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Thursday, May 13, 2021

shashiprabha: अपनी मूल से जुड़े---- शशिप्रभा तिवारी

shashiprabha: अपनी मूल से जुड़े---- शशिप्रभा तिवारी:                                                    अपनी मूल से जुड़े -शशिप्रभा तिवारी ओडिशी नृत्य गुरू मायाधर राउत राजधानी दिल्ली में रहते है...

अपनी मूल से जुड़े---- शशिप्रभा तिवारी

                                                   अपनी मूल से जुड़े -शशिप्रभा तिवारी

ओडिशी नृत्य गुरू मायाधर राउत राजधानी दिल्ली में रहते हैं। उन्होंने अपने नृत्य विद्यालय जयंतिका के जरिए कई पीढ़ियों को ओडिशी नृत्य सिखाया है। उन्होंने अपनी पुत्री और शिष्या मधुमीता राउत को ओडिशी नृत्य का प्रशिक्षण दिया। मधुमीता राउत अपनी गुरू की परंपरा का अनुसरण करती हैं। वह अपने गुरू की नृत्य परंपरा को अपनी शिष्य-शिष्याओं को सौंप रही हैं। पिछले दिनों उन्होंने अपने गुरू के नब्बेवें जन्मदिन के अवसर पर आनंद उत्सव का आयोजन किया। दरअसल, गुरू के सम्मान में यह आयोजन एक महत्वपूर्ण कदम था।

 आनंद उत्सव की अंतिम संध्या में 25मार्च को ओडिशी नर्तक लकी मोहंती ने एकल नृत्य पेश किया। उन्होंने देश पल्लवी से नृत्य आरंभ किया। इसकी नृत्य परिकल्पना गुरू कुमकुम मोहंती और संगीत दीपक बासु ने की थी। इस प्रस्तुति में नर्तक लकी मोहंती ने लयात्मक पद, हस्त और अंग संचालन पेश किया। एक-एक बारीकियों को उन्होंने बहुत ही गरिमा और संतुलन के साथ नृत्य में दर्शाया। उनके तकनीकी पक्ष की विशुद्धता आकर्षक और काफी सधी हुई थी। 

उनकी अगली पेशकश गुरू मायाधर राउत की नृत्य रचना दुर्गा स्तुति थी। इसे लकी ने गुरू मायाधर राउत और नृत्यांगना व गुरू मधुमीता राउत के सानिध्य में सीखा है। यह ललिता सहस्रनाम और दुर्गा सप्तशती के श्लोकों पर आधारित थी। दुर्गा स्तुति राग अहीर भैरव और जती ताल में निबद्ध थी।  


ओडिशी नृत्य के क्षेत्र में युवा नर्तक गिने-चुने हैं। उनमें से लकी मोहंती हैं। लकी मोहंती ने कटक के कला विकास केंद्र में ओडिशी नृत्य अपनी गुरू कुमकुम मोहंती से सीखा है। इसके अलावा, वह गुरू कंदु चरण बेहरा और गुरू मधुमीता राउत से समय-समय पर उनकी व उनके गुरूओं की चीजों को सीखते रहे हैं। इस संदर्भ में, ओडिशी लकी मोहंती कहते हैं कि जब भी मुझे अवसर मिलता है। मैं अपने गुरू के अलावा अन्य गुरूओं से सीखने की कोशिश करता हूं। ऐसे ही, गुरू मायाधर कटक आए तो मैं उनसे और मधुमीता दीदी से सीखने की कोशिश की। मुझे गुरू मायाधर जी की अभिनय पक्ष बहुत प्रभावित करता है। इसलिए जब भी मौका मिलता है, मैं उनके पास आकर ओडिशी नृत्य की बारीकियों को सीखता हूं। 

ओडिशी नर्तक लकी दूरदर्शन के मान्यता प्राप्त कलाकार हैं। उन्हें संस्कृति मंत्रालय की ओर से सीनियर फेलाशिप मिल चुका है। उन्हें श्रृंगार मणि, ओडिशी युवा गंधर्व सम्मान, छत्तीसगढ़ प्रतिभा सम्मान मिल चुके हैं। अपने अनुभव को साझा करते हुए, लकी बताते हैं कि मैं उनदिनों रायपुर में रहता था। वहां मैं ओडिशी नृत्य सिखाता था। यह नृत्य वहां के युवाओं ने बहुत मन से सीखा। वहां खैरागढ़ विश्वविद्यालय के साथ भी मुझे काम करने का अवसर मिला। वास्तव में, मैं अपनी जन्मभूमि कटक से ज्यादा दिनों तक दूर नहीं रह सका और वापस यहां आ गया। 

