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Thursday, December 12, 2019





                             महात्मा गांधी से प्रेरणा मिलती है-गीता चंद्रन


महात्मा गांधी से लोगों को प्रेरणा मिलती है। गांधीजी जो अब भी राह दिखाते हैं। उनकी बातें, उनका जीवन, उनकी रचनाएं, उनका पहरावा, सब कुछ हमें प्रभावित करता है। इसी के मद्देनजर भरतनाट्यम नृत्यांगना गीता चंद्रन से बातचीत करने का अवसर मिला। आज उन्हीं के विचार उन्हीं की जुबानी अपने ब्लाॅग में प्रस्तुत कर रही हूं। आशा है, आपलोगों को पसंद आएगा। एक नजर डालिएगा जरूर। डालेंगें न!-शशिप्रभा तिवारी







गांधीजी का नाम जुबान पर आते ही, मेरा मस्तक नतमस्तक हो जाता है। उनकी घुटने से उपर तक की धोती, नंगे बदन, चमड़े के चप्पल, चादर ओढ़े और आंखों पर गोल फ्रेम वाला चश्मा यह रूप आंखों के सामने से सहज ही गुजर जाता है। मन में श्रद्धा के भाव उमड़ने लगते हैं। तब मेरे होठों पर शब्द नहीं आ पाते। सिर्फ, सोचती हूं कि उन्होंने मानव, प्रकृति, देश, विश्व को दिया और आजीवन देते रहे। कभी किसी से किसी चीज की शिकायत किए बिना। कभी मौन रहकर, कभी उपवास कर, कभी आंदोलन का नेतृत्व कर, कभी सेवा तो कभी अपने चरखे के जरिए, उन्होंने शांति, सह-अस्तित्व, बंधुत्व, मैत्री, सहयोग, आत्मनिर्भरता आदि का संदेश दिया।

दरअसल, मेरे पिताजी गांधीवादी थे। वह गांधीजी के बारे में अक्सर हमलोगों के बीच चर्चा करते थे। उन्होंने गांधीजी दर्शन को अपने जीवन में भी अपना रखा था। जैसे-अपने ज्यादा-से-ज्यादा काम खुद करना और लोगों की सेवा करना। वैसे तो मैंने गांधीजी के बारे में भारतीय इतिहास को पढ़ते हुए जाना। लेकिन, कुछ साल पहले मुझे एक इंटरनेशनल काॅन्फ्रेंस के लिए गांधी के बारे में कोरियोग्राफी करने को कहा गया था। उस दौरान मैंने गांधीजी के बारे में कई किताबें पढ़ीं। ताकि, उनके जीवन के बजाय उनके दर्शन को लोगों तक पहंुचा सकूं। उस दौरान मुझे गांधीजी की महान दर्शन से अवगत होने का अवसर मिला।

मुझे लगता है कि गांधीजी के कथनी और करनी में गजब की साम्यता थी। वह लोगों को उपदेश देकर, निर्देश नहीं देते थे। बल्कि, अपने काम के जरिए प्रायोगिक और व्यावहारिक तौर पर समझा देते थे। उनके विचारों के मूल में सत्याग्रह अहिंसा, अछूतोत्द्धार, आत्मनिर्भरता, खादी और महिला स्वातंत्र था। लगभग सौ साल पहले उन्होंने जो चीजें, जो विचार, जो सिद्धांत हमें दिया, उस पर अगर सच में, हमारा देश चल पाया होता तो आज हमारे सामने बहुत-सी समस्याएं नहीं होतीं। क्योंकि आधुनिक विकास के बजाय उन्होंने व्यक्तित्व विकास पर ज्यादा जोर दिया था।

