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Tuesday, July 20, 2021

गुरू की अनंत महिमा

                                                             गुरू की अनंत महिमा

                                                               गुरू रंजना गौहर


शास्त्रीय कलाएं गुरू मुखी विद्या है। इसे सीखने के लिए कलाकार अपने गुरू के सानिध्य मंे साधना करते हैं। यह एक निरंतर परंपरा है। यह सही है कि किताबों से बहुत कुछ जानकारी हासिल कर लेते हैं। लेकिन, कला के व्यावहारिक पक्ष को बरतने के लिए गुरू का मार्ग दर्शन जरूरी है। ऐसा ओडिशी नृत्यांगना और गुरू रंजना गौहर मानती है। गुरू पूर्णिमा 24 जुलाई को है। गुरू मायाधर राउत वरिष्ठतम गुरू हैं। 6जुलाई 1930 को जन्मे गुरू जी बहुत ही शांत और संतुष्ट प्रकृति के हैं। उन्हीं के सानिध्य में नृत्यांगना रंजना गौहर ने नृत्य सीखा। गुरू पूर्णिमा के अवसर पर गुरू रंजना गौहर जी से संक्षिप्त बातचीत हुई। इस बार रू-ब-रू में उसके कुछ अंश प्रस्तुत है-शशिप्रभा तिवारी

आप गुरू मायाधर राउत के सानिध्य में कैसे आईं?

गुरू रंजना गौहर  --साठ के दशक में गुरू जी दिल्ली आ गए। उन्होंने दिल्ली को अपना कर्मभूमि बनाया। यहां देश-विदेश के असंख्य शिष्य-शिष्याओं को उन्होंने ओडिशी नृत्य सिखाया। उन्हें भारत सरकार ने पद्म श्री, संगीत नाटक अकादमी सम्मान और असंख्य सम्मान से सम्मानित किया गया। गुरू जी ने एक बार बताया था कि सन् 1969 में पहली बार राष्ट्रपति भवन में नृत्य बैले-गीत गोविंद प्रस्तुत की गई। इसमें मैं कृष्ण की भूमिका में था। इसका संगीत नाट्य बैले सेंटर के सुशील दास ने तैयार किया था। इसे विशेष आमंत्रित दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया था। गार्गी काॅलेज के एक समारोह के लिए नृत्य नाटिका ‘शकुंतला‘ की रचना की। इस समारोह में तत्कालीन उपराष्ट्रपति राम स्वरूप पाठक उपस्थित थे। वह मेरे नृत्य को देखकर काफी प्रभावित हुए थे। इसके बाद ही भारतीय कला केंद्र की सुमित्रा चरित्रराम ने अपने केंद्र में आमंत्रित किया। दिल्ली में गुरू जी ने श्रीराम भारतीय कला केंद्र में सिखाना शुरू किया। यहीं मैं उनसे नृत्य सीखने जाती थी। उन दिनों गुरू जी न सिर्फ डांस बल्कि, काॅस्ट्यूम, संगीत और नृत्य के तकनीकी पक्ष की हर बारीकी का पूरा ध्यान रखते थे। सब कुछ बहुत परफेक्ट हो। यह उनकी प्राथमिकता होती थी। 

गुरू जी से जुड़ी कोई खास बात!

 गुरू रंजना गौहर-- अक्सर गुरू जी कहते हैं कि अगर अपने नृत्य को जीवंत और मर्मस्पर्शी बनाने के लिए पौराणिक कहानियां, साहित्य और दर्शन को पढि़ए। इससे आप मानवीय भावनाओं से सही तौर पर परिचित होते हैं। तभी आपके भीतर की गहराई से भावनाएं उमड़ेंगी। वह आपके नृत्य में सहजता से दिखेगा। सच कहूं तो गुरू जी का जीवन ही हमें प्रेरणा देता है। गुरू जी ने मंगलाचरण ‘माणिक्य वीणा‘ की कोरियोग्राफी की है। आज भी यह बहुत ही लोकप्रिय नृत्य रचना है। इसे हर कलाकार और हर शिष्य-शिष्या बहुत उत्साह से करते हैं। 

गुरू जी ने अपने  कैरियर का अच्छा समय कला क्षेत्र में बीताया है। उस संदर्भ में कुछ बताइए।

गुरू रंजना गौहर--दरअसल, गुरू जी का नृत्य अभिनय तो रोमांचित करने वाला है। उनके अभिनय में मौलिकता की पराकाष्ठा होती है। वह एक-एक भाव को बहुत सहजता और स्पष्टता से अपने अभिनय में दर्शाते हैं। उनका नृत्य अभिनय सरल और हृदय को छूने वाला होता है। उसमें कहीं कोई बनावटीपन नजर नहीं आता। 

