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Tuesday, February 11, 2014

इस वसंत में
झील के किनारे
पलाश की डाल पर
लाल फूल की ओट में
पंछियों का जोड़ा बैठा था

पता नहीं
चिड़ी उदास-सी कुछ कहती
कभी फुदक के
इधर से उधर जाती है

चिड़ा अपनी चुप्पी में है
उसे चिड़ी कुरेदती है
क्यों? नाराज़ हो !
चाँद लम्हों का साथ आओ

शाम ढलने को आई है
दोनों मिल
 गुनगुना लें जिंदगी के गीत गा लें

 ना जानें!
कहाँ ?
फिर जिंदगी शाम हो जाए
 कब, किसका साथ छूट जाए?

Thursday, January 23, 2014

उसी पनघट पर
गागर ले कर
खड़ी हूँ, कान्हा!
एक बार आओ ना!

कांकरिया मार
गागर को तोड़ो,
भीगती हूँ, कान्हा!
एक बार भिगो जाओ ना!

राधा कुंड से
कृष्णा कुंड तक
बहलती हूँ, कान्हा!
एक बार बहला जाओ ना!

उध्दवजी को ना भेजो
इस बार नैना
तरसते हैं, कान्हा!
एक बार दरस दे जाओ ना!

मैं अकेली
राह में बैठी
बाट निहारती हूँ, कान्हा!
एक बार मिल जाओ ना!
 

Thursday, January 2, 2014

चला जाता है
मन उड़ता हुआ
बार-बार तुम्हारे पास
कुछ नहीं चाहता
तुम्हें मुस्कुराता देख
लौट आता है
अपने डेरे में
तुम्हारे फेरों से
महसूस होता है
कितना बहाव है
जीवन में
बरस-बरस बीत जाते हैं
हम गेहूं, सरसों, पलास को
झूमते देख
मन के शिवालय में
गंगा जल से
अभिषिक्त करतें
उन पलों को
जब तुम्हारे सहारे
हम हुए थे ....

Wednesday, January 1, 2014

आओ एक
मिलन का दीप जलाएं
हम-तुम दोनों
मिल कर एक सपना देखें
नहीं!
स्वप्न में जीना
कितना सम्मोहन देता है
तुम्हारे कंधे पर
लहराते मेरे केश
क्या!
तुम्हारी भी
यथार्थ में
ऐसी ख्वाहिश होती है
सीने पर हाथ रख
सच बोलना!
मेरी तमन्ना की नदी
हर बार
तुम्हारे मन के
सागर में मिल जाती है
तब, सपने-सच कहाँ!
उन पलों में
सिर्फ,हम और तुम होते हैं
चांदनी रात और चाँद की तरह

Monday, December 16, 2013

यमुना के किनारे
मधुबन के पेड़ों की झुरमुट
रमन की रेती में मन रमाये

मन तुमको ही ढूंढ़ता है
तुम न जाने!
किस देश में रहते हो?

पता भी तो नहीं था
तुम्हारा हाल कभी
चाँद से पूछती थी
कभी नीले आसमान से

अपने मन की बातें
मन-मन में रखती थी,
धन्य उस पल हुई

 जब जार के वाण से घायल
तुमने मुझे अर्जुन से
 मुझे सन्देश पहुँचाने को कहा
लेकिन, इतनी हिम्मत कहाँ थी उनमें

मेरे प्रेम
मेरे विरह को
मेरे अनत समर्पण को उद्धव ने समझा था

और तुम्हारी अनंत प्रयाण की खबर वही ले कर आये
अपेक्षा दुःख देता है
मैंने सिर्फ इसे ही मान दिया
सोलह श्रृंगार कर लीन-विलीन हुई तुममे

Saturday, December 7, 2013

तुम्हारी अंगुली थाम
पहली बार चली थी
शायद
लड़खड़ाई भी थी
तुमने सहारा दिया

चलते-चलते
 यहाँ तक चली आई
तुम उसी पगडण्डी पर
पुराने बरगद के नीचे
अब तक रुक
मुझे निहारते हो

मैं जानती हूँ
तुम्हारे लिए
मेरे खातिर इतना करना
कुछ आसान नहीं होता होगा
तुम्हारी अपनी दुनिया है

जानते हो!
तुम्हारी नजर का सहारा
बेशकीमती है
क्योंकि तुम्हारी निगाहों से
आज तक देखती रही हूँ
जिंदगी को

मुझे लगता है
हर सुबह
तुम्हारी मुस्कुराहट
एक उत्सव बन आती है
मुझे नींद से जगाने
मैं सँवरने लगती हूँ
गुनगुनी सर्दी की धूप-सी



Monday, December 2, 2013

मोहन
मैं बहुत दूर से
तुम्हारे बांसुरी की धुन सुनती हूँ
उस में अपना नाम सुनती हूँ

जानती हूँ!
तुम बहुत दूर हो
तुम्हारे विरह को जीती हूँ
उसमें तुम्हारा नाम जपती हूँ

सुनती हूँ !
धड़कने बहुत दूर से
अपने करीब तुम्हें तब ही पाती हूँ
उस उन्मेष में संपूर्ण होती हूँ

देखती हूँ !
फरकते होठ दूर से
बांसुरी की स्वर लहरी बन जाती हूँ
उस पल मैं कहाँ रह जाती हूँ ......