सर्व धर्म प्रार्थना की परिकल्पना बहुत अनूठी थी। वह धार्मिक सहिष्णुता के बजाय धार्मिक विश्वास को उन्होंने महत्व दिया। प्रार्थना में वह खुद बैैठते थे, खुद गाते थे, सभी धर्मों का साहचर्य होता था। वहां टाॅलरेट करने की बात नहीं, बल्कि सबकी स्वीकार्यता थी। वह सिर्फ एक रिचुअल भर नहीं था। वह प्रार्थना सभा मानवता को कितना बड़ा संदेश था कि हम सब एक हैं, हम एक साथ मिलकर ध्यान कर सकते हैं, क्योंकि उस परब्रम्ह के पास पहंुचने का रास्ता सबका एक ही है। सिर्फ तरीके अलग-अलग हैं। आज जहां हर शहर, हर राज्य यहां तक कि हर देश धर्म को लेकर, इतना उग्र हो जाता है, वहां गांधीजी को अपनाकर हम इन समस्याओं से आसानी से निजात पा लेते। पर, हम अपने बीच के महात्मा को आत्मसात करने में बहुत देर कर देते हैं।

गांधीजी ने कितने सारे आंदोलनों का नेतृत्व किया, लेकिन अहिंसा और सत्य के दम पर। जबकि, आज किसी भी बात पर हमारा समाज उग्र हो जाता है। हिंसा करने पर लोग उतारू हो जाते हैं। क्या बस जला देने या तोड़-फोड़ कर देने से देश की सम्पति का नुकसान करना सही है। उन्होंने पूरी मर्यादा के साथ विरोध करने की प्रेरणा दी है। यहां तक कि जेल में अकेले रहते हुए, अपने समय का सदुपयोग किया। यह सकारात्मकता के साथ-साथ समय के सही उपयोग का उदाहरण हमारे सामने वह प्रस्तुत करते हैं। वह संदेश देते हैं कि हमारे जीवन का एक-एक क्षण बहुत कीमती है। हमें उसका भरपूर उपयोग करना चाहिए। कठिन परिस्थितियों से घबराना नहीं चाहिए। और हर समय अपने सामने एक लक्ष्य रखना और उसके कार्यान्वयन के लिए योजना बनाना।

अस्पृश्यता निवारण के साथ, उन्होंने हाथों से मल सफाई किए जाने का विरोध किया। हालांकि, दशकों बाद भी बहुत से कस्बों और गांवों अभी यह प्रथा जारी है। यह मानवता की अस्मिता के लिए दुखद है। हमारे समाज में अस्पृश्यता की भावना कई स्तरों पर आज भी विद्यमान है। मुझे लगता है कि हमारे भीतर से या दिमाग से कई स्तरों पर छूआछूत की भावना है। जबकि, गांधीजी मैलो ढोने वालों की मानवीय गरिमा को कायम करने के लिए लगातार प्रयास करते रहे। इसके मद्देनजर वह स्वयं या कस्तूरबा बाई से वाशरूम साफ करते या करवाते थे। स्वच्छता और स्वास्थ्य के बारे में वह बार-बार चर्चा करते थे। लेकिन, यह नैतिक कर्तव्य हमारा समाज आज तक पूरी तरह अपना नहीं पाया हैं। इसके लिए हम दोषी किसे ठहरा सकते हैं कि सिर्फ गंदगी और कूड़े के ठीक से निस्तारण नहीं किए जाने से लाखों लोग हर साल डेंगू-मलेरिया-चिकनगुनिया जैसी बीमारियों से ग्रस्त होकर काल के मुंह में चले जाते हैं। जबकि, छोटा-सा हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका इन बीमारियों से मुक्त है।

शहर, कस्बे और अब हमारे गांव भी गारबेज मैनेजमेंट की समस्या से जूझ रहे हैं। जबकि, हम इस मामले में आत्मनिर्भर थे। हमारे घरों में ही कचरे को अलग-अलग तरीके से निस्तारित कर लिया जाता था। हमारे संस्कार में था। आज वह हमारे सेमिनारों का विषय बन रहा है-गारबेज मैनेजमेंट। एक सामान्य सा उदाहरण है-हम लोग पके हुए कटहल को खाते हैं। उसके गूदे को खाया जाता, उसके बीज की सब्जी बन जाती और छिलके को गाय खा जाती थी।