युवा साथियों को अपनी संदेश में ओडिशी नर्तक लकी मोहंती कहते हैं कि अपनी कला-संस्कृति को सीखने से आत्मसंतोष मिलता है। आप अपनी भाषा, अपने पहरावे और अपने गीत-संगीत से जुड़कर ही अपने व्यक्तित्व का सही विकास कर सकते हैं। इससे हमारे व्यक्तित्व में निखार आता है और मन में शांति आती है। इतना ही नहीं आत्मविश्वास भी बढ़ता है। इसलिए, अपनी कला से जुड़िए ताकि आप अपनी मूल से जुड़े रह सकें। 



Thursday, April 15, 2021

shashiprabha: आनंद उत्सव का आयोजन --शशिप्रभा तिवारी

shashiprabha: आनंद उत्सव का आयोजन --शशिप्रभा तिवारी:   ओडिशी नृत्य गुरू मायाधर राउत राजधानी दिल्ली में रहते हैं। उन्होंने अपने नृत्य विद्यालय जयंतिका के जरिए कई पीढ़ियों को ओडिशी नृत्य सिखाया है...

आनंद उत्सव का आयोजन --शशिप्रभा तिवारी

 

ओडिशी नृत्य गुरू मायाधर राउत राजधानी दिल्ली में रहते हैं। उन्होंने अपने नृत्य विद्यालय जयंतिका के जरिए कई पीढ़ियों को ओडिशी नृत्य सिखाया है। उन्होंने अपनी पुत्री और शिष्या मधुमीता राउत को ओडिशी नृत्य का प्रशिक्षण दिया। मधुमीता राउत अपनी गुरू की परंपरा का अनुसरण करती हैं। वह अपने गुरू की नृत्य परंपरा को अपनी शिष्य-शिष्याओं को सौंप रही हैं। पिछले दिनों उन्होंने अपने गुरू के नब्बेवें जन्मदिन के अवसर पर आनंद उत्सव का आयोजन किया।


जयंतिका की ओर से तीन दिवसीय आनंद उत्सव त्रिवेणी सभागार में संपन्न हुआ। समारोह की पहली संध्या 23मार्च को थी। इसमें ध्रुपद, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और कर्नाटक संगीत के कलाकारों ने अपने जलवे से उत्सव को नवाजा। समारोह में कर्नाटक संगीत के गायक जी इलंगोवन ने गायन पेश किया। उन्होंने राग भूपालम और मिश्र चापू ताल में निबद्ध रचना को सुर में पिरोया। महाराजा स्वाति तिरूनाल की रचना ‘गोपालक पाहिमाम‘ को इलंगोवन ने मधुर आवाज में पेश किया। उन्होंने राग कल्याणी में रचना ‘त्वमेव माता, पिता त्वमेव‘ को सुरों में पिरोया। यह आदि ताल में थी। उनके साथ बांसुरी पर हमेशा की तरह जी रघुरामन और पखावज पर एमवी चंद्रशेखर ने संगत किया। सारंगी वादक जनाब कमाल साबरी ने राग जोग पेश किया। उनके साथ तबले पर रमीज रजा और श्रीजगन्नाथ ने संगत किया। समारोह में डागर घराने के ध्रुपद गायक उस्ताद वसीफुद्दीन डागर ने शिरकत किया। उन्होंने ध्रुपद ‘सुर नर मुनि ज्ञानी‘ पेश किया। पखावज पर मोहन श्याम शर्मा ने उनका साथ दिया।

                                                              

