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Sunday, September 22, 2024

#आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी @मेरा नृत्य -वाशिम राजा

                                    #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी 

                                         @मेरा नृत्य गुरु की कृपा है-वाशिम राजा

आज के युवाओं प्रतिभा की बहुमुखी है। वह सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव नजर आते हैं। एक ओर कुछ युवा उसका सदुपयोग कर अपना करियर को बना रहे हैं, तो दूसरी ओर लाॅ के क्षेत्र में बहुत से युवा करियर बनाते हुए, नजर आ रहे हैं। इसके इतर एक ऐसा युवक वाशिम राजा हैं, जो इन दिनों शास्त्रीय नृत्य जगत में अपने नृत्य को लेकर बराबर चर्चा में बने हुए हैं। 

पिछले दो वर्ष से वह लगातार विभिन्न मंचों पर कभी सामूहिक, कभी युगल तो कभी एकल नृत्य प्रस्तुत कर रहे हैं। कुचिपुडी नर्तक वाशिम राजा ने बचपन में नृत्य सीखना शुरू किया था। तब वह भरतनाट्यम और गौड़िया नृत्य सीखते थे। साथ ही लाॅ की पढ़ाई पूरी करके, बतौर लाॅ प्रोफेशनल प्रैक्टिस कर रहे थे। वर्ष 2018 में वह कुचिपुडी नृत्य गुरु वनश्री राव के संपर्क में आए और कुचिपुडी नृत्य सीखना शुरू किया। इसमें वह ऐसे रम गए कि उन्होंने लाॅ प्रैक्टिस छोड़ दिया और पूरी तरह प्रोफेशनल डांसर बनना तय कर लिया। 

बहरहाल, हाल ही में उन्हें राजगोपाल बेस्ट मेल सोलोइस्ट अवार्ड की घोषणा की गई है। यह सम्मान उन्हें तीस नवंबर को आशीष मोहन खोकर के एटेंडेंट डांस एन्वल अवार्ड 2024 में प्रदान किया जाएगा। इस अवसर पर उनकी गुरु को रूक्मिणी देवी ओवर आॅल कंट्रीबुशन अवार्ड दिया जाएगा। यह समारोह बंग्लौर में आयोजित होना है। इस सम्मान के अलावा, उन्हें युवा नृत्य रत्न प्रभास सम्मान और भी कई अवार्ड मिले। पर सबसे बड़ी बात कि संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्ष डाॅ संध्या पुरेचा ने उनके ऊर्जापूर्ण नृत्य देखकर इतनी प्रभावित हुईं कि उन्हें ‘महादेव-महेहश्वर‘ के नाम से पुकारती हैं। वाशिम पिछले कुछ महीने से लगातार दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, बड़ौदा, चेन्नै आदि शहरों में नृत्य पेश कर रहे हैं। अभी कुछ दिनों पूर्व वह तिजारा किले के महल-नीमराना में अपनी गुरु वनश्री राव के साथ नृत्य प्रस्तुत किया। इस समारोह में उन्होंने जगदोद्धारण, कालिया नर्तनम, देव देवम ओर तिल्लाना आदि नृत्य रचनाओं को पेश किया। वहां उन्हें देखने के लिए संस्कृति विद् और लेखक डाॅ आशीष खोकर भी पहुंचे। इसे वह अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि मानते हैं।






शास्त्रीय नृत्य कैसे सीखना शुरु किया?

कुचिपुडी नर्तक वाशिम राजा-मेरी मां को शास्त्रीय नृत्य में दिलचस्पी थी। इसलिए उन्होंने मुझे इस ओर प्रेरित किया। मुझे शास्त्रीय नृत्य के प्रति बचपन से ही आकर्षण था। मेरी मां ने मुझे प्रेरित किया। एक शाम मैं वनश्री राव मैडम का कुचिपुडी नृत्य देखा। उस शाम मैंने मन ही मन तय किया कि मैडम से कुचिपुडी नृत्य सीखना है। कार्यक्रम के बाद मैं उनसे मिला और उनसे अपने मन के बात को कहा कि मैं आपसे नृत्य सीखना चाहता हूं। शायद, वह शाम मेरे लिए एक नई शुरुआत थी।