वास्तव में, खादी के जरिए हाथ से अपने काम करने और स्वावलंबन का महत्व गांधीजी ने स्थापित किया था। हम अपने काम खुद अपने हाथों से करते हैं, तब हम खुद से जुड़ते हैं। अपनी प्रकृति, पर्यावरण, मिट्टी के साथ संबंध और जुड़ाव स्थापित करते हैं। लेकिन, आज दुखद स्थिति है हि हमारे बच्चे या युवा अपने काम खुद नहीं करना चाहते। वह हाथों के हुनर से महरूम होते जा रहे हैं। हम त्योहारों पर अपने घरों में मिठाइयां वगैरह बनाने से बचने लगे हैं। ऐसे में बाजारवाद हम पर स्वाभाविकतौर पर हावी हो रहा है। हम बाजार से खरीदकर अपना काम चला लेते हैं। इस तरह बच्चों में खुद से काम करने की प्रवृति ही नहीं आ रही। इसके लिए हमलोग और हमारा समाज ही जिम्मेदार होगा। जबकि, हमारे हर प्रदेश, हर शहर में अलग-अलग व्यंजन, वेशभूषा, आभूषण लोग बनाते और पहनते हैं। पर अब धीरे-धीरे माॅल कल्चर ने वह सब हाशिए पर कर दिया है। गांधीजी ने एक सदी पहले ही हमें चेताया था, लेकिन, हमलोग कहां जाग पाते हैं।

आज के दौर में रही-सही कसर मीडिया ने पूरी कर दी है। गांधीजी भी लिखते थे, हर विषय पर अपने विचारों को रखा। हरिजन अखबार का संपादन किया। अपनी जीवनी लिखी। मुझे उनकी किताब ‘एक्सपरिमेंट विद टूथ‘ बेहद पसंद है। मैंने इसे कई बार पढा। इसके जरिए अपने जीवन के सत्य को उजागर किया। उनके विचारों को सबसे बेहतर तरीके से हम तीन बंदर के माध्यम से जानते हैं, जिसमें बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोला। यानि अपने इंद्रियों पर एक नियंत्रण करने की बात उन्होंने की। लेकिन, आजकल हम टीवी चैनलों पर व्यर्थ का संवाद सुनते हैं। इसमें किसी की कोई मर्यादा नहीं रही है। ऐसा लगता है कि शब्दों के वाण से आक्रमण किया जा रहा है। यह लोग भूल गए हैं कि एब बार शब्द तीर की तरह छूट जाते हैं, वो वापस नहीं लौट सकते। हम अच्छी चीजों को देखना-सुनना ही भूल गए हैं। हम प्रकृति के सानिध्य में सूर्याेदय के सूर्य, सूर्यास्त के सूर्य, चांदनी रात, पूर्णिमा और आमवस्या की रातों का आनंद लेना भूल गए हैं। हम टीवी, मोबाइल और दूसरे गैजेटॅस तक सीमित रह गए हैं।

महात्मा गंाधी, विवेकानंद, भारती, भगत सिंह, चंद्रशेखर जैसे रोल माॅडल आज हमारे सामने नहीं प्रस्तुत किए जाते हैं। एक अजीब-सी रिक्तता है, चारों ओर। एक ऐसा संक्रमण काल जो बहुत चिंताजनक है। आदर्शों के अभाव में हमारे युवा अपनी संस्कृति पर गौरवान्वित महसूस नहीं कर पाते। गांधीजी ने धोती को धारण किया। उससे सांस्कृतिक पहचान कायम किया। एक दृढ-विश्वास के साथ उन्होंने अपने संस्कार पर गर्व करना सिखाया। आज हमारी युवा पीढ़ी संदेह में है। क्योंकि, उनके सामने गांधीजी जैसा आदर्श व्यक्तित्व नहीं है। उन्हें विश्व इतिहास का पता है, पर हमारे देश में यक्षगान की परंपरा क्या है? नहीं मालूम। इतना ही नहीं, वह विदेशी भाषा तो सीख रहे हैं, पर हिंदी और संस्कृत के प्रति उदासीन है। कभी-कभी सोचती हूं तो मन आग्रही होकर, कह उठता है-गांधीजी फिर एक बार अवतरित होकर, हमें राह दिखा दिजीए। कभी मौन रहकर, कभी उपवास कर, कभी आंदोलन का नेतृत्व कर, कभी सेवा तो कभी अपने चरखे के जरिए, उन्होंने शांति, सह-अस्तित्व, बंधुत्व, मैत्री, सहयोग, आत्मनिर्भरता आदि का संदेश दिया।