त्रिवेणी सभागार में आयोजित आनंद उत्सव की दूसरी संध्या में ओडिशी नृत्य पेश किया गया। समारोह में गुरू मधुमीता राउत की शिष्य-शिष्याओं ने नृत्य पेश किया। इस आयोजन में गुरू मायाधर राउत की नृत्य रचनाओं को नृत्य में पिरोया गया। 24मार्च को नृत्य के कार्यक्रम का आगाज डाॅ सोनाली प्रधान की पेशकश से हुआ। डाॅ सोनाली ने साभिनय पेश किया। उन्होंने उड़िया गीत ‘नाचंति कृष्णा‘ पर भावों को दर्शाया। दूसरी पेशकश अष्टपदी पर अभिनय नृत्य की प्रस्तुति थी। जयदेव की अष्टपदी ‘याहि माधव याहि केशव‘ पर राधा के भावों को नृत्यांगना प्रियंका वेंकटेश्वरन ने पेश किया। कृष्ण की प्रतिक्षा में अधीर राधा को खंडिता नायिका के तौर पर निरूपित किया गया। 


भुवनेश्वर से पधारे गुरू पीतांबर बिस्वाल ने ओडिशी नृत्य पेश किया। उनकी पहली पेशकश ‘सते कि भंगि काला‘ पर अभिनय नृत्य की पेशकश थी। इसकी संगीत रचना सत्यव्रत कथा की थी। यह राग देश और जती ताल में निबद्ध थी। इस रचना में सखी से राधा कहती है कि वह कृष्ण की आंखों और आकर्षण के अधीन हो गई। इन्हीं भावों को गुरू पीतांबर ने चित्रित किया। वहीं, अगली प्रस्तुति सूर्य स्तुति ‘आदि देव नमस्तुभ्यं‘ में सूर्य के रूप और उनकी महिमा का गायन पेश किया।


इस समारोह की अंतिम संध्या 25मार्च को आयाजित थी। इस आयोजन में जयंतिका की कलाकार नित्या पंत और साथी कलाकारों ने दशावतार पेश किया। इसकी परिकल्पना गुरू मायाधर राउत की थी। दूसरी पेशकश नृत्य रचना ‘जागो महेश्वर‘ थी। इसे अंकिता नायक ने पेश किया। इसकी संगीत रचना बालकृष्ण दास ने रची थी। कवि कालीचरण पटनायक की रचना ‘जागो महेश्वर योगी दिगंबर‘ पर आधारित नृत्य अंकिता की अंतिम प्रस्तुति थी। इसके संगीत की परिकल्पना बालकृष्ण दास ने की थी। शास्त्रीय नृत्य के तांडव पक्ष का प्रयोग इस नृत्य में था। शिव से जुड़े त्रिपुरासुर वध, सती दाह, वीरभद्र भस्म, समुद्रमंथन, गंगावतरण जैसे 18आख्यानों इस नृत्य में दर्शाया गया। इस प्रस्तुति की खासियत थी कि इसमें शिव के चिदंबरम, लिंगराज, पशुपति, महाकाल, बैधनाथ आदि मंदिरों से प्रेरित मुद्र्राओं व भंगिमाओं को नृत्यांगना ने निरूपित किया। समारोह में ओडिशी नर्तक लकी मोहंती ने नृत्य पेश किया। लकी मोहंती ने पल्लवी और दुर्गा स्तुति पेश किया। 


Wednesday, April 14, 2021

कला और संस्कृति अमूल्य धरोहर हैं-शशिप्रभा तिवारी

               

संस्कार और संस्कृति किसी भी देश की पहचान होती है। हर देश की अपनी अनूठी संस्कृति होती है। फिर, जब भारत की बात होती है, तब यह तो अपनी सांस्कृतिक विविधता का अनोखा रूप प्रदर्शित करता है। यही हमारी विशिष्टता ही, हमारी समृ़द्ध सांस्कृतिक पहचान है। यह सांस्कृतिक मूल्य सदियांे पुरानी है। इसे संजोना तो जरूरी है ही, इससे भावी पीढ़ी को रूबरू करवाना और उसे जीवन मूल्यों से जोड़े रखना समाज और देश की जिम्मेदारी है। ऐसा आर्ट मैनेजर मालविका मजूमदार मानती हैं।

आप सान्स्कृतिक आयोजन से कैसे जुड़ी?
मालविका मजूमदार-- लगभग तीस सालों तक सांस्कृतिक क्षेत्र की विशिष्ट संस्था स्पीक मैके से जुड़ी रही हूं। स्पीक मैके में बतौर सीनियर प्रोग्राम मैनेजर-आर्टिस्ट और मीडिया कार्य करती रहीं। वैसे उन्होंने अपने करियर की शुरूआत दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी इरविन काॅलेज से की। यहां वह अंग्रेजी की लेक्चरर रहीं। फिलहाल, वह बतौर आर्ट मैनेजर कार्य कर रही हूं ।