 मैडम ने अपने घर पर आकर मिलने को कहा। उनके नृत्य की क्वालिटी और सिखाने का अंदाज अनूठा है। वह अपने शिष्य-शिष्याओं को ज्यादा से ज्यादा देना चाहती हैं। अब यह हमारी क्षमता और विवेक है कि हम उनसे कितना ले पाते हैं। वह डांस के साथ-साथ जिस रचना पर हम नृत्य करते हैं, उसके एक-एक शब्द की व्याख्या, एक-एक भाव के संदर्भ को वह बताती हैं। वह हमें आर्थिक, मानसिक, भावनात्मक आदि सभी स्तरों पर सहयोग करने को तैयार रहती हैं। 

अपने यादगार परफाॅर्मेंस के बारे में बताईए।

वाशिम राजा-पिछले वर्ष मैं गुरु जी के साथ कलाक्षेत्र गया था। वहां मुझे गुरु जी के साथ जगदोद्धारण करने का मौका मिला। गुरु वनश्री राव यशोदा और मैं कृष्ण की भूमिका में नृत्य किया। उस रोज भी मैं नृत्य करते हुए, बहुत भावुक हो गया था। यह सोचकर और भी दंग था कि ईश्वर की कैसी लीला है कि मुझे गुरु जी के साथ नृत्य करने का अवसर मिला। 

इस वर्ष मार्च में, गणेश नाट्यालय में पुरुष नर्तकों का एक उत्सव हुआ था। इस उत्सव में मुझे एकल नृत्य करने का अवसर मिला। इस उत्सव में अनेक समीक्षकों ने मेरे नृत्य को बहुत सराहा। इसके बाद, मैंने तय किया कि अब सिर्फ नृत्य की साधना करूंगा। और मैंने लाॅ की नौकरी छोड़ने का फैसला किया। फिलहाल, पूरी तरह डांस में हूं। गुरु जी कहती हैं, एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए। इसलिए मैं अब आपलोगों के सामने उपस्थित हूं। बाकी सब ईश्वर की मर्जी और किस्मत जिधर ले जाए। हमें उसी ओर ही चल देना है। 





Saturday, September 21, 2024

shashiprabha: #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी. मेरे घराने में संगी...

shashiprabha: #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी. मेरे घराने में संगी...:   #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी                                                     मेरे घराने में संगीत की धारा                            ...

#आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी. मेरे घराने में संगीत की धारा@उस्ताद गुलाम सिराज, रामपुर सहसवान घराने के शास्त्रीय गायक

 #आज के कलाकार-शशिप्रभा तिवारी

                                                    मेरे घराने में संगीत की धारा                   

                           @उस्ताद गुलाम सिराज, रामपुर सहसवान घराने के शास्त्रीय गायक 

रामपुर सहसवान घराने के कई कलाकारों ने अपने संगीत से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को समृद्ध किया है। उस्ताद मुश्ताक हुसैन साहब ऐसे ही कलाकार थे। उनके गायकी के लिए उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। उनकी स्मृति को गायक उस्ताद गुलाम सिराज ने संजोने का प्रयास किया है। उनकी यादों को बनाए रखने के उद्देश्य से पद्मभूषण उस्ताद मुश्ताक हुसैन खां एसोसिएशन यानी पीयूएमएचकेए की स्थापना गायक गुलाम सिराज ने की है। हर साल हांगकांग और अन्य देशों में शास्त्रीय संगीत समारोह का आयोजन पिछले दस साल से कर रहे हैं। उनके आयोजनों में पंडित राजन साजन मिश्र, पंडित शिव कुमार शर्मा, उस्ताद गुलाम मुस्तफा खां, उस्ताद जाकिर हुसैन खां जैसे दिग्गज कलाकारों ने शिरकत किया है। 

इस वर्ष भी जून में उन्होंने हांगकांग में समारोह का आयोजन किया। इसमें तबला वाद उस्ताद जाकिर हुसैन खां और सारंगी वादक साबिर खां ने समारोह में भाग लिया। साथ ही, उस्ताद गुलाम सिराज ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायन पेश किया। उन्होंने इस कार्यक्रम में राग विहाग गाया था। इस अंक में उन्हीं से बातचीत के अंश-


अपनी संगीत यात्रा के संदर्भ मंे आप क्या कहना चाहेंगें?