वास्तव में, गुरू जी ने आजीवन ओडिशी नृत्य और कला की सेवा बहुत ईमानदार और समर्पित भाव से की है। कलाक्षेत्र में गुरू जी ने भरतनाट्यम और कथकली दोनों सीखा था। दिल्ली में उन्होंने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कलाकारों को ओडिशी संगीत सिखाया। नृत्य निकेतन में बतौर गुरू उन्होंने अपने शिष्य-शिष्याओं को मंगलाचरण, बटु, बसंत पल्लवी, ललिता लवंग लता, कल्याणी पल्लवी, मोक्ष और दशावतार की नृत्य रचना की है। उन्होंने कई अष्टपदियों को नृत्य में पिरोया। उन्होंने गौड़ पल्लवी, संगिनी रे, बज्रकांति पल्लवी, याहि माधव, आना कुंज रे और भी बहुत-सी नई नृत्यों की रचना की। 

गुरू जी का कौन-सा गुण आपको सबसे अधिक आकर्षित करता है?

गुरू रंजना गौहर--गुरू जी बहुत मधुर स्वभाव और महान कलाकार रहे हैं। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि वह नृत्य की दुनिया में मशहूर थे ही। उन्हें उडि़या फिल्म में नृत्य निर्देशन के लिए आमंत्रित किया। उन्हांेने 1962 में फिल्मों में कोरियोग्राफी का काम किया। ये फिल्में थीं-मणिका जोड़ी और जीवन साथी। ब्लाॅक बस्टर फिल्म ‘का‘ की कोरियोग्राफी भी गुरू जी ने की। लेकिन, फिल्मी जगत का चमक-दमक उन्हें ज्यादा समय तक बांध नहीं पाया। फिर, वह वापस अपने पहले प्यार ओडिशी नृत्य की ओर लौट आए। उन्होंने पुनः नृत्य सिखाने,  नृत्य रचना करने और उसकी प्रस्तुति में व्यस्त हो गए। गुरू जी की सरलता और अपने कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण भाव अद्वितीय है।



गुरू जी की नृत्य रचनाओं में बेजोड़ अभिनय परिलक्षित होता है। ओडिशी में ऐसा नृत्य अभिनय अद्भुत है। आप की क्या राय है?

गुरू रंजना गौहर--गुरू जी अभिनय दर्पण को बहुत महत्व देते थे। उन्होंने महाकवि श्री जयदेव की गीत गोविंद को विशेष तौर पर नृत्य रचनाओं में पिरोया। यह चुनौतीपूर्ण काम करने वाले वह पहले गुरू थे। इतना ही नहीं, कवि उपेंद्र भंज, कवि सूर्य और अन्य कवियों की रचनाओं को नृत्य में सुसज्जित किया। उन्होंने भरतनाट्यम की तरह अभिनय के स्थाई भाव, संचारी भाव और मुद्रा विनियोग को ओडिशी में समाहित कर, ओडिशी नृत्य को बहुत आकर्षक और सम्मोहक बना दिया। उन्होंने ‘पश्यति दिशि-दिशि‘, ‘सखी हे‘, ‘प्रिय चारू शिले‘, ‘धीरे समीरे‘, ‘चंदन चरित‘, ‘निंदति चंदन‘ को नृत्य में पिरोया। जो बहुत मुश्किल काम था। अपनी विशेष नृत्य रचनाओं को परिकल्पित करने के लिए गुरू जी ने बल्लभ मोहंती, डीएन पटनायक, नील माधव बोस, सुधाकर दास जैसे उड़ीसा के विद्वानों का मार्ग-दर्शन लिया। यह गुरू जी की बहुत बड़ा गुण है। 

गुरू जी की महानता है कि विद्वानों से संवाद करते हैं। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों-नाट्य शास्त्र, अभिनय दर्पण और अभिनय चंद्रिका का विशेष अध्ययन किया था। उनके इस ज्ञान ने ओडिशी की हस्तमुद्राओं को समृद्ध किया। उन्होंने ओडिशी नृत्य के अभिनय में संचारी भाव में समाहित किया। अभिनय के संदर्भ में गुरू जी कहते हैं कि अभिनय सागर है। संचारी भाव सागर की लहरें हंै, जो अंततः सागर मंे ही विलीन हो जाती हंै। जब उन्होंने ओडिशी में अभिनय दर्पण की चीजों को जोड़ा, उस समय शुरू-शुरू में उन्हें काफी विरोध का भी सामना करना पड़ा। लेकिन, कुछ समय बाद सभी गुरू जी का लोहा मानने लगे। गुरू जी का मानना है कि अभिनय दर्पण हर शास्त्रीय नृत्य शैली का अभिन्न अंग है। समय के साथ लोगों ने मेरी नृत्य रचनाओं को देखा तो उन्हें उसे उसी रूप में स्वीकार किया। उसके बाद, वही परंपरा और शैली का हिस्सा बन गई। 

 









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