उनके विचारों के मूल में सत्याग्रह अहिंसा, अछूतोत्द्धार, आत्मनिर्भरता, खादी और महिला स्वातंत्र था। लगभग सौ साल पहले उन्होंने जो चीजें, जो विचार, जो सिद्धांत हमें दिया, उस पर अगर सच में, हमारा देश चल पाया होता तो आज हमारे सामने बहुत-सी समस्याएं नहीं होतीं। क्योंकि आधुनिक विकास के बजाय उन्होंने व्यक्तित्व विकास पर ज्यादा जोर दिया था।

सर्व धर्म प्रार्थना की परिकल्पना बहुत अनूठी थी। वह धार्मिक सहिष्णुता के बजाय धार्मिक विश्वास को उन्होंने महत्व दिया। प्रार्थना में वह खुद बैैठते थे, खुद गाते थे, सभी धर्मों का साहचर्य होता था। वहां टाॅलरेट करने की बात नहीं, बल्कि सबकी स्वीकार्यता थी। वह सिर्फ एक रिचुअल भर नहीं था। वह प्रार्थना सभा मानवता को कितना बड़ा संदेश था कि हम सब एक हैं, हम एक साथ मिलकर ध्यान कर सकते हैं, क्योंकि उस परब्रम्ह के पास पहंुचने का रास्ता सबका एक ही है। सिर्फ तरीके अलग-अलग हैं। आज जहां हर शहर, हर राज्य यहां तक कि हर देश धर्म को लेकर, इतना उग्र हो जाता है, वहां गांधीजी को अपनाकर हम इन समस्याओं से आसानी से निजात पा लेते। पर, हम अपने बीच के महात्मा को आत्मसात करने में बहुत देर कर देते हैं।

गांधीजी ने कितने सारे आंदोलनों का नेतृत्व किया, लेकिन अहिंसा और सत्य के दम पर। जबकि, आज किसी भी बात पर हमारा समाज उग्र हो जाता है। हिंसा करने पर लोग उतारू हो जाते हैं। क्या बस जला देने या तोड़-फोड़ कर देने से देश की सम्पति का नुकसान करना सही है। उन्होंने पूरी मर्यादा के साथ विरोध करने की प्रेरणा दी है। यहां तक कि जेल में अकेले रहते हुए, अपने समय का सदुपयोग किया। यह सकारात्मकता के साथ-साथ समय के सही उपयोग का उदाहरण हमारे सामने वह प्रस्तुत करते हैं। वह संदेश देते हैं कि हमारे जीवन का एक-एक क्षण बहुत कीमती है। हमें उसका भरपूर उपयोग करना चाहिए। कठिन परिस्थितियों से घबराना नहीं चाहिए। और हर समय अपने सामने एक लक्ष्य रखना और उसके कार्यान्वयन के लिए योजना बनाना।

महात्मा गंाधी, विवेकानंद, भारती, भगत सिंह, चंद्रशेखर जैसे रोल माॅडल आज हमारे सामने नहीं प्रस्तुत किए जाते हैं। एक अजीब-सी रिक्तता है, चारों ओर। एक ऐसा संक्रमण काल जो बहुत चिंताजनक है। आदर्शों के अभाव में हमारे युवा अपनी संस्कृति पर गौरवान्वित महसूस नहीं कर पाते। गांधीजी ने धोती को धारण किया। उससे सांस्कृतिक पहचान कायम किया। एक दृढ-विश्वास के साथ उन्होंने अपने संस्कार पर गर्व करना सिखाया। आज हमारी युवा पीढ़ी संदेह में है। क्योंकि, उनके सामने गांधीजी जैसा आदर्श व्यक्तित्व नहीं है। उन्हें विश्व इतिहास का पता है, पर हमारे देश में यक्षगान की परंपरा क्या है? नहीं मालूम। इतना ही नहीं, वह विदेशी भाषा तो सीख रहे हैं, पर हिंदी और संस्कृत के प्रति उदासीन है। कभी-कभी सोचती हूं तो मन आग्रही होकर, कह उठता है-गांधीजी फिर एक बार अवतरित होकर, हमें राह दिखा दिजीए।



Tuesday, December 10, 2019

कला के विस्तार का एक और आयाम



                  कला के विस्तार का एक और आयाम

                   शशिप्रभा तिवारी


               