उस्ताद गुलाम सिराज-हमारा परिवार खुशनसीब है। हमारे घर में पिछले कई पीढ़ियों से मां सरस्वती की कृपा बनी हुई है। लगभग तीन सौ साल से संगीत की परंपरा चली आ रही है। मेरे पिताजी उस्ताद गुलाम हुसैन खां और दादा जी उस्ताद मुश्ताक हुसैन खां दोनों अच्छे गायक थे। दादा जी घराने के पहले गायक थे, जिन्हें पहला पद्मभूषण और संगीत नाटक अकादमी सम्मान दोनों मिला था। हम अपने बुजुर्गों के शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने हमें संगीत की विरासत में दी है। हम भी एक दफा खाना खाए बगैर रह सकते हैं, पर रियाज में नागा नहीं कर सकते। 

संगीत को विदेश में रह कर कैसे अपनाया?

उस्ताद गुलाम सिराज-पिछले पच्चीस वर्षों से मैं मध्य एशिया के देशों में शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार से जुड़ा हुआ हूं। अपनी दादा जीं के नाम से संस्था पीयूएमएचकेए के माध्यम से रामपुरा सहसवान घराने की गायकी विदेशों में सीखा रहा हूं। मेरा मन है कि बहुत से युवा इस संगीत को सीखें, अपनाएं। लेकिन, मेरी एक सीमा है। वैसे मैं चाहता हूं कि भारत में भी जो सच में संगीत सीखना चाहते हैं, उन्हें संगीत से जोड़ूं। 

क्या शास्त्रीय संगीत सीखना आसान है?

उस्ताद गुलाम सिराज-वास्तव में, संगीत को किसी को सीखाया नहीं जा सकता। यह कुछ तो घर के माहौल, परिवार के लोगों के व्यवहार और पूर्व जन्म की कृपा से संभव होता है। हमारी तो आंख खुलती ही थी, पिता जी के षड़ज साधना के स्वर और तानपुरे की धुन सुनकर। वह सुबह-सुबह जब गाते थे-धन धन सूरत कृष्ण मुरारी, इसे सुनकर हमारा दिन बन जाता था। मुझे लगता है कि उन्हीं सुरों के बीज हमारे कान में समा गए थे, सो हमें पता ही नहीें चला कि कब हम संगीत के इतने करीब आ गए। 

आपने किस उम्र में गायन सीखना शुरू किया?

उस्ताद गुलाम सिराज-मेरी औपचारिक तालीम नौ साल की उम्र में शुरू हुई थी। मुझे याद आता है कि उस्ताद जफर हुसैन खां का प्रोग्राम था। मैं उनके साथ तानपुरे पर संगत कर रहा था। उन्होंने अपने साथ सुर लगाने को कहा, उसका पता नहीं मेरे मानस पर क्या असर हुआ कि मैंने तय कर लिया कि अब संगीत ही सीखना है और परफाॅर्मर बनना है। मैं खुद मंच प्रस्तुति देता हूं और युवा कलाकारों को भी प्रोत्साहित करता हूं। 

खुदा का शुक्र है कि हमारे घर में अगली पीढ़ी भी संगीत को अपना रही है। मेरा बेटा और बेटी दोनों गाते हैं और म्यूजिक कंपोज भी करते हैं। दरअसल, घर के माहौल के कारण बच्चों की आधी तालीम तो सुनकर हो जाती है। 

विदेश में भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति लोगों का रूख कैसा है?