गौरतलब है कि 29 अप्रैल को विश्व नृत्य दिवस है। इस अवसर पर वह नृत्य वर्कशाप का आयोजन स्कूलों में कर रही हैं। इस संदर्भ में मालविका मजूमदार बताती हैं कि स्पीक मैके में काम करते हुए, मैं देश के हर क्षेत्र के कला और कलाकार को जान पाई। हालांकि, मेरे जीवन का काफी समय दिल्ली में बीता है। मेरे माता-पिता मुझे शहर में होने वाले नाटक, फिल्म, संगीत-नृत्य के कार्यक्रमों शुरू से लेकर जाते थे। मेरे पिता सरकारी सेवा में थे, सो उनका तबादला हमेशा होता रहता था। इसलिए भी मुझे देश के विभिन्न प्रदेशों की सांस्कृतिक विशेषता से परिचित होने का अवसर मिला और चीजों के प्रति मेरी दृष्टि एवं समझ विकसित हुुईं।


वैल्यू एजुकेशन विद आर्ट एंड कल्चर क्यों जरूरी है?
मालविका --जीवन के इस मुकाम पर मैं समाज और लोगों से अपने अब तक के अनुभव को साझा करना चाहती हूं। मुझे लगता है कि शैक्षणिक संस्थाओं के साथ जुड़कर कला व संस्कृति के जरिए वैल्यू एजुकेशन छात्र-छात्राओं को दी जा सकती है। मैं चाहती हूं कि कला और कलाकारों के जीवन अनुभव का लाभ विद्यार्थियों और लोगों को मिले। कला और संस्कृति से जुड़ कर ही किसी का व्यक्तित्व विशिष्ट बनता है। मेरी कोशिश है कि मैं कला की समृद्ध विरासत से लोगों को परिचित करवा पाऊं।

आपकी आगामी आयोजन कौन-से हैं?
मालविका- पिछले साल 2020 से ही कोविड-19 के कारण सभी अपनेे-अपने घरों की चारदिवारों में कैद हो गए हैं। इससे युवा और स्कूली बच्चे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। ऐसे हालत में, मुझे लगता कि सांस्कृतिक गतिविधि जिसमें-विविध कलाओं की प्रस्तुति, कार्यशाला, लेक्चर व डेमोन्स्ट्रेशन शामिल होंगे। शास्त्रीय संगीत, नृत्य, लोक कलाओं, हस्त कलाएं, चित्रकला की प्रस्तुतियों और कार्यशालाओं के माध्यम से युवाओं को कला विशेष, कलाकारों और उनकी रचनात्मकता को करीब से देखने-सुनने का विशिष्ट अवसर मिलेगा। जिससे उन युवाओं को अपने दिनचर्या के अलावा, कुछ नया सीखने, कुछ नया करने और कुछ नई पे्ररणा से रूबरू होने का अवसर मिलेगा। यह मेरा एक समेकित प्रयास है ताकि युवा छात्र-छात्राओं और आम लोगों के जिंदगी में कला-संस्कृति के माध्यम से कुछ उत्साह और कुछ उमंग भर सकूं।

हमारे जीवन में कलाओं का क्या महत्व है?
मालविका-दरअसल, हमें अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और उसकी बौद्धिकता पर गर्व है। हमारी कलाएं और संस्कृति हमें जिंदगी से जोड़ती हैं। इन्हें अपनाकर हमारे भीतर आत्मविश्वास आता है। हमारे अंदर अपने प्रति और लोगों के प्रति एक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की भावना जागृत होती है। इसलिए, कला और संस्कृतियों विभिनन आयामों से जोड़कर, विद्यार्थियों के जीवन को अच्छी दिशा दी जा सकती है। उनमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सकते हैं। यह उचित समय है कि हम शिक्षा में कला-संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका पर विचार करें।

Saturday, April 10, 2021

shashiprabha: कदाचित कालिंदी तट ---शशिप्रभा तिवारी

shashiprabha: कदाचित कालिंदी तट ---शशिप्रभा तिवारी: जयंतिका की ओर से नृत्य समारोह ‘भज गोविंदम्‘ का आयोजन दिल्ली में हुआ। यह समारोह नौ अप्रैल को इंडिया हैबिटैट सेंटर के स्टेन सभागार में आयोजित ...