समारोह ‘या देवी सर्वभूतेषु‘ लोक कला मंच में आयोजित था। इस कार्यक्रम का आयोजन सुरमंदिर की ओर से किया गया। इस समारोह में महिला कलाकारों शास्त्रीय संगीत और नृत्य पेश किया। इसमें शिरकत करने वाली कलाकारों में शामिल थीं-डाॅ अदिति शर्मा, इला शर्मा, डेल्फिन, सुधा रघुरामन, अनुप्रिया देवताले व नतालिया रेमिरेज। इसके अलावा, वुसत इकबाल और कथक नृत्यांगना यामिका महेश व कल्पना वर्मा ने ‘रूदाद ए शिरिन‘ प्रस्तुत किया। इस पेशकश में दास्तानगोई की दास्तान को कथक नृत्य रचना में पिरोया गया था।
धु्रपद गायिका बहनें डाॅ अदिति शर्मा और इला शर्मा ने राग परज में रचना ‘कान्ह कुंवर मुरलीधर‘ और रचना ‘रघुवीर धीर आयोध्या नगर‘ को पेश किया। आलापचारी और बढ़त में राग का सौंदर्य मोहक था। उनके साथ पखावज पर मनमोहन नायक ने संगत किया।

नायिका शिरिन की कहानी के माध्यम से एक महिला की दास्तान को एक ओर वुसत इकबाल ने सुनाया, वहीं दूसरी ओर अमीर खुसरो व अन्य पारंपरिक बंदिशों को आधार बनाकर नृत्य पेश किया गया। बनड़ा गीत ‘आज नवल बन्ना‘ से प्रस्तुति आरंभ हुई। विदाई गीत ‘काहे को व्याहे बिदेश‘, ‘मैं जो गई थी बीच बजरिया‘, ‘खुसरो रैन सुहाग की‘ के जरिए नृत्यांगनाओं ने भावों को दर्शाया। कथक नृत्यांगना यामिका महेश ने ‘जो पिया आवन कह गए‘ पर नायिका के विरह भावों को बखूबी दर्शाया। कथक के तोड़े, टुकड़े और तिहाइयों का प्रयोग भी यामिका ने सधे अंदाज में किया। वहीं सूफी रचना ‘निजाम तोरे सूरत पे मैं वारी‘ में नायिका के समर्पण भावों को संचारी व आंगिक अभिनय के जरिए दर्शाया। इस पेशकश में कथक नृत्यांगना कल्पना वर्मा ने झूला गीत ‘झूला किने डारो रे‘ पर नायिका के चपल भावों को निरूपित किया। उन्होंने झूले, घंूघट व सादी गतों का प्रयोग अपने नृत्य में किया। उन्होंने एक अन्य रचना ‘मैं तो तोरे दामन लागी‘ के माध्यम से भी नायिका शिरिन के भावों को परिपक्वता से दर्शाया। इस प्रस्तुति में नजर व सादी गत का प्रयोग मोहक था। कुल मिलाकर, दिल्ली घराने के उस्ताद इकबाल अहमद की इस परिकल्पना को उनकी शिष्याओं ने गायन के माध्यम से साकार किया। जबकि, कलाकार वुसत इकबाल ने अपनी किस्सागोई अंदाज में संवाद के जरिए नायिका की कथा को बयान किया। कथक और दास्तानगोई का यह प्रयोग सराहनीय है।