उस्ताद गुलाम सिराज-जब मैं बीस-पच्चीस साल पहले आया था, तब हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में बहुत कम लोग सुनने आते थे। धीरे-धीेरे लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। अब तो हजार दो हजार लोग सुनने आते हैं। अब बीस बच्चे मुझसे संगीत सीखने आते हैं। वो भजन और गजल भी गाना चाहते हैं। कुछ बच्चे हारमोनियम, तबला, सितार भी सीखने के इच्छुक हैं। उन्हें संगीत की बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है। पर उनको समझाने की कोशिश करता हूं। उनके उच्चारण को ठीक करने की कोशिश करता हूं।

संगीत का प्रभाव कैसा महसूस करते हैं?

उस्ताद गुलाम सिराज-आज कल फिल्मों में भी मशीनों या कहूं कि आॅक्टोपैड जैसे वाद्यों से अलग-अलग वाद्यों की धुनें प्रयोग की जा रहीं हैं। सितार, वायलिन, सारंगी, पखावज जैसे वाद्यों का प्रयोग नहीं किया जाता है। इससे रूहानियत नहीं आती है। मशीनों की वह वजह से वह रस या भाव जगता ही नहीं कि इस संगीत से रूह ताजा हो जाए। नए गानें बहुत जल्दी हमलोग भूल जाते हैं, पर सत्तर या अस्सी की दशक के फिल्मों के गाने आज भी हमें याद है। 









Friday, August 30, 2024

shashiprabha: #आज के कलाकार ---शशिप्रभा तिवारी--मेरे लिए नृत्य स...

shashiprabha: #आज के कलाकार ---शशिप्रभा तिवारी--मेरे लिए नृत्य स...:   #आज के कलाकार ---शशिप्रभा तिवारी मेरे लिए नृत्य साधना है- @ डाॅ समीक्षा शर्मा पिछले दिनों ...

#आज के कलाकार ---शशिप्रभा तिवारी--मेरे लिए नृत्य साधना है-@डाॅ समीक्षा शर्मा

 #आज के कलाकार ---शशिप्रभा तिवारी

मेरे लिए नृत्य साधना है- @ डाॅ समीक्षा शर्मा

पिछले दिनों इंडिया इंरनेशनल सेंटर में माॅनसून उत्सव 23 अगस्त को आयोजित था। इस समारोह में कथक नृत्यांगना समीक्षा शर्मा ने एकल नृत्य प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने नवाचार करते हुए, स्वरचित नृत्य रचना कृष्ण अंग बहुरंग पेश किया। इस प्रस्तुति का आरंभ उन्होंने खाटू श्याम की वंदना से किया। इसमें उन्होंने खाटू श्याम के अवतरण और उनके जीवन व वंदन की कथा की व्याख्या पेश किया। यह वंदना रचना ‘खाटू श्या मजी अरज सुनो जी‘ पर आधारित थी। इस भजन की रचना समीक्षा शर्मा ने किया था। यह राग मिश्र मांड और दीपचंदी ताल में निबद्ध था। नृत्यांगना समीक्षा शर्मा ने प्रसंग को बहुत सरलता और सहजता से पेश किया। ‘शीश के दानी‘ व ‘भंवर में नैया‘ बोल को भाव और नाव की गत व सरपण गति से मोहक अंदाज में दर्शाया।

उनकी दूसरी प्रस्तुति थी-कृष्ण अंग बहुरंग। इस की परिकल्पना उन्होंने अपने गुरु पंडित राजेंद्र गंगानी के मार्गदर्शन में किया था। इसमें सांभरी के पशु पक्ष्यिों के प्रति प्रेम और प्राकृतिक प्रेम को विशेष् तौर पर समाहित किया गया था।




इसमें ऋषि संाभ्री के मछली प्रेम को दर्शाया। इसी के अगले अंश में विष्णु अवतार कृष्ण द्वारा कालिया मर्दन प्रसंग को दिखाया। इसके लिए सूरदास के पद तांडव गति मुंडन पर नाचत गिरिधारी का चयन किया गया था। इस प्रसंग को दर्शाने के क्रम में नृत्यांगना समीक्षा शर्मा ने मृग, गज, व्याघ्र, मीन, सर्प हस्तकों के जरिए दर्शाते हुए, गतियों को प्रभावकारी अंदाज में पेश किया। नृत्य में भाव पक्ष का प्रयोग संुदर था। इसके साथ तिहाइयों, टुकड़ो और गतों को बखूबी पेश किया। नृत्य का समापन कलिया मर्दन प्रसंग के बाद बावन चक्कर को प्रस्तुत किया।


