॅम वालों ने भी मेरी साड़ियांे को डिस्प्ले किया। उनके आॅन-लाइन शाॅपिंग में एक दिन में ही मेरी साड़ियां बिक जाती हैं। मेरे कस्टमर दुबई, लंदन, अमेरिका, आॅस्टेलिया आदि देशों में हैं। मुझे खुशी है कि तसलीमा नसरीन, रितु कुमार, सत्यपाॅल, नसरीन जैसे लोग मेरी डिजाइंस किए वीयर्स को पहनते हैं और उसे पसंद करते हैं। इतना ही नहीं, मैं अपनी डांस कोरियोग्राफी में भी खुद के डिजाइन किए परिधान ही कलाकारों को पहनाती हूं। मेरे क्लाइंट्स में डाॅक्टर, प्रोफेसर, सांसद, आईएएस अधिकारी सभी शामिल हैं। यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। 

एक बिजनेस वीमेन के तौर पर वनश्री मानती हैं कि कोई भी व्यवसाय आपसी विश्वास पर चलता है। कोविड के समय जब काम लगभग बंद थे, तब भी मैंने अपने मास्टर टेलर अकरम और चित्रकार विश्वनाथ रेड्डी को उनके वेतन देती रही। हालांकि, वह मेरे लिए भी कठिन दौर था। कोविड के पहले मेरा हर महीने का छह से सात लाख का बिजनेस था। वह लगभग बंद हो गया था। इसके बावजूद मैं उनको हर महीने उनकी सैलरी देती रही ताकि उनको घर-गृहस्थी को चलाने में परेशानी नहीं आए।

गौरतलब है कि कुचिपुडी नृत्यांगना वनश्री राव ने गुरू जयराम राव और गुरू वेम्पति चिन्ना सत्यम से नृत्य सीखा है। वह नृत्य को अपना जीवन मानती हैं। कुछ साल पहले वह भूटान में नृत्य प्रस्तुत करने गईं थी। उसका जिक्र करते हुए, वह कहती हैं कि यात्रा के दौरान मुझे अहसास हुआ कि मेरी ऊर्जा और सक्रिया का एकमात्र स्त्रोत नृत्य है। इसलिए जब तक सांसे चलती रहेंगीं मैं युवा कलाकारों के साथ नृत्य करती रहूंगी। मेरी युवावस्था काफी संघर्षपूर्ण रहा। मुझे याद नहीं आता कि मैंने खुद को कभी सोलह या अठारह के उम्र की कोई रूमानियत पल में जीया हो। कभी यह लगा हो कि मैं बहुत खूबसूरत हूं या कभी खुद को संवारने की कोशिश की हो। उस समय तो सिर्फ एक ही सपना था, खुद को कामयाब बनाना है। मैं उस उम्र में भी अपनी जिम्मेदारी समझती थी, यह जानती थी कि मेरा एक फैसला मेरी जिंदगी के रूख को पूरी तरह बदल देगा। बहुत समझदारी और जिम्मेदारी से अपने कदम बढ़ाया करती थी। हां, मैंने जो भी करना चाहा, वो काम किया। क्योंकि, आज कल लोगों को उदास या अवसाद में देखती हूं कि वह अपने जीवन में करना कुछ और चाहते थे पर कुछ और ही करते रहे।

कुचिपुडी नृत्यांगना और डिजाइनर वनश्री राव कहती हैं कि दरअसल, बचपन में तो हमें समझ नहीं आता कि जिंदगी क्या है? पर किशोरावस्था आते-आते इतना समझ तो आने ही लगा कि जो जन्म लेगा, उसका मरना निश्चित है। यानी जीवन नश्वर है। इसलिए, यह जीवन मूल्यवान है। वैसे भी मानव जीवन एक बार ही मिलता है। मैं पुर्नजन्म में भी विश्वास करती हूं। हालांकि, यह पता नहीं कि अगला जन्म कब और किस रूप में होगा। क्यांेकि, मुझे लगता है कि एक जीवन में हम सब कुछ नहीं कर पाते, इसलिए हमारा पुर्नजन्म होता है। फिर, जीवन के इस मुकाम पर मैं खुद को खुशकिस्मत मानती हूं कि बचपन और युवा अवस्था में बहुत संघर्ष की हूं। इस संघर्ष में मुझे अपने परिवार, भाई-बहन और पति का पूरा-पूरा साथ मिला। और मैंने जो भी चाहा वो काम किया और उसमें मुझे सफलता भी मिली।