Saturday, December 7, 2019

शिव के अनंत रूपों का दर्शन



                          शिव के अनंत रूप का दर्शन

                          शशिप्रभा तिवारी

इंडिया हैबिटाट सेंटर में नृत्य समारोह आयोजित था। इस समारोह में रस यूनाइटेड के कलाकारों ने नृत्य रचना त्र्यंबक पेश किया। इस नृत्य की परिकल्पना नृत्यांगना और कोरियोग्राफर वनश्री राव ने किया था। नृत्य में शिरकत करने वाले कलाकारों में शामिल थे-भरतनाट्यम नर्तक एस वासुदेवन, छऊ के कलाकार कुलेश्वर ठाकुर, अर्जुन देव, प्रशांत कालिया और कुचिपुडी नृत्यांगना-वनश्री राव, मौतुश्री मजूमदार, आयना मुखर्जी व शेफाली भारती। प्रस्तुति की बेजोड़ संगीत को कर्नाटक संगीत के गायक के वेकेंटेश्वरन व एस वासुदेवन ने सुसज्जित किया था। 
वरिष्ठ कुचिपुडी नृत्यांगना वनश्री राव पौराणिक कथाओं को नृत्य शैलियों में पिरोकर पेश कर रही हैं। उनकी इस पहल में युवा कलाकारों की स्फूर्ति, ऊर्जा और तेजस्विता से मंच का ओज बढ़ जाता है। इस प्रस्तुुति की खासियत है कि इसमें भरतनाट्यम, छऊ और कुचिपुड़ी नृत्य शैलियों का संगम है। जबकि, पाश्र्व संगीत कुचिपुडी नृत्य संगीत होती है। 
प्रस्तुति के आरंभ में त्र्यंबकम से हुआ। इसमें शिव के अर्धनारीश्वर, कामेश्वर, पशुपति, आदिरूपों को निरूपित किया गया। यह राग भैरवी, अमृतवर्षिणी, पूर्वी कल्याणी में निबद्ध था। रचना ‘नम नमस्तेषु वपुधराय‘ में शिव के रूप का चित्रण नर्तक वासुदेवन ने किया। यहीं कलाकारांे ने छंद ‘भवं भवं भवानि, शिवं शिवं शिवानी‘ पर शिव व पार्वती के रूपों को दर्शाया। साथ ही, शंकर के डमरू वादन और नृत्य को अपने नृत्य में मोहक अंदाज में पेश किया। सती दाह, महिषासुरमर्दिनी और अर्जुन को पाशुपत अस्त्र प्रदान के प्रसंग को निरूपित किया। धनंजय प्रसंग की इस प्रस्तुति को देखते हुए, महाबलिपुरम के रथ मंदिर में अंकित अर्जुन की तपस्या और शिव के द्वारा उनको पाशुपत अस्त्र प्रदान का दृश्य रूपायित होता प्रतीत हुआ। इस नृत्यांश का समापन रचना ‘शंकर शंभू दीन दयाला‘ पर प्रभावकारी सामूहिक नृत्य से हुआ। 
दूसरे अंश में द्वादशज्योर्तिलिंग का प्रतीकात्मक चित्रण था। यह राग मालिका और ताल मालिका में निबद्ध था। शिव त्याग, तपस्या, वात्सल्य, करूणा के मूर्ति हैं। वह स्वयंभू, शाश्वत, चेतन स्वरूप बारह ज्योर्तिलिंग में ज्योति रूप में विराजित हैं। हस्तकों, मुद्राओं और भंगिमाओं के जरिए बहुत संक्षिप्त अंदाज में बारह ज्योर्तिलिंग का निरूपण प्रभावकारी था। वहीं महामृत्यंुजय मंत्र और श्लोक ‘महादेवाय त्र्यंबकाय त्रिपुरांतकाय‘ में मारकंडेय प्रसंग के साथ शिव के अन्य रूपों को कलाकारों ने पेश किया। सभी कलाकारों का आपसी संयोजन, संतुलन और समायोजन संुदर था। यह चुनौतीपूर्ण प्रस्तुति मर्म स्पर्शी थी। 
अगली पेशकश देवी महिषासुरमर्दिनी थी। शिव की शक्ति दुर्गा हैं। उन्होंने इसी के मद्देनजर इस प्रसंग को पेश किया। इसके लिए मारकंडेय पुराण के दुर्गासप्तशती के श्लोक, आदि शंकराचार्य की रचना ‘जय जय हे महिषासुरमर्दिनी का चयन किया गया। शुरू में श्लोक ‘कांचि कालि कुंभ लता‘ पर देवी दुर्गा के रूप को दिखाया गया। ‘या देवी सर्वभूतेषु‘ पर देवी के शक्ति को दर्शाया। यहीे दैत्य के साथ देवी के संघर्ष को ‘दुर्गे दुगर्ति नाशिनी देवी‘ छऊ और कुचिपुडी नृत्य शैली में प्रभावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया गया। देवी चंद्रघंटा और महिषासुर मर्दिनी के रूपों को मनोरंजक अंदाज में प्रदर्शित किया गया। संक्षिप्त रूप में व्यर्थ के विस्तार से बचते हुए, संक्षिप्त रूप में यह प्रस्तुति वास्तव में, सागर को गागर में भरने जैसा था। आगे भी रस यूनाइटेड के कलाकार ऐसे ही प्रयासों से कला का समृद्ध करते रहेंगें ऐसी अपेक्षा है। क्योंकि, ऐसे पहल से कला परंपरा और कलाकार दोनों समृद्ध होते हैं। शायद, यह समय की मांग भी है। 