नृत्यांगना समीक्षा ने बताया कि मैं बचपन से ही नृत्य करती हूं। नृत्य करने से मुझे आत्मसंतुष्टि मिलती है। मैं समय के साथ अपना सफर करते हुए, धीरे-धीरे आगे बढ़ती रही हूं। इसके बावजूद लगता है कि अभी तो बहुत कुछ करना बाकी है।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के इस आयोजन के दौरान अपनी प्रस्तुति के संदर्भ में उन्होंने बताया कि नृत्य के देवता भगवान शिव यानी नटराज को माना जाता है। हमलोग कृष्ण को नटनागर मानते हैं। वह भी कालिया सर्प के फन पर खड़े होकर नृत्य करते हैं। इस प्रसंग को कथक और अन्य नृत्य शैलियों के कलाकार कालिया मर्दन प्रसंग में पेश करते हैं। मैं कृष्ण से जुडे इस प्रसंग को थोड़े अलग तरीके से पेश करना चाहती थी। इसी क्रम में मुझे स्रांभि ऋषि प्रसंग का पता चला। फिर मैं मथुरा स्थित जैत गांव में गई। वहां मैंने लोककथा सुनी। यहां कालिया सर्प के मूर्ति को देखा। वहां लोगों ने बताया कि अंग्रेजों ने कालिया सर्प की मूर्ति पऱ गोलियां चलाई थी, जिससे उनके सिर से खून निकला था और ढेर सारे सर्प बिल में से निकल कर आ गए थे। इससे मुझे एक नया विचार मिला और मैंने इसे अपने प्रस्तुति में शामिल किया।


पंडित राजेंद्र गंगानी कथक नृत्यांगना समीक्षा शर्मा के गुरु हैं। उनके संदर्भ में वह कहती हैं कि गुरु जी की सबसे बड़ी खूबी उनकी निरंतरता है। जब भी बात करिए तब वह सबसे पहले पूछते हैं कि आपने रियाज किया या नहीं। वह बिना नागा किए रोज रियाज करते हैं। उनकी यह बात मुझे बहुत प्रेरित करता है।

बहरहाल, इस समारोह में कथक नृत्यांगना समीक्षा शर्मा के साथ संगत करने वाले कलाकार थे-तबले पर निशित गंगानी, गायक शोएब हसन, पखावज पर महावीर गंगानीा, सारंगी पर अयूब खान और पढंत पर प्रवीण प्रसाद।
डाॅ समीक्षा शर्मा कथक नृत्य के क्षेत्र में जाना माना नाम है। उन्होंने युवा कथक कलाकारों की श्रेणी में अपनी साधना से एक अलग पहचान बनाई है। एक ओर वह अच्छी नृत्यांगना हैं, वहीं दूसरी ओर शास्त्र पक्ष की भी अच्छी समझ रखती हैं। उन्होंने कथक पर उज्बेक भाषा में अनुवादित एक पुस्तक लिखी है। उनके कई शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। वह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से उज्बेकिस्तान में सांस्कृतिक दूत के पद पर कार्य कर चुकी हैं। वह दूरदर्शन और आईसीसीआर द्वारा मान्यता प्राप्त कलाकार हैं। उन्हें इंडिया एक्सलेंस अवार्ड, अंतरराष्ट्रीय महिला एसोसिएशन सम्मान, ग्वालियर रत्न और नृत्य श्रृंगार मणि मिल चुका है। उन्हें खजुराहो नृत्य समारोह, कालिदास महोत्सव, सार्क तरोना लारी, बार्सिलोना उत्सव में शिरकत कर चुकी हैं।

Thursday, August 1, 2024

shashiprabha: # आज का कलाकार शशिप्रभा तिवारी ----कला का संसार बह...

shashiprabha: # आज का कलाकार शशिप्रभा तिवारी ----कला का संसार बह...:                                       # आज का कलाकार शशिप्रभा तिवारी                                   कला का संसार बहुत तेजी से बदला है--@श...