Thursday, June 29, 2023

shashiprabha: गुरू शिष्य परंपरा और वर्तमान परिस्थितियों की चुनौत...

shashiprabha: गुरू शिष्य परंपरा और वर्तमान परिस्थितियों की चुनौत...:   गुरू शिष्य परंपरा और वर्तमान परिस्थितियों की चुनौतियां ----शशिप्रभा तिवारी जीवन में संगीत के सुर हैं और यह सुर ही जीवन है। यही भारतीय जीवन...

गुरू शिष्य परंपरा और वर्तमान परिस्थितियों की चुनौतियां -- शशिप्रभा तिवारी

 गुरू शिष्य परंपरा और वर्तमान परिस्थितियों की चुनौतियां

----शशिप्रभा तिवारी


जीवन में संगीत के सुर हैं और यह सुर ही जीवन है। यही भारतीय जीवन दर्शन है। जहां सुबह दिनचर्या की शुरूआत संगीत से होती है। हर काम को करते हुए, लोग गाते हैं। आमतौर पर यहां गाने-बजाने के लिए लोग किसी मंच या उत्सव या पर्व का इंतजार नहीं करते। ग्रामीण अंचल में गृहणी सुबह की शुरू अगर चक्की चलाने से करे या घर बुहारने से या अपने बच्चे को सुलाने के लिए भी वह गाती थी और गाती है। ये संगीत ही है, ये कला ही है और कलाकार मन ही है, जो हर हाल में जिंदगी को जीने का जज्बा देता है। लेकिन, पिछले वर्ष यानि 2020के मार्च महीने से ही जिंदगी ऐसा लगता है कि रूक गई है। इस दौर में, देश के कलाकार भी गहन पीड़ा से गुजर रहे हैं। और तो और गुरु-शिष्य परंपरा के सामने की चुनौतीपूर्ण स्थिति है। इस संदर्भ में,  पंडित बिरजू महाराज के विचार पेश है-



हम कलाकारों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई है। जो कलाकार अपने संगीत और नृत्य के जरिए लोगों को कुछ देर के लिए ही सही सांसारिक परेशानियों से हटाकर दो-तीन घंटे के लिए अलग कर देते थे। उनको मानसिक शांति मिलता था। लोग एक जगह बैठकर हम कलाकारों को देख-सुन रहे हैं। उन्हें आनंद की प्राप्ति हो रही है। अब हम ऐसे क्षण का इंतजार कर रहे हैं। वो समय अच्छा आएगा है। सबको ताजगी देगा।

हम लोग तो बेताब हो रहे हैं कि हमें स्टेज पर और दर्शकों के सामने नृत्य प्रस्तुत करने का अवसर कब मिलेगा। कोलकाता, मलेशिया, मुम्बई की वर्कशाॅप मेरी कैंसिल हो गए हैं। मेरे शागिर्द कोलकाता में बहुत ज्यादा है। मेरे शिष्य-शिष्याओं का फोन आता है, सब मुझसे मिलने को बेचैन है। पर हालात ऐसे हैं कि सब मजबूर है। 

एक गुरु के रूप में मैं युवा कलाकारों को तसल्ली को बनाए रखने और अपना ध्यान रखने की सलाह देता हूं। मैं खुद सुबह उठकर, ध्यान में चुपचाप बैठता हूं। अपने-आपको सोचता हूं मैंने क्या-क्या किया है? क्या करना है? कितना बाकी है। उसको पूरा करना और धैर्य का दामन पकड़े रहना है। शास्त्रीय संगीत और नृत्य को रियाज करना है। यहां तो हालत ऐसे ही हैं-जौन गत तोरी, वही गत मोरी।