कदाचित कालिंदी तट ---शशिप्रभा तिवारी


जयंतिका की ओर से नृत्य समारोह ‘भज गोविंदम्‘ का आयोजन दिल्ली में हुआ। यह समारोह नौ अप्रैल को इंडिया हैबिटैट सेंटर के स्टेन सभागार में आयोजित था। इस समारोह में गुरू मधुमीता राउत की शिष्याओं ने नृत्य पेश किया। गुरू शिष्य परंपरा के तहत गुरू मधुमीता राउत ने अपने पिता व गुरू मायाधर राउत से ओडिशी नृत्य सीखा। गुरू मायाधर राउत को पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी सम्मान से सम्मानित किया गया है। 

नृत्य रचना ‘भज गोविंदम‘ की शुरूआत मंगलचरण स्वरूप ‘कदाचित कालिंदी तट विपिन‘ से हुुई। यह नृत्य रचना गुरू मायाधर राउत की थी। आदि शंकराचार्य रचित जगन्नाथ अष्टकम से ली गई थी। इस रचना में श्री वंृदावन में यमुना के तट कृष्ण राधा व गोपियों से मिलते हैं। वही कृष्ण श्रीजगन्नाथ भी हैं। इन्हीं भावों को शिष्याओं ने पेश किया। इस प्रस्तुति में भूमि प्रणाम व त्रिखंडी प्रणाम विशेषतौर पर शामिल थे। इसमें शिरकत करने वाले कलाकार थे-प्रीति परिहार, वसुंधरा चोपड़ा, नित्या पंत, डाॅ प्रियंका वेंकटेश्वरन, प्रणति मालू, शाल्वी सिंह और अंजलि राॅय।



इन दिनों उत्तर भारत में बसंत की बहार है। और ऐसे में महाकवि जयदेव की अष्टपदी ‘ललित लवंग लता परिशीलन‘ को प्रस्तुत करना, अपने-आप में बहुत समीचीन है। गुरू मधुमीता राउत ने इसका चयन किया यह उनकी सराहनीय दृष्टि है। इस अष्टपदी की संगीत रचना भुबनेश्वर मिश्र की थी और नृत्य परिकल्पना गुरू मायाधर राउत की थी। बसंत ऋतु की बहार अपनी चरम पर है। सभी वृक्ष और लताएं कुसुमित-पल्लवित हैं। ऐसे समय में राधा कृष्ण के लिए व्याकुल हैं और सखी से कृष्ण के बारे में पूछती है। लास्यपूर्ण इस प्रसंग को अभिनय के जरिए चित्रित किया गया। इसमें नित्य पंत, प्रणति मालू, तारिणी सिंह, अकेशा जैन और अंजलि राॅय शामिल थे।

अभिनय अगली पेशकश थी। मध्य युगीन उड़िया गीत ‘नाचंति कृष्ण‘ पर आधारित थी। यह उड़िया राजा ब्रम्हाबर बीरबर राय की रचना है। इसकी नृत्य परिकल्पना गुरू मायाधर राउत ने की है। संगीत रचना बंकिम सेठी ने की थी। यह राग आरभि में निबद्ध थी। इस पेशकश मंे अभिनय पक्ष का सुंदर विवेचन प्रस्तुत किया। 




राग बैरागी पर आधारित बैरागी पल्लवी पेश किया। ओडिशी की तकनीकी पक्ष को विस्तार दिया गया। ओडिशी की विभिन्न भंगिमाओं और करणों को लयात्मक गतियों के जरिए निरूपित किया। उनकी अंतिम पेशकश दशावतार थी। इसमें विष्णु के दस अवतारों को वर्णित किया गया। दोनो ही नृत्य रचनाएं गुरू मायाधर राउत की थीं। इसमें प्रीति परिहार, डाॅ प्रियंका, वसुंधरा चोपड़ा, नित्या, प्रणति, तारिणी सिंह और अकेशा जैन ने नृत्य पेश किया। शिष्याओं का आपसी संयोजन और तालमेल संतुलित था। इससे उनके रियाज का सहज ही भान हो रहा था। कोविड के इस कठिन दौर में गुरू मधुमीता शिष्याओं के मनोबल को कला के जरिए बनाए हुए हैं। उन्हें कला से जोड़े हुए हैं, यह बड़ी बात है।