# आज का कलाकार शशिप्रभा तिवारी ----कला का संसार बहुत तेजी से बदला है--@शांतनु चक्रवर्ती

                                     # आज का कलाकार शशिप्रभा तिवारी

                                  कला का संसार बहुत तेजी से बदला है--@शांतनु चक्रवर्ती


भरनाट्यम नर्तक शांतनु चक्रवर्ती ने डाॅ सोनल मानसिंह से भरतनाट्यम सीखा है। वह गुरु वी कृष्णमूर्ति से दो दशक से दो दशक से भरतनाट्यम की बारीकियों को सीख रह हैं। गौरतलब है कि मुरली मनोहर डांस उत्सव, नवरात्री उत्सव, महाशिवरात्री उत्सव, सावन महोत्सव, रास पूर्णिमा महोत्सव-2023, संगीत नाटक अकादमी के योग पर्व-2021 व नाट्य गति उत्सव-2022 आदि में शिरकत कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने संस्कृति मंत्रालय के आयोजनों-सुर ताल उत्सव में अपनी कला का प्रदर्शन किया। अरविंदो आश्रम के 150 वीं जन्म समारोह में शिरकत किया। वह भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद और दूरदर्शन की ओर से मान्यता मिली है।

 मुझे लगता है कि हम सिर्फ शास्त्रीय नृत्य के कलाकार हैं। इसलिए सिर्फ डांस ही करेंगें। आज के समय में ये नहीं चल सकता है। एक अच्छे डांसर बनने के साथ, कलाकार को एक अच्छा स्पीकर या वक्ता भी बनना जरूरी है। इसका एक फायदा होता है कि आप की बात से आपके दर्शक प्रभावित हो सकें। मैं अपनी गुरु डाॅ सोनल मानसिंह जी से यह सब सीखा। वह बहुत प्रभावकारी तरीके से बोलती हैं। मैं अपनी मंच प्रस्तुति के समय भी यह कोशिश करता हूं कि दर्शकों को राग-ताल के अलावा, अपनी नृत्य रचना, उसकी परिकल्पना, उसकी कहानी भी लोगों को बताऊं ताकि लोगों को नृत्य समझ आए और वह दिलचस्पी के साथ नृत्य को देखें। वैसे भी भरतनाट्यम की ज्यादातर प्रस्तुति तमिल या संस्कृत में होती हैं। 


भरतनाट्यम नर्तक शांतनु का मानना है कि शास्त्रीय कलाकार को शास्त्र का भी अच्छा जानकार होना चाहिए। इसके लिए उसे अध्ययन करना जरूरी है। वह कहते हैं कि हम कलाकारों को किताबें, साहित्य, शास्त्र संबंधी जरूर पढ़नी चाहिए। साथ ही, मूर्ति कला, चित्रकला, कविता आदि भी जानने और समझने की कोशिश करनी चाहिए। इससे हमारी प्रस्तुति और समृद्ध होती है। उत्तर भारत में रहता हूं। इसलिए तमिल के बजाय हिंदी या संस्कृत पर आधारित नृत्य वरणम के अंदाज में ज्यादा करता हूं। जैसे-तुलसीदास की रचना ‘श्रीराम चंद्र कपालु भजुमन‘ पर आधारित इस प्रस्तुति में अक्सर कलाकार अभिनय प्रस्तुत करते हैं। लेकिन, मैं दर्शकों को बांधने के लिए अभिनय के साथ जती पेश कर नृत्य को विस्तार देने का प्रयास करता हूं। मेरा प्रयास है कि भरतनाट्यम नृत्य को हिंदी भाषी दर्शक अच्छे से समझें, उसे देखें और उसे सराहें। इसी तरह मैंने संत दयानंद की रचना ‘भो शिव शंभो‘, स्वामी रविदास की रचना ‘कमल लोचन‘ की नृत्य रचनाएं भी की हैं। इसके लिए मैं अपने गुरु वी कृष्णमूर्ति जी का मार्गदर्शन आज भी लेता हूं। शास्त्रीय नृत्य जब मैं करता हूं, उसे करने से पहले मैं दर्शकों का ध्यान जरूर रखता हूं। 