एक उम्मीद का दीया मन में जलाए रखता हूं कि समय जरूर बदलेगा। खालीपन तो हमें भी महसूस होता है। मैं कविता-ठुमरी लिखता हूं। मेरी जिंदगी में रोज नया सृजन होता है। नहीं तो जिंदगी नीरस बन जाती है। आप हर पल कुछ नया तलाश पाते हैं, तो उसका आनंद ही अनूठा है। आप व्यस्त हों, आपके पास उदासी का समय कहां हैं? एक रोज की बात बताता हूं। हाल ही में, अचानक रात को तीन बजे नींद खुली। उस वक्त ध्यान में एक नई तिहाई बन गई। सो, अपने एक शागिर्द को फोन कर कहा कि एक नई तिहाई बनी है। इसे जल्दी से रिकार्ड कर लो। शायद, सुबह भूल जाऊं। 

क्रिकेट के खेल में दो खिलाड़ी खेलते हैं, कई खिलाड़ी बैठे रहते हैं। कई बार तो दूसरे खिलाड़ियों को खेलने का मौका भी नहीं मिलता है। लेकिन, उनको तो ईनाम में ही बहुत मिल जाता है। क्रिकेट खिलाड़ी सब करोड़पति बन जाते हैं। हमारे फिल्म वाले भी सम्पन्न हैं। लेकिन, शास्त्रीय संगीत, नृत्य और लोक कलाओं से जुड़े कलाकारों की स्थिति डगमगाई हुई है। उन्हें रोजी-रोटी की भी किल्लत हो गई है। वह निराश हैं। समझ नहीं पा रहे हैं कि कैसे जीवन संघर्ष को जीतें। इस समय तो गुरूदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के शांति-निकेतन की बहुत याद आती है। उनकी एक कविता की पंक्ति भी मन दोहराता है-‘पर, हमें बराबर लगता यह, भागा जाता है समय कहीं, रग-रग में भरी हुई है जल्दी, हो जाए कहीं कुछ देर नहीं’। 

दरअसल, हम लोगों के जीवन में बाहर के आनंद नहीं भीतर के आनंद की बात कही जाती है। अगर, हमारे अंतस में, हमारे रियाज में आनंद का स्त्रोत मिल जाए, भीतर का झरना फूट पड़े तो हर स्थिति को हम सहन कर लेते हैं। यह तभी संभव है, जब हम खुद का तटस्थ निरीक्षण करते हैं। यह भारतीय कला हमारे अंतस का दीपक जलाती है। इस अंतस प्रकाश से हम सत्य को भली-भांति जान पाते हैं। फिर, हम जीवन की चैतन्यता, विराटता, विस्तार, अस्तित्व को जान पाते हैं। इस कठिन दौर में मैं युवा कलाकारों से यही कह रहा हूं, बार-बार कि समय कभी एक-सा नहीं होता है। हमें संघर्ष से जिंदगी के इस जंग को जीतना है, धैर्य रखना है। क्योंकि, सब दिन होत ना एक समाना। 


Friday, June 23, 2023

shashiprabha: गुरु से बढ़कर कोई नहीं! -शशिप्रभा तिवारी

shashiprabha: गुरु से बढ़कर कोई नहीं! -शशिप्रभा तिवारी:                                                               गुरु से बढ़कर कोई नहीं!                                                        ...

गुरु से बढ़कर कोई नहीं! -शशिप्रभा तिवारी

                                                             गुरु से बढ़कर कोई नहीं!

                                                              -शशिप्रभा तिवारी

भारतीय संस्कृति में गुरुओं का बड़ा महत्व रहा है। गुरु मानव रूप में नारायण ही हैं। गुरु अपने शिष्यों के जीवन से अंधकार मिटाकर उनके मार्ग को प्रकाशित करतें हैं। इस क्रम में शिष्य नर से नारायण के मार्ग पर अग्रसर होता है। ब्रह्मर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वामित्र दोनों को श्रीराम के गुरु के रूप में जाना जाता है। संदीपनी ऋषि के पास दीक्षा प्राप्त कर ही श्रीकृष्ण भगवान बने। आज भी शास्त्रीय नृत्य-संगीत के क्षेत्र में गुरु का मार्ग-दर्शन और शिक्षण का महत्व है। क्योंकि यह गुरुमुखी विद्या है। इसे गुरु के सानिध्य में  ही रहकर बेहतर तरीके से सीखा जा सकता है। इसकी झलक सुमधुर हंसध्वनि ट्रस्ट के आयोजन स्वर लहर में नजर आया। 