               




Monday, December 2, 2019

मॉडर्न स्कूल में शताब्दी समारोह में वायलिन के सुर



मॉडर्न स्कूल में शताब्दी समारोह में वायलिन के सुर 
                   

                   शशिप्रभा तिवारी
                   


वायलिन वादिका अनुप्रिया देवताले 





इन दिनों माॅडर्न स्कूल, बाराखंबा में शताब्दी वर्ष समारोह की धूम है। वहां सांस्कृतिक आयोजनों के साथ तरह-तरह की गतिविधियां आयोजित हो रही हैं। इसी सिलसिले में स्पीक मैके की ओर से संगीत समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वायलिन वादिका अनुप्रिया देवताले ने वादन पेश किया। उनके साथ तबले पर अमन पात्रा ने संगत किया।
वायलिन वादिका अनुप्रिया देवताले मानती हैं कि संगीत हमें संवेदनशील इंसान बनाता है। संगीत विश्व में शांति और सौहार्द्र कायम रखने में मदद करता है। मुझे लगता है कि मैं वायलिन बजाने के लिए जन्म ली हूं। मैं बचपन में संगीत सीखती थी। उस समय जब हमउम्र बच्चे खेलते थे, तब मैं बैठकर रियाज करती थी।
अनुप्रिया ने अमीर खुसरो सेंटर फाॅर म्यूजिक की शुरूआत वर्ष 2007 में की थी। इस संस्था का उद्देश्य युवाओं में शास्त्रीय संगीत के प्रति रूझान और जानकारी बढ़े। साथ ही, युवाओं को वह भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित करवा पाएं। अनुप्रिया शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ फ्यूजन म्यूजिक के कार्यक्रम पेश करती हैं। इसके लिए उन्होंने ‘परिंदे‘ के नाम से ग्रुप बनाया है। अनुप्रिया चाहती हैं कि किशोर और युवा शास्त्रीय संगीत के प्रति आकृष्ट हों। वह इसेे सीखें और समझें। क्योंकि शास्त्रीय संगीत सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि जीवन जीने का सलीका है।
बहरहाल, स्पीक मैके के इस आयोजन में वायलिन वादिका अनुप्रिया देवताले ने सुबह का राग अहीर भैरव बजाया। राग अहीर भैरव के पूर्वांग में भैरव और उत्तरांग में काफी का अंग होता है। अनुप्रिया ने आलाप में राग का स्वरूप पेश किया। इसके विस्तार में जोड़ व झाले के बाद, उन्होंने मध्य लय और द्रुत लय की बंदिशों को बजाया। उनके वादन में रिषभ का आंदोलित रूप काफी स्पष्ट महसूस हुआ। वहीं कोमल मध्यम स्वर के प्रयोग ने वादन को और मोहक बना दिया। तबले पर अमन पात्रा ने संतुलन बनाते हुए, लय-ताल की संगति को संपूर्णता प्रदान की। उन्होंने अपने वादन को राम धुन-‘रघुपति राघव राजाराम‘ से विराम दिया। इसकी प्रस्तुति रसमय थी।
समारोह के दौरान, उन्होंने माॅडर्न स्कूल के बच्चों के साथ अपने अनुभव को साझा किया। इस अवसर पर स्कूल के प्रिंसपल डाॅ विजय दत्ता ने कहा कि शास्त्रीय संगीत को सुन कर आत्मीय सुख का अनुभव होता है। यह सुनने वाले को धैर्यवान और सहनशील बनाता है।






Sunday, December 1, 2019

छऊ नृत्य गुरु शशधर आचार्य से एक मुलाकात



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