शांतनु आगे कहते हैं कि बीस साल पहले जब मैं शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में प्रोफेशनल डांसर आया था, तब स्थितियां अलग थीं। दर्शक और उनकी अपेक्षाएं बदल गईं है। मैं देवताओं को केंद्र में रखकर कोरियोग्राफी करना चाहता हूं। पर मुझे एकल नृत्य करने का अवसर बहुत कम मिलता है। फिल्मों की तरह शास्त्रीय नृत्य इनदिनों सामूहिक नृत्य या कोरियोग्राफी ज्यादा हो गई है। उसमें भी नर्तकों की अपेक्षा नृत्यांगनाएं ज्यादा होनी चाहिए। मुझे याद आता है जब मैं गुरु जी सीख रहा था, उन रचनाओं को आज एक मैच्योर डंासर के नजरिए से पेश करना चाहता हूं, पर मेरे लिए आयोजकों के पास अवसर नहीं हैं। वैसे करना तो बहुत कुछ चाहता हूं। सब कुछ बहुत बदल गया है। यहां तक कि दक्षिण भारत में भी आयोजकों की मांग होती है कि आप परंपरागत शास्त्रीय भरतनाट्यम नृत्य के बजाय कुछ नई कोरियोग्राफी पेश करिए। इसके अलावा, आज ज्यादातर आयोजक मुफ्त में या कम पैसे में प्रोग्राम करने को कहते हैं। यह कैसा दबाव है? हम कलाकारों के समझ के परे की बात हो गई है!

मैं सोचता हूं कि डिजिटल युग में सब कुछ आपके मोबाइल पर उपलब्ध है। लोग छोटे-छोटे रील्स देखते हैं। उन्हें कुछ भी फास्ट देखना अच्छा लग रहा है। इसमें क्लासिकल डांस के रील्स भी खूब लोकप्र्रिय हो गए हैं। इन चीजों से हमारे दर्शकों का टेस्ट भी काफी बदल गया है। वह धैर्य से घंटे भर की प्रस्तुति को देखने शायद आॅडिटोरियम या मंदिरों में जाने से अब बचना चाहती है। समझ नहीं आता है कि अपने अच्छे समय का सदुपयोग अपने लिए उपयोग करने के बजाय लोग जाया क्यों कर रहे हैं। क्योंकि शास्त्रीय नृत्य तो आत्म आनंद के लिए है न कि मनोरंजन के लिए। आत्म आनंद पाने के लिए आपकी सभी इंद्रियों को सहज और मन का स्थिर होना जरूरी है। ताकि उस आनंद की अनुभूति में आप एक क्षण नहीं बल्कि घंटों और दिनों तक निमग्न रहें। भारतीय कलाओं के इस जादू को समझना बहुत जरूरी है। 

अपनी नृत्य प्रस्तुतियों के संदर्भ में, नर्तक शांतनु बताते हैं कि डाॅ पद्मा सुब्रह्मण्यम की संस्था नृत्योदया है। जो हर साल महाशिवरात्री महोत्सव का आयोजन चेन्नैई और अन्य शहरों के शिव मंदिरों में करते हैं। इस समारोह में हमलोगों को नृत्य पेश करने का सुखद अनुभव प्राप्त हुआ। गुरु जी की नृत्य रचना नटराज को महाशिवरात्री महोत्सव में प्रस्तुत किया। उस दौरान हमें तंजावुर बृहदेश्वर मंदिर, कंुभकोणम मंदिर, तिरूवायवुर, थिरुपुरुपोंडि के शिव मंदिरों में महाशिवरात्री नृत्य समारोह में शिरकत करने का आनंददायक अवसर प्राप्त हुआ। ये मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल हैं। वास्तव में, उससे जुड़कर हमें अलौकिक अनुभव प्राप्त हुआ।