दरअसल, यह अवसर गुरु और शिष्य दोनों के लिए खास अवसर था। शास्त्रीय गायिका और गुरु विदुषी सुमित्रा गुहा को संगीत नाटक अकादमी सम्मान 2020 से सम्मानित किया गया था। इसे ही उत्सव का रूप उनकी शिष्य-शिष्याओं ने दिया था। स्वर लहर समारोह का आयोजन सूरजकुंड में किया गया था। इसमें उनके शिष्य-शिष्याओं ने अपने गुरु को सुरों के जरिए आदरांजलि दिया। उनकी सामूहिक प्रस्तुति की शुरुआत गुरु वंदना से हुई। इसके बोल थे-‘गुरू चरणन में नमन करो‘। 

समारोह की मुख्य आकर्षण युवा शिष्या वसुधारा राॅय मुंशी थी। उन्होंने राग वृंदावनी सारंग में द्रुत एक ताल में बंदिश ‘आए मन रसिया मंदिरा बाजो‘ गाया। इसके बाद, उन्होंने राग यमन का आधार लेकर मीरा भजन प्रस्तुत किया। उनके साथ हारमोनियम पर अंकित कौल और तबले पर सोम चटर्जी ने संगत किया। गुरु सुमित्रा गुहा के एक अन्य शिष्य हेतार्थ चटर्जी ने अपनी कला को लोगों के सामने पेश किया। उन्होंने आरंभ में भजन ‘सुनी मैं हरि आवन की‘ गाया। इसके बाद, राग चारूकेशी में विलंबित लय की बंदिश ‘बाजे झनक मोरी पायलिया‘ पेश किया। फिर, द्रुत लय और एक ताल में निबद्ध रचना को पेश किया। इस राग में उन्होंने रचना ‘मंदरवा बाजो, संुदर गोपाल आयो‘ को सुरों में पिरोया।




समारोह में वरिष्ठ शिष्या अरूंधती ने राग बैरागी भैरवी में बंदिशों को पेश किया। उनकी प्रस्तुत रचनाओं के बोल थे-‘सांची सुरन सो गावो‘, ‘सुर से सुर साध ले‘ और साधो मान त्यागो‘। समारोह में पंडित अजय झा की शिष्या मल्लिका ने मोहनवीणा वादन पेश किया। मल्लिका ने राग शुद्ध सारंग को मोहनवीणा पर बजाया। इस कार्यक्रम का संचालन रूबी चटर्जी ने किया। समारोह में तबलावदक पंडित अनूप घोष और गौतम विश्वास की उपस्थित आकर्षक थी। उन्होंने अपने संगत के अंदाज से श्रोताओं का ध्यान आकृष्ट किया। 


वास्तव में, विदुषी सुमित्रा गुहा की विद्वता और अपने शिष्यों के प्रति प्रेम भाव देखकर यही अहसास होता है कि भारतीय संस्कृति में स्थाई सामाजिक व सांस्कृतिक स्थिति का एक लंबा युग रहा है। यहां लोग स्वाभाविक रूप से सांसारिक सुख से परे जाकर अंदरूनी आनंद की ओर देखते रहे हैं। यही आध्यात्मिक चेतना और आत्मिक शक्ति हमारी विशिष्ट उर्जा का केंद्र है। हमारे चार पुरूषार्थ-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष हमारी संस्कृति के महत्वपूर्ण पक्ष रहे हैं। भारतीय संस्कृति में ऋषियों, गुरुओं, संतांे की प्रधानता रही है। ऋषि परंपरा का ही परिणाम है कि यहां गुरुओं का महत्व और सम